Saturday, December 5, 2009

कुछ भी तो रूमानी नहीं

कुछ भी तो रूमानी नहीं
(कथादेश जुलाई 2006 से साभार)
फिर रूमानी कहानी कैसे बनती?
डायरी पलटती हूँ तो कुछ दिन और कुछ स्मृतियां उसमें दबी पड़ी हैं - ``कैसे दिन हैं ये। चेतना पर ज़ोर डालूं तो शायद महसूस कर सकूं कि इन दिनों की तासीर कैसी है ठण्डी या गर्म! टहनियों से उखड़े दिन... सूखे भूरे पत्ते रास्तों पर बिछे रहते हैं...मौसम अलग होती दिशाओं के मुहाने पर खड़े अमलताश की कविताएं लिख रहे हैं। बढ़ती उमस से, असमंजस से, पतझड़ी पत्तों और अमलताश के पेड़ों से शहर पीला पड़ा हुआ है। कोई तो महक बच जायेगी इन दिनों की, स्मृतियों में?''

याद है वह दिन, जब तुम्हें आये हुए एक सप्ताह ही हुआ था... मुझे तुम्हारी उस समाधिस्थ मुद्रा पर प्यार आ रहा था। तुम नीचे बिछे गद्दे पर पैर मोड़ कर आंखें मूंदे बैठे थे। पेन खुला था, खूब सारे सफेद कागज़ बिखरे थे। चश्मा जेब में था। मुझे चुपचाप नाश्ते की प्लेट और कॉफी का मग रख कर, बिना व्यवधान डाले, नीचे को घूम कर जाती सीढ़ियों में उतर जाना था। मुझे पता था कोई नयी कहानी जन्म ले रही है। बहुत उत्सुकता हो रही थी कि पूछ लूं... किस विषय पर होगी यह कहानी? बहुत दिनों से प्रेम पर तुमने कुछ नहीं लिखा था। उसी पर तो नहीं? बहुत पहले जब तुम यहां नहीं आये थे, और अच्चन ने तुम्हारी कहानियां पढ़ने को दी थीं। उनके शब्दों में वे ` भीषण रूमानी कहानियां' थीं। मैं हैरान होती थी तुम्हारे लिखे गये प्रेम और देह के दर्शन पर... रूमानियत की दुखती - दुखाती भीषणता पर... तुम्हारी किताब के फ्लैप पर तुम्हारा एक श्वेतश्याम चित्र था... अनोखी अभारतीय गढ़न वाला चेहरा... खड़े - खड़े बाल...और तुम्हारी आंखों का हल्का रंग, उस श्वेत - श्याम चित्र में भी पकड़ आ रहा था। एक सहज उत्सुकता जगा दी थी पिता की बातों ने...
`` रचनात्मक संवेदना की पराकाष्ठा को देखना है तो इन्हें पढ़ो,भाषा की अर्थमय दुस्र्हता कथानक की दुरूहता को एक तरफ चुनौती देती प्रतीत होती है, वहीं दोनों एक दूसरे की पूरक भी हैं।''
अच्चन की बात का अर्थ कुछ मैं समझी भी और कुछ नहीं भी...पर वे कहानियां मुझे चकित करती थीं। अजीबो - गरीब मानवीय संबंधों की कहानियां, स्त्री - पुस्र्ष के बीच के तरल मनोविज्ञान को एकदम नयी तरह से व्यक्त करती हुई। सामाजिक तौर पर वे रिश्ते जो सरासर ` अनैतिक ' करार कर दिये जाते उनकी निष्ठामय पराकाष्ठाओं की कहानियां। हर कहानी में तो लिख रहे थे तुम `` प्रेम में नैतिक - अनैतिक कुछ नहीं होता। प्रेम एक नितान्त नैतिक अनुभव है।''

वही तुम, मलय! आज यहां मेरे सामने किसी कहानी को जन्म दे रहे हो।जानलेवा उत्सुकता हो रही थी, पर जानती थी कि पूछना व्यर्थ होगा कि `क्या होगी यह कहानी?' नहीं पूछूंगी। फिर तय किया, नहीं छुऊंगी चिड़िया का अण्डा... छोड़ देती है चिड़िया अपने अजन्मे अण्डे को, गिरा देती है घोंसले से नीचे, अगर कोई दुष्ट बच्चा छू ले तो! बचपन में मां ने यही तो बताया था, मेरी गुस्ताख़ दोपहरों के उन रोमाचंक पलों में, जब मैं दबे पांव उनके पास से उठकर, मेज़ और उस पर कुर्सी चढ़ा कर रोशनदान में रखे घोंसले में झांक कर गौरेय्या के अण्डे देखा करती थी। मैं उन चितकबरे अण्डों को हाथ में उठा लेती। देर तक उलटती - पुलटती, उन्हें हिला कर कान के पास ले जाकर सुनती कि कोई आवाज़ आए... कितनी ही बार ऐसा हुआ था कि अगले दिन अण्डों के टूटे खोल नीचे पड़े मिले और उसका पीला - सफेद तरल बिखरा हुआ मिला। मन बहुत खराब हो जाता था, फिर - फिर कसम खाती थी कि अब कभी नहीं छुऊंगी। अगली बार न जाने किस सम्मोहन में वह कसम टूट जाती।

उस वक्त तुम वही लग रहे थे। अण्डा सेती चिड़िया... आंखें मूंदे...अपने आस पास के वातावरण से निरपेक्ष, निस्पृह... एक नई सृष्टि के जन्म में एकाग्रचित्त... दृढ़, तेजोमय... जन्म देने की लज्ज़त भरी पीड़ा से बोझिल भी... और मेरी उत्सुकता मुझे धीमे धीमे जलाती रही।

शब्द ...शब्द... शब्द...( जिन्हें तुम लिख कर यूं ही भूल जाते हो!! और मेरे जैसे तुम्हारे पशंसक -पाठक, एक अरसे तक उन शब्दों से निर्मित अर्थों की गहन गुहाआें में यूं ही भटकते रहते हैं।) शब्दों ही के सुनहरे तारों के गुंथे पुल... और क्या... निश्चित ही और इन शब्दों के सिवा कुछ नहीं जोड़ता था, मुझे तुमसे। शब्द पिघलते थे मेरे पढ़ने से... और मुझ पर गिरते थे टप - टप। मैं इन शब्दों को साफ - ठण्डी ज़मीन पर फैलाती थी...वे पारे की बूंदों की तरह फैल जाते थे... फिर उन्हें बटोरना क्या आसान होता था ?

अजीब नाम होते हैं तुम्हारे पात्रों के! किस जंगल से बटोर लाते हो? ये सेमल -महुआ, कस्तूरी - केवड़ा, किंशुक, पलाश? जंगलों, पुराने किलों की यायावरी से चुन कर लाये सूखे तनों, अजीब अजीब आकार की टेढ़ी - मेढ़ी जड़ों की तरह के कथानक, जिन्हें तराश कर तुम अनोखी आकृतियों में ढालते रहे हो...

मैं ने सीढ़ियों की तरफ मुड़ते हुए, आंगन से सीढ़ियों तक बढ़ आये कटहल के गाछ की टहनियों के बीच से देखा था... तुम्हारे कमरे की खिड़की का सफेद जालीदार परदा हौले - हौले हिल रहा था... पीछे से तुम्हारी आकृति दिखाई दे रही थी ... चौड़े कन्धों पर किसी अजानी पीड़ा का दबाव था... अपने अंगूठे और तर्जनी के बीच तुमने अपने होंठों को दबा रखा था... आंखें अर्धोन्मीलित...उनमें एक
निर्वात् तैर रहा था...उनका रंग तब नहीं दिख रहा था...पर वह रंग वहीं से विस्तार पाकर आसमान को रंग रहा था...मैं कितनी भाग्यशाली थी, देख पा रही थी देश के बहुत लोकप्रिय कथाकार को उसकी किसी अद्भुत कहानी को जन्मने की प्रसव पीड़ा में आकुल!! एक ठण्डी सांस निकल गयी थी मेरी और तुमने पलक उठा कर देखा था ... वहां कुछ नहीं था बस वही निर्वात था ... मुझे खींचता सा, अंतरिक्ष के ब्लैकहोल की तरह, हज़ारों रहस्य छिपाए। मैं तेज़ी से नीचे उतर आई थी। कुछ हॉन्ट करता सा देखा था मैं ने, तुम्हारी आंखों में। मेरी हिलती - डुलती आकृति तुम्हारी पुतलियों में प्रतिबिम्बित होकर स्थिर हो गयी थी। तुम्हारी आंखों के प्यूपिल ( पुतलियां ) डायलेटेड( फैले हुए) थे। बहुत पी ली थी क्या पिछली रात?

उन सृजन के दिनों में तुम बहुत अजीब लगते थे। अस्थिर, चिड़चिढ़े, उत्तेजित... चीजें रख कर भूल जाया करते थे और झल्लाते थे रघु पर। खाने के स्वाद को लेकर तुम्हारी जीभ इन दिनों लगभग निस्पंद हो जाती थी... कुछ भी खा लेते थे, बिना मीन - मेख निकाल। ठूंस कर खाया करते एक प्रसवातुर स्त्री की तरह। `दक्षिण भारतीय गरिष्ठ कचरा' (जैसा कि तुम हमारे खाने को आम दिनों में कहते आये हो।) भी।

मेरी हिलती डुलती देह तुम्हें तब भी नहीं दिख रही थी। तुम मुझे देख कर भी नहीं देख रहे थे। मैं हैरान थी - `नाश्ता भी नहीं किया आज तो।' सोच रही थी, न टोकना ही बेहतर होगा। फिर कॉलेज को देर भी तो हो रही थी।

रिक्शे पर बैठ कर भी तुम्हारे बारे ही में सोचती रही थी रास्ते भर। इन दिनों तुम इतने अजीब क्यों हो जाते हो? अप्पा भी लिखते हैं कहानी... पर वे तो सहज रहते हैं...कहानी के बीच उठ कर किरायेदार का हिसाब करते हैं। अम्मा की झिकझिक का करारा व्यंग्यात्मक जवाब देने से नहीं चूकते। बीच - बीच में उठ कर, बाहर खड़े चिल्लाते हुए सब्जी वाले से मोल भाव कर सब्जी भी ले आते हैं। और तुम... तुम इस दौरान, दिन में तो कमरे से बहुत ही कम निकलते हो। हां, देर रात लेखक महाशय, आपकी चोरी पकड़ी जाती है, जब आप पिछवाड़े बनी लकड़ी की सीढ़ियों से चुपचाप उतर कर, नारियल के झुण्ड की तरफ से शहर को जाते छोटे लोहे के विकेट गेट की तरफ निकलते हैं, देर रात, लकड़ी की सीढ़ियों की आवाज़ से तो मैं रंजन मामा के ज़माने से परिचित हूँ। मैं ने कितनी बार ऊपर जाकर देखा है, तुम अपना पायजामा दो वृत्तों के आकार में फर्श पर उतार जाते हो। दो जुड़वां घोसलों सा। रघु को अप्रत्यक्ष हिदायत रहती है कि ` इसे उठाया न जाये'... ताकि जब तुम इस शहर की तंग उदास गलियों में, कब्रिस्तानों में या किसी सस्ते बार या पब से भटक कर लौटो तो बिना समय व्यर्थ किये कपड़े बदल कर, इस जुड़वां वृत्त में फिर से पैर घुसा कर ...ऊपर खींच कर...नाड़ा बांध कर एक कटे तने की तरह बिस्तर पर पड़ जाओ।

मैं कॉलेज से लौट आई तुम नहीं दिखे, रात खाने की मेज़ पर भी नहीं... थक - हार कर किन्ना ने ऊपर ही खाना भिजवा दिया था। मुझे याद है, उस दिन भी तुम रात ग्यारह बजे अपने कमरे से निकले थे...मैं तुम्हारे कमरे के ठीक नीचे वाले अपने कमरे में तुम्हारी गतिविधियों का अनुमान लगाती रही थी। पता नहीं प्रसव पूर्ण हुआ कि नहीं? जिसने जन्म लिया होगा वह कहानी कैसी होगी, कितने वज़न की, कितनी सुन्दर, कितनी स्वस्थ? मोह लेगी क्या वह एक नज़र में सबको?
कमरे में निस्पंद शांति थी। तब तक भी नहीं लौटे थे तुम। मैं प्रतीक्षा में तुम्हारी ही किताब पढ़ रही थी... पुरानी उन्नीस सौ चौरासी में छपी हुई... रूमानियत स्पंदित थी। जब भी मेरी ढेर सारी उलझनें, ढेर से प्रश्न इकट्ठे हो जाते थे तो मैं तुम्हारे शब्दों की शरण लेती थी। जैसे तुलसी की `रामचरित मानस' के आरंभिक पृष्ठों में वह प्रश्नावली है न! जिसमें कहीं भी उंगली रखो, जो अक्षर निकले उससे आठ खाने आगे जाओ गिनकर... फिर वह अक्षर पहले अक्षर से जोड़ लो। ऐसे अक्षर जोड़ते हुए जो शब्द बने ... उससे बनने वाले दोहे में आपके प्रश्न का समाधान छिपा होता है। ठीक वैसे ही... ` तुम इतने उदासीन क्यों हो मेरे प्रति?' के प्रश्न के लिये मैं ने आंख बन्द कर उंगली रखी थी, तुम्हारी किताब के बीच वाले पृष्ठ पर छपे ठण्डे - ठण्डे घोर उदासीन निर्लिप्त से शब्दों पर और समाधान भी मिला था - ``मैं मानता हूँ, कुछ लोग जितना अधिक प्रेम करते हैं उतना ही अधिक चुप और निस्पृही दिखते हैं।''
या फिर कभी - `` मैं प्रेम में उम्र का फर्क नहीं मानता ...''
लकड़ी की सीढियां फिर हल्के से चूं....चर्र करती हुई बज रही थीं। तुम लौट आए थे।
मेरा मन किया था तुम्हें रोक कर पूछूं तुम लेखकों की बहुत पुरानी पीढ़ी का छूट गया अंश हो या कोई बीच की विलुप्त कड़ी! अद्भुत लिखते हो तुम, अनूठा। आजकल कहां होते हैं ऐसे फाक़ाक़श और आवारा लेखक!! अकेले, बरबाद, मुफ्त की शराब पीते, उधार के पैसों पर यायावरी करते।
तभी तुम्हारा एक जूता धप्प से गिरा था...उसके बाद दुगुनी आवाज़ से दूसरा...
बड़े जंगली हो! तुम्हारे कमरे के नीचे भी कोई रहता है। लेखक महाशय।

अचानक ही आ गये थे तुम हमारे शहर में, एकदम अप्रत्याशित - से उस रोज़। किसी अजनबी देश से भटक कर, हमारे प्रदेश की पुरानी ऐतिहासिक झील पर उतर आये एकाकी मुर्गाबी से। बिना फोन, बिना तार यहां तक कि पोस्टकार्ड पर दो पंक्तियां लिख कर डाक में डाल देने की जहमत तक नहीं उठाई गयी थी तुमसे। अम्मा कितना भुनभुनाई थीं। मैं अपना पावड़ा(लहंगानुमा वस्त्र) झाड़ते हुए द्वार पर रंगोली डाल कर फर्श से उठी ही थी, कि एक ऑटो स्र्का था...तुम ऑटो वाले से हिन्दी में फिर अंग्रेजी में, दोनों में झगड़ चुके थे...तब मैं ने बीच में व्यवधान डाला था...।
`` मुझे नायर महाशय से मिलना है।'' तुम एक्सेन्ट फ्री अंग्रेजी में बोले थे। तुम्हारी नमकीन आवाज़ कोच्चि की नम हवा धीरे - धीरे सोख रही थी।
`` जी, मैं उनकी बेटी हूँ।'' चौंके थे तुम मुझे हिन्दी बोलते देख, वह भी `मल्लू'
( मलियाली) एक्सेन्ट से मुक्त !!
`` मैं मुझे महेश जी ने दिल्ली से यह पत्र देकर भेजा है।'' तुम हाथ डाल - डाल कर लगभग पांच मिनट तक तो जेब में पत्र ही ढूंढते रहे थे, मगर एक चाभी का गुच्छा, लगभग खाली वॉलेट नीचे निकल कर ज़रूर सड़क पर जा गिरा, मगर पत्र नहीं मिला।
कई उत्सुक चेहरे आस - पड़ोस के खिड़की - दरवाज़ों से झांकने लगे थे।
`` वो आप अच्चन को ही दिखाइयेगा। पहले आप अन्दर तो आयें।'' मुझे तुमने अपना संक्षिप्त सा सामान एक छोटा सूटकेस और हैण्डबैग उठाने नहीं दिया था। तब तक अच्चन बाहर आ गये थे।
``ओह! आप ही हैं ना मलय! सौभाग्य है मेरा कि आप यहां आये। कल रात ही महेश जी का फोन आया था।''
तुमने मेरी तरफ अजीब तरह की राहत से देखा था, देखा,...पत्र नहीं मिला तो क्या...फोन तो आ गया न।

मेरा दिल धक्क से रह गया था ...यही हैं मलय... वो कहानीकार! वही जिनकी कहानियों के अंश चिन्हित कर सहेलियों को पढ़वाए हैं।
``यू ब्लडी सैडिस्ट ...'' जब भी तुम्हारी कहानियां पढ़ती मैं, उसके बाद फ्लैप पर छपी तुम्हारी तस्वीर देख कर यही फुसफुसाया करती थी। तस्वीर में तुम अलग दिखते थे, मुस्कुराते हुए, पर अभी साक्षात देख कर मुझे आश्चर्य हो रहा था... यह ठण्डा सा, क्रूर सा दिखने वाला व्यक्ति ऐसी भी कहानियां लिख सकता है? `` यू... सैडिस्ट।''

`` मैं महज आया ही नहीं हूँ, एक लम्बे अरसे तक ठहरूंगा। ... पहले आप इस ऑटो वाले को चलता करें।'' ऑटो के पैसे भी अच्चन को ही चुकाने थे! क्योंकि तुमने पता ठीक से मालूम न होने के चक्कर में पूरा कोच्चि घूम डाला था ऑटो में और जो बिल था वह तुम कैसे चुकाते? तुम्हारे पास पैसे चुक गये थे और तुम्हें अगले पूरे सप्ताह अपने नये उपन्यास की रॉयल्टी की प्रतीक्षा करनी थी।
``आप पत्र डाल देते तो यहां के गेस्टरूम में आपका इंतजाम करके रखता।'' अच्चन ने ऑटोवाले को पैसे चुकाते हुए कहा था।
``वह समयाभाव के कारण संभव न हुआ। दरअसल कुछ और ही कार्यक्रम था और कुछ और ही बन गया।... महेश जी बंगलोर तक तो साथ ही थे। फिर ... मेरी लापरवाही रही। क्षमा करें असुविधा हुई हो तो।दरअसल केरल से गुज़रते हुए मुझे महसूस हुआ कि मुझे यहां स्र्कना चाहिये और यहां के बारे में भीतर तक जानना चाहिये। और उसके लिये मुझे किसी गेस्टहाउस की नहीं एक केरलीय परिवार के सान्निध्य में रहने की आवश्यकता महसूस हुई। तो महेश जी ने...''
`` अच्छा - अच्छा। यह बहुत ठीक किया आपने... हमें प्रसन्नता होगी आपकी मेहमाननवाज़ी में। अंदर बैठक में चल कर बात करें।... मालि, अम्मे डेढत चाय, कोरचि पलहारन कोंडुवराम परियु( मालि, अम्मा को बोल कि कुछ नाश्ता और चाय भेजें)... दरवाज़े पर ही परदे से खेलती हुई मैं तुम्हें हैरत से देख रही थी...कि अच्चन ने फिर टोका... ``और सुनो मालि रघु की सहायता से ऊपर रंजन मामा वाला कमरा ठीक करवा दो।''
`` रंजन अम्मावण्डे मुरी एन्दन कोड्कुनु? (रंजन मामा का कमरा क्यों...)''
`` न्यान एन्दपरन्यु अदु चैय्यु! (जो कहा है वही करो...)''
`` जी अप्पा...''

तुम बड़े बेमन से उपमा खा रहे थे। मुझे मन ही मन हंसी आ रही थी।
``पेट्टु पोई एस्र्तुकारन ( बुरे फंसे लेखक महाशय!)''

रंजन मामा का कमरा! अतिविशिष्ट कमरा है वह। उस कमरे में दोनों ओर खिड़कियां हैं... एक तरफ रबर, कॉफी और नारियल के पेड़ों का विशाल अहाता है। दूसरी तरफ बैक वाटर्स का नज़ारा देखने को मिलता है। नीले मखमली परदे, टीक वुड का पुराना फर्नीचर। उनकी जीती हुई ट्रॉफियां, मढ़े हुए प्रशंसा पत्र। दुर्लभ कलाकृतियां, कुल - मिला कर एक जादुई संसार, जो मुझेबचपन से आकर्षित करता था। मेरी स्मृति में हैं वे पल, जब पीला - लाल पावड़ा, कभी साटन की हरी फ्रॉक पहने हुए, रिबन वाली दो चोटी किये हुए, गाल पर काजल का दिठौना लगाकर मैं मामा को छुप - छुप कर देखा करती थी... उनका एक - एक क्रियाकलाप। उनका सिगरेट पीते हुए रॉकिंग चेयर पर कुछ सोचते रहना। किताबें पढ़ना। सच्ची! रंजन मामा शाही आदमी थे। अब लन्दन में रहते हैं। लेकिन जब भी लौटते हैं वे अपने कमरे में ही ठहरते हैं। इसी कमरे में बन्द हो अम्मा के साथ घण्टों बातें करते हैं।

मेरे मन में उछाह जगा था कि आज मैं फिर मामा का कमरा खोलूंगी और कुछ अंग्रेजी रूमानी कविताओं की किताबें निकाल लाऊंगी। जो आज दिल्ली की बेहतरीन किताबों की दुकानों में भी दुर्लभतम हैं।
तुम्हें पता नहीं, पता हो के न हो। हम मलियाली नायरों में मातृसत्तात्मक परिवार होता है। ये जो टीक की मूल्यवान लकड़ी के दरवाज़ों और खंभों तथा फर्श का एक वृत्त में बना विशाल घर है, वह मेरी मां का है, जो विरासत में मुझे मिलेगा। पर कौन रहना चाहता है यहाँ? मैं बाहर निकलना चाहती हूँ, अच्चन की तरह। आपकी तरह। घुमक्कड़ी करना चाहती हूँ। मेरी मां ने कभी यह कस्बा नहीं छोड़ा और पिता बहुत कम यहां रहे। उनका एक पैर दिल्ली तो एक पैर कोचीन में रहता था। अच्चन मलियाली - हिन्दी दोनों भाषाआें के बड़े विद्वान हैं। केन्द्रीय साहित्य संस्थान में कार्यरत रहे हैं। उनका हिन्दी प्रेम मुझे विरासत में मिला है।
अम्मां सच में तुम्हारे आगमन से खुश नहीं थीं। न पहले न बाद में।
बाद में अच्चन अम्मां को समझाते रहे थे।
`` तुम तो समझती नहीं हो। अरे बड़े विद्वान हैं, बहुत बड़े लेखक। देस - परदेस घूमना और लिखना ही इनका काम है। ... कम उमर में इतना बड़ा लेखक कोई यूं ही नहीं बन जाता। और फिर जिन महेश जी का ये पत्र लेकर आये हैं। दिल्ली में उनके खाली फ्लैट में मैं बिना किराया दिये पूरे दो साल रहा हूँ।''
`` मट्टु ओरू एर्तुकारन, ओरू अनम पोराचिटू मट्टू ओरणम कूडीम... ( एक ही लेखक क्या कम था... सो ये दूसरा और) हं... लेखक! ये तो पूरी की पूरी प्रजाति ही बेकार...'' अम्मा बड़बड़ाती हुई संकरे गलियारे में से अपनी साड़ी का आंचल पिता से बचाते हुए आंगन की ओर निकल गयी थी। पिता ने बुरा सा मुंह बना कर उन्हें घूरा। और हिन्दी में बोले - `` मैं अछूत हूँ ना। छू जायेगी, मालि तेरी मां मुझसे तो ...तो वो भी अछूत हो जायेगी।'' मुझे हंसी आती थी अपने अच्चन - अम्मां के इस अनूठे रिश्ते पर।


मैं चौंक ही गयी थी, उस शाम जब घनघोर बरसात हुई थी और तुम कमरे के पीछे वाली बालकॉनी में रॉकिंग चेयर निकाल कर बैठे थे। बिलकुल रंजन मामा की तरह सिगरेट पी रहे थे। और स्वनिर्मित धुंए के धुंधलके में कुछ सोच रहे थे। मुझे भ्रम हुआ था रंजन मा%मा! फर्क था तो बस नीले खादी के कुर्ते और सफेद पायजामे में... रंजन मामा पूरे विलायती थे। मन में हूक उठी थी। रंजन मामा के आकर्षण में मेरी पूरी किशोरावस्था स्वाह हुई थी। न जाने किसने...शायद अम्मुमा (नानी) ने मेरे मन में बात डाल दी थी कि तेरी शादी तो रंजन से होगी। बाहर की दुनिया में चाहे जितने विरोधाभास हों... मेरे अन्दर की दुनिया में हमेशा से रंजन मामा मेरा पहला प्रेम थे और रहेंगे। अब इस भरी - पूरी युवावस्था की बरबादी के बाइस क्या तुम बनना चाहोगे? इडियट, उम्र का तो फर्क कभी देख लिया कर। पहले रंजन मामा अब...

रंजन मामा की आकृति में और तुम्हारी आकृति में तो कोई मेल नहीं था। तुम लम्बे और गोरे हो... हल्की सलेटी आंखों वाले। वे सांवले और मध्यम कद के सुन्दर काली आंखों वाले पुस्र्ष हैं। कभी वो भी बहुत रूमानी थे। कोच्चि के कॉलेज की लड़कियां उन पर फिदा थीं। उनमें से एक सुन्दर क्रिश्चन लड़की घर भी आती थी। पर रंजन मामा ने सबका दिल तोड़ा, यहां तक चौदह साल की अपनी इस भांजी का भी और लंदन में ही एक विदेशी स्त्री से शादी कर ली।

रंजन मामा का कमरा देखते ही तुम कुछ परेशान हुए थे।
``नायर साहब, इतनी भव्यता की आदत नहीं है मुझे। कोई छोटा, खाली, कोने का कमरा ही चल जाता।''
`` मलय जी, इस कमरे में अंग्रेजी के एक बड़े लेखक - फिलॉसॉफर का जन्म होते - होते रह गया। इस कमरे की दीवारों में विश्वसाहित्य बसा है। यह मेरे साले रंजन का कमरा है, जो कि यू. के. में बिज़नेस टायकून है।इस कमरे में जितनी आलमारियां आप देख रहे हैं न, विश्वप्रसिद्ध, दुर्लभतम पुस्तकों से अंटी पड़ी हैं। यहीं रहें,आपको कुछ दिन में अच्छा लगने लगेगा।''
तुमने अपेक्षाकृत कम सामान वाला खाली कोना अपने लेखन के लिये चुना था। उस कमरे की विशाल टीक की स्टडी टेबल तुम्हें बहुत पसन्द आई थी। वहीं पास ही नीचे एक गद्दा बिछवा कर तुमने सैटी बना ली थी। जब टेबल पर लटके हुए पैर थक जाते थे तो तुम नीचे डेस्क लगाकर लिखा करते थे।सिवाय उन बरसाती रातों के, खिड़कियों में से बौछारें आकर जब गद्दा भिगो जाती थीं।

आरंभ के दिनों में तुम नीचे बिलकुल नहीं उतरे। नाश्ता, खाना, अन्य चीज़े स्वत: ही अच्चन रघु से कहकर ऊपर पहुंचवा देते थे। पता नहीं कौनसी कहानी लिख रहे थे। `भीषण' शब्द तुम्हारी ही देन है... यकीन मानो मुझे भीषण उत्सुकता हो रही थी।

थोड़े दिनों बाद तुम्हारी देखभाल का जिम्मा मेरे ही सर आ पड़ा था। अम्मा तुमसे चिढ़ती थीं। नानी बूढ़ी हो चली थीं। रघु को सुबह के समय हमारे कॉफी, रबर और नारियल के बाग में मजदूरों को भी देखना होता था। बस किन्ना थी, जो रसोई बनाती थी।
``किन्ना हमारी नौकरानी नहीं है। वह हमारे दूर की अनाथ रिश्तेदार है, बचपन से ही मेरे साथ रही है। इसकी भी...शादी पक्की हो गई है।'' एक बार तुम्हें बताया था मैं ने।
``इसकी भी... से क्या मतलब? तो तुम्हारी भी...''
``हट्...।''

एक दिन सुबह सुबह मैं ने देखा तुम किन्ना को आलू परांठा बनाना सिखा रहे थे। अम्मां के शुद्धतावादी आचरण को ताक पर रख। मैं ने हड़बड़ा कर पूछा था।
`` मलय जी, आपकी जाति क्या है?''
``मैं कहूँ मुसलमान तो?''
``अइयय्यो!'' किन्ना डर गई थी।
``हट् ! नाम तो हिन्दु है।''
``पर क्यों?''
``अम्मां की रसोई में बस सवर्ण घुस सकते हैं। शुद्ध शाकाहारी और वह भी स्नान - ध्यान के बाद।''
तुम मुस्कुराये थे। फिर किन्ना भी। और मैं भी।

पहले एक सप्ताह तोे तुमने अनमने मन से केरलीय व्यंजन खाये थे। फिर किन्ना की बदौलत आलू का परांठा और दही मिलने लगा था तुम्हें। दोपहर के खाने में तुम्हें चावल, सांभर - रसम जो बनता था खाना ही होता था क्योंकि दोपहर का खाना अम्मा...पूरी तरह अम्मा के नियंत्रण में होता था। सुबह का नाश्ता किन्ना और मेरी ज़िम्मेदारी थी। तब अम्मा पूजा - पाठ, शहर के मंदिरों के दर्शन में व्यस्त रहती थीं। वही वक्त था, जब मैं तुम्हारे साथ होती थी। यही वक्त होता था, जब तुम लिख नहीं रहे होते थे। यही वक्त था, जब हम बातें करते।
``क्या लिख रहे हैं?''
``एक लम्बी कहानी।''
``प्रेम पर!''
`` न्ना।''
``आपकी पुरानी कहानियां पढ़ी हैं मैं ने। `रोमान्स' शब्द से चिढ़ने वाले अच्चन ने मुझे आपकी किताबें पढ़ने को दी थीं। पर वो रूमानियत कैसी थी। सचमुच भीषण, बीहड़, सघन, कठोर। झरती हुई... मरती सी...दुखाती हुई।''
`` अब नहीं लिखता वह सब।''
`` क्यों?''
``चुक गया वह सब। प्रेम शब्द ही अब वह थ्रिल पैदा नहीं करता।''
``यह शब्द तो व्यापक अर्थों वाला है, केवल थ्रिल और उत्तेजना के अतिरिक्त बहुत कुछ होता है इस शब्द में।''
`` शब्द का जो भी शाश्वत अर्थ हो, पर इसकी परिभाषाएं सबकी सब खोखली हैं। अब इस पर लिखा जाना महज दोहराव भर है।''
`` बहुत प्रेम कर लिया क्या?''
`` हां, हरेक करता है, प्रेम करने की उम्र में...''
``प्रेम करने की भी कोई खास उम्र होती है क्या?''
``नहीं होती क्या? तुम हो न उस उम्र में!''
तुम्हारे उस अप्रत्याशित उत्तर से अचकचा गई थी मैं। पर यह वार्तालाप अपने आप में एक थ्रिल था। एक शुस्र्आत और एक उत्प्र्रेरक का काम कर सकती थी, यह मुसलसल बातचीत।
``हो सकता है, पर पात्र भी तो हो न!''
``हैं तो! तुम्हारे मंगेतर, डॉ. साहब।''
`` तो अच्चन ने बता ही दिया आपको।... लेकिन ऐसे क्या प्रेम हो जाता है? आप तो गूढ़ मनोविज्ञान की कहानियां लिखते हैं। इतना सरल मनोविज्ञान नहीं पता!''
`` पता है वनजा...''
`` अय्यो, वनजा नहीं.....वनमाला।''
`` वनमाला...कहां हो तुम... वनजा हो इस जंगल से उपजी...'' तुमने बैक वाटर्स की तरफ फैले पेड़ों की कतारों की तरफ इशारा किया।
`` तो तुमने मेरी सारी कहानियां पढ़ी हैं... वह नहीं पढ़ी ` एकालाप ' जिसमें असफल प्रेम की व्याख्या की गई है।''
`` पढ़ी है...''
``फिर ...''
`` फिर क्या...आपका मन एक कब्रिस्तान मालूम होता है।''
``अच्छा! कैसे?'' तुम हंसे थे खुलकर,अपनी रुंधी हुई सी हंसी के खोल से बाहर आकर।
``हर कहानी एक कब्र एक प्रेम की!'' फिर ... कुछ ही पलों में हंसी में से नमी बिखर गयी थी...हवा में। एक खारी हंसी बची रही...समुद्र से होकर आने वाली हवाओं की तरह।

आने वाले दिनों में एक दिन वह भी तो था... जब शाम ढलने के साथ ही ... हम छोटे टैरेस पर थे जहां से समुद्र में बियर के झाग से रंग की लहरें उठती दिख रही थीं। तुमने मेरे ताज़ा धुले बालों को सूंघ कर पूछा था, `` किससे धोए हैं? बहुत अलग तरह की महक है!''
मुझे तुम्हारे उपन्यास की एक पंक्ति याद आ गयी। ``महीने के खास दिनों में लड़कियां अलग तरह से महकती हैं।'' मैं हतप्रभ थी, मेरी पारदर्शी आंखों से हैरानगी के भाव बटोरते हुए तुमने कुरेदा तो मैं ने एक हिचक तोड़ कर बता ही दिया था। तुम बहुत देर चुप रहे...फिर मुस्कुरा कर बोले थे।
``मैं तो लिख लिखा कर भूल जाता हूँ, मुझे याद नहीं। लिखा होगा...''
``तो उस सब का कोई अर्थ नहीं?''
`` अरे...लिखते वक्त जो मन में आता है लिखते चले जाते हैं। एक सहज बहाव के तहत।''
``प्रेम प्रसंग भी...''
``हां और क्या?
मेरा मन टूटा था...जिन शब्दों पर उंगलियां फिरा कर मैं जीवन के अर्थ खोजती हूँ, उन्हें ये लिख - लिखा कर भूल - भाल जाते हैं! मैं उदास हो गयी थी। तुम मेरी उदासी को पहले गौर से देखते रहे थे। फिर मेरे बाल मुट्ठी में भींच कर बारहा सूंघते रहे।
मैं ने तुमसे पूछा था, `` मैं जाऊं?''
`` नहीं... बात करो न...''
``क्या?''
``वही कब्रगाह... मेरा मन! तुम ठीक ही कहती हो शायद मेरा मन एक कब्रिस्तान है... जिसे यादें आकर कभी - कभी बुहार जाती हैं।...बहुत सी बातें हैं ...बहुत से पश्चाताप...
`` बहुत जटिल हैं आप... असाधारण...।''
`` हां ... असाधारण परिस्थितियों में असाधारण माता - पिता से जन्मे बच्चे का जीवन साधारण कैसे होता?''
``...? '' तुमने मुझे अपने बहुत करीब बिठा लिया था, और मानो स्वगत बोल रहे थे। रॉकिंग चेयर पर हिलते हुए...
``जानना चाहोगी?... तो सुनो... मेरे पिता एक गांधीवादी स्वतन्त्रता सेनानी थे। सम्पन्न, सभ्रान्त...। मेरी मां, मेरे पिता की दूसरी गैरकानूनी पत्नी थीं ... वे एक नेपाली महिला थीं। उन्होंने मेरे पंद्रह वर्ष के होने के बाद पिता से अलग हो ... बौद्ध धर्म अपनाने का निर्णय ले लिया था। मैं पिता से अधिक मां से निकटता महसूस करता था...उनके इस निर्णय ने मुझे बुरी तरह सहमा दिया था। आज चालीस की उम्र में मैं उनकी विरक्ति को शायद समझ सकता हूँ, पर तब पन्द्रह वर्ष की उम्र में... मैं उनसे यही पूछता कि - अभी इतनी जल्दी क्यों? मेरी समझ में भिक्षुणी बनने के लिये वह बहुत अधिक सुन्दर और युवा थी... उनका उत्तर दार्शनिकता भरा होता था... एक पका सेब जब धरती पर गिरने को होता है, तो कहां निश्चित होता है कि वह कब गिरेगा!

मेरे माता - पिता का प्रेम भी उनकी तरह ही असाधारण और असीम था...बिना कैफियतों वाला, अपेक्षारहित...पर मैं!''
``फिर?''
``फिर क्या ...मां के चले जाने के बाद मैं थोड़े दिन पिता के सयुंक्त परिवार की भीड़ का हिस्सा बना रहा। फिर मेरी चुप्पी और उदासी देख पिता ने जल्दी ही बोर्डिंग में डाल दिया। फिर मैं कभी पिता के पास नहीं लौटा। मुम्बई चला गया।''
``शादी क्यों नहीं की?''
``उससे क्या फर्क पड़ता?''
``बंधे रहते। खुश रहते।''
``बंधकर कौन खुश हुआ है?''
``प्रेम भी नहीं किया हो ऐसा नहीं हो सकता! हर कहानी में तो असफल - अनैतिक प्रेम ...''
`` अरे तुम तो एक साइकियाट्रिस्ट की तरह बात कर रही हो, न तुम साइकियाटिस़्ट हो, न मैं कोई साइकियाट्रिस्ट के सामने आंखें मूंदे बैठा एकालाप करता मरीज़... कि वर्तमान की उलझनों को लेकर अतीत के उलझे ढेर में हम कोई सिरा ढूंढे?'' तुम हंस कर उठ गये थे रॉकिंगचेयर से। छत की रेलिंग के पास जा खड़े हुए...सिगरेट सुलगाते हुए।
`` तुम्हारी एक बात सच है... दूसरी अर्धसत्य... सच कहूं तो ...मेरे बहुत सी स्त्रियों से सम्बन्ध बने और टूटे हैं। पर सम्बंधों में अकुशलता की वजह मैं अपने परिवारहीन अतीत को नहीं देता। मेरे माता - पिता अपनी अपनी स्वतन्त्र प्रज्ञा के साथ एक दूसरे को प्रेम करते थे। मेरी दृष्टि में उनका एक सफल प्रेम विवाह था। पिता स्वतन्त्रता सेनानी बन जेल चले गये...मां तिब्बत चली गयी। यही एक महान प्रेमकथा का अंत था। उस कथा में से छिटक कर गिरा एक असफल पल जो था... वह मैं था।
मैं ने भी जितने प्रेम किये वे असाधारण थे... हर स्त्री जिससे जुड़ा असाधारण थी... दूसरी से भिन्न। हर रिश्ते की गति दूसरे से भिन्न... बल्कि उनकी टूटन भी अलग - अलग किस्म की थी।
`` फिर क्या मिला हर बार...''
`` एक आह... सच पूछो तो मेरा कोई भी रिश्ता एक रात का रिश्ता नहीं रहा... सबके सब गंभीर - गहन रिश्ते थे। ...''

मैं उन तथाकथित `असाधारण मोहब्बतों' के किस्सों को नहीं सुनना चाहती थी, जिनमें से कब्र के ऊपर जलते लोबान की - सी महक आती हो, नहीं खोलना चाहती थी, तुम्हारे प्रेम की कब्रें। मैं बात बदलना चाहती थी।
`` आपका खर्च कैसे चलता होगा? घर...? नौकरी भी नहीं करते...?''
तुमने भी एक ठण्डी सांस लेकर उन कबों को न खोलना ही बेहतर समझा।
`` मेरा काम तो चल ही जाता है। किताबों की रॉयल्टी... कहानियों - अनुवाद का पैसा। दोस्तों की मेहरबानी। वैसे पिता ने बैंक में मेरे नाम पैसा रख छोड़ा है... एक फ्लैट भी...पर मैं उस पैसे को छूता तक नहीं...अब तक तो ज़रूरत भी नहीं पड़ी। फ्लैट में तिब्बती गरीब लड़के रहते हैं, मां के भेजे हुए। मैं बरसों के उसी किराये के कमरे में रहता हूँ...जिसकी मुझे आदत है, मेरा तिकोना कमरा।...वह कमरा याद आ रहा है,वनजा...अब मैं जल्द ही चला जाऊंगा।''

उसके कुछ दिन बाद मेरा नया स्कूटर आया था और सीखते में मैं ने स्वयं को घायल कर लिया था। कोहनी में चायनीज़ ड्रेगन के आकार की गहरी - लम्बी चोट लगी थी और कन्धा ज़मीन से टकराने की वजह से वहां की मांसपेशियों पर आघात पड़ा था और मैं सीधा हाथ उठाने में असमर्थ थी। तुम अब उस कहानी पर गंभीरता से काम कर रहे थे। अपने कमरे में बन्द। प्रसवपीड़ा से जूझते। किन्तु रघु से यह सुनते ही तुम एक बार नीचे उतरे थे। मेरा कमरा पहली बार देखा था तुमने, गौर से देख रहे थे। रंजन मामा के कमरे जितना ही बड़ा और उसी गोल आकृति का, पारंपरिक केरलीय ढंग का बना, लकड़ी का फर्श, छत लकड़ी की,। तुम अब एक दीवार पर पुराने खानदानी श्वेत - श्याम चित्रों के समूह को देख रहे थे ... ये चित्र इस कदर बेतरतीबी से लगे थे कि वह बेतरतीबी भी मुझे कलात्मक लगने लगी थी, तुम्हारे कमरे में आने से। अब तुम पलंग के पीछे तंजौर की बड़ी विशाल और पुरानी पेन्टिंग देख रहे थे। खिड़कियां इस वक्त बन्द थीं सो कमरे में हल्की रोशनी थी। लकड़ी की छत पर पीतल के कुन्दों पर एक घुड़सवार के आकार वाले दो दीपदान लटके थे। टीक का बड़ा पलंग, जिस पर नीली मच्छरदानी तनी थी, उसके बीचों बीच लेटी थी मैं... कमरे के हल्के उजास में तुम्हें मैं नहीं दिख रही थी...पर मैं तुम्हें साफ - साफ देख पा रही थी।
अच्चन ने पुकारा था, `` वनमाला''
मैं चौंकने का नाटक कर उठ बैठी थी। अच्चन ने मच्छरदानी हटा दी। मेरा मलिन चेहरा तुम्हें देख कर `उन्हें देखे से जो आजाती है चेहरे पे रौनक' की तर्ज पर उद्भासित हो गया था।
`` फ्रैक्चर तो नहीं हुआ न?''
मैं ने सर हिला दिया था। मैं ध्यान से तुम्हें देख रही थी। सप्ताह के एकांतवास और आराम ने तुम्हारी उम्र कम कर दी थी क्या?
``नहीं पर मोच ठीक होने में चार - पांच दिन लग जायेंगे।'' अच्चन ने उत्तर दिया
`` कभी - कभी बीमार होना अच्छा होता है। अवकाश मिल जाता है जीवन के बारे में सोचने का। दूसरों का लिखा हुआ पढ़ने का। मैं तो कभी - कभी चाहता हूं लम्बा बीमार पड़ना। इन्हें पढ़ डालो।'' कह कर तुम मेरी आंखों में झांक कर हल्का सा मुस्कुराये थे। तुम्हारे हाथ में कुछ मोटी - मोटी किताबें थीं। मैं हैरान थी ये कैसी मिजाज़पुर्सी है?


एक ओर मैं तेज़ टीस भरे दर्द और दवाओं के असर से हल्के पड़ते दर्द की बीच की स्थिति में झूल रही थी। चोटिल, हरारत में डूबी। दूसरी ओर हल्की नीली छांह सी दैहिक उत्तेजना, जलते बुखार और दर्द की पटपटा कर जलती पीली लौ के बीच उभर रही थी। ऐसे में तुम्हारे सद्यप्रकाशित क्रान्तिकारी उपन्यास के बीचों - बीच नक्सली नायक और पत्रकार नायिका का प्रेम प्रसंग ...मुझमें शब्द दर शब्द वह दृश्य जाग रहा था। मुझे तुम्हारी एकदम ठण्डी, अस्पन्दित हथेलियों की चाह जागी थी, मेरे बुखार को थामती, दर्द को सहलाती, खुमार को पीती हथेलियों के स्पर्श की चाह!
पहली बार बीमार होना बड़ा स्र्मानी लगा था। करारे दर्द और तेज़ बुखार में सारी भावनात्मक हलचल थम गई थी, एक दर्शन उपजा था, देह का दर्शन। मैं ने तुम्हारी सारी किताबें निकाल लीं थीं और ढूंढ ढूंढ कर तुम्हारी किताबों में से तप्त प्रेम प्रसंग बार - बार पढ़े थे।
छि: कितने निर्लज्ज हो उठे थे तुम कई जगह! उफ! मेरी उत्तेजना का पारावार न था।
उसके बाद मुझे नहीं पता मैं कैसे तीव्र ज्वर की अवस्था में ही तुम्हारे कमरे के बाहर थी...तुम जाग रहे थे। सिगरेट की तीखी गंध...खिड़की से छन कर आ रही थी।
शायद खिड़की के पास बैठे थे तुम और तुमने मेरी परछांई को दीवार पर कांपता हुआ देख लिया था। तुम हड़बड़ा कर बाहर आ गये थे।
``यहां क्यों? इस वक्त?''
``मुझे नहीं पता।''
``अरे!''
``मुझे वह कहानी दिखा दो...''
``कौनसी...''
``वही जो तुम मुझ पर लिख रहे हो।''
``अभी तो नहीं लिख रहा पर...हां लिखूंगा... तुम पर भी ...कभी, एक थी वनजा...बड़ी काली आंखों वाली...एक था...सुरेश...'' तुम बहला रहे थे मुझे, मेरी बुखार और उत्तेजना से उपजी ज़िद को।
``...... नहीं जो लिख रहे हो तुम...।''
``उसमें तुम नहीं हो।''
``मुझे पता है उसमें हूं मैं, रोमान्स है। नहीं तो तुमने उस रात मेरे बाल क्यों सूंघे थे?''
तांबई रंग का चांद निकल आया था । समुद्र के झागों की उस झालर में पिघले तांबे की तरह चांद से चांदनी टप - टप गिर रही थी।
``तुम जाओ नीचे...''
``नहीं।'' मैं ने ढीठ की तरह अन्दर आकर डेस्क पर पड़ा कहानी का कटा - फटा अधूरा ड्राफ्ट उठा लिया था। तुमने बुरी तरह से मेरे हाथ से कागज़ छीन कर मुझे धकिया कर पलंग पर गिरा दिया था। ``इसमें कहीं तुम नहीं हो, और कुछ भी तो रूमानी नहीं। बेवकूफ!''
दैहिक उत्तेजना ने मुझे आत्मविस्मृत कर डाला था। रंजन मामा बुरी तरह याद आ रहे थे। इसी पलंग पर अपनी प्रेमिका को घनी उत्तेजना से चूमते हुए। चैत के उस माह में मेरी देह में गेहूं का सुनहरा खेत पक रहा था, तुम उससे होकर गुज़रते। मैं चाहती थी ...मेरी थर थर कांपती देह की बिखरी हुई सुनहरी रेत को तुम समेटते...

तुम ने ऐसा कुछ नहीं किया। गुस्से में उस रॉकिंग चेयर पर बैठे सिगरेट फूंकते रहे। मैं सन्निपात के मरीज़ की तरह कुछ बड़बड़ा रही थी... तुम्हें कोई सहानुभूति नहीं हो रही थी मुझसे ... न जाने कब अच्चन आकर खड़े हो गये... घनघोर आश्चर्य और क्रोध में उनकी फैली आंखें... मैं डर गयी थी... तुम नहीं डरे थे। वैसे ही सिगरेट पीते रहे। तुमने कोई सफाई देने की कोशिश भी नहीं की।
वे मुझे ढकेलते हुए ले गये थे। मेरी कोहनी का घाव दरवाजे के एक कोने से टकरा कर फिर खुल गया था... खून टपकता रहा था...।
तूफान तो उठा था...पर एक प्रतिष्ठित परिवार की मर्यादाआें की परतों में...दबा - ढंका। तुम तक जो पहुंचा वह महज एक क्रूर आग्रह था। मेरी तमाम सफाइयों, तुम्हारे पक्ष में दी गयी मेरी सारी दलीलों के बावज़ूद।
`` मलय जी, वनमाला के विवाह की तारीख तय हो गयी है। जल्द ही घर मेहमानों से भर जायेगा।आपको असुविधा न हो इसलिये आपकी व्यवस्था मैं कहीं और करा दूं? या आपका सृजन पूरा हो गया हो तो दिल्ली का रिज़र्वेशन...।''
अपमान से तुम्हारा चेहरा पहले लाल फिर बैंगनी और फिर काला पड़ गया था। फिर भी सफाई में एक शब्द तुमने नहीं कहा।
`` लौटना ही बेहतर होगा...नायर साहब।''

आज फिर तुम समाधिस्थ हो। तुम्हारी इस समाधि में सृजन नहीं आत्मपीड़न है। मेरा मन डूब रहा है। किन्ना चुपचाप मेरी छटपटाहट देख रही है और फिर तुम्हें। मैं मोहग्रस्त हूँ, तुम्हारे लिखे शब्दों का मोह है मुझे। आवाज़ का मोह। तुम्हारे उस पूरे खारे - खारे व्यक्ति के भीतर की नर्म मधुरता का मोह भी। तुम उम्र के गुज़रते प्रवाह के किनारे उदास एकाकी बैठे हो ...मैं तुम्हारे जीवन की तरफ पलट आने की प्रतीक्षा में हूँ।

तुम कल चले जाओगे...तुम्हारा बंधा हुआ संक्षिप्त सामान बता रहा है। तुमने सब समेट लिया है, अपने अटपटेपन का विस्तार, अपने बिखरे हुए स्व को भी... बागान के पीछे को खुलती खिड़की के नीचे मुझे तीन टूथपिक मिले, मैं ने सहेज लिये हैं। थोड़ा आगे बढ़ी तो ढेर सारे फटे पन्ने... उफ यह तो वही कहानी है, जिसे तुमने मेरे सामने शुस्र् किया था...

रात तुम फिर कमरे से निकले हो, सुबह आठ बजे तुम्हारी ट्रेन है फिर भी। वहीं कुख्यात वेलु के गन्दे सस्ते बार में! गलियों के गुंजलकों में भटकते हुए... लौटोगे बीच रात...
धप्प से एक जूता गिरा है पलंग से... लौट आये हो तुम। एक बजा है। मैं सुबह पांच बजे तक जागती हूँ, शायद तुमने शिष्टता की याद आने पर संकोचवश दूसरा जूता चुपचाप नीचे रख दिया होगा।
``वीनडुम पेट्टु पोई, एस्र्तुकारन''( फिर, बुरे फंसे लेखक महाशय!) कह कर मैं हिचकियों के साथ रो पड़ी हूँ।
सुबह पांच बजे, थक हार कर सो गयी चेतना को जगाती है एक खुमार में डूबी हुई आवाज़... जो ज़्यादा अभिव्यक्त नहीं करती। बहुत कम शब्दों वाली बेहद आकर्षक आवाज़। जैसे कम मनकों की माला... जैसे कम चट्टानों वाली प्रवाहमयी नदी। यह आवाज़ मेरे मोह को छलती रही है।
`` प्रेम - व्रेम नहीं होता अब हमें।'' प्रेम का ज़िक्र चलने पर।
``और कोई नई ताजा खबर?'' मेरे कॉलेज से लौट कर तुम्हारे कमरे में आने पर।
और आज भोर के मटमैले धुंधलके में धुंआ होती तुम्हारी छाया से फिर वही आवाज़ उठी है`` चलता हूँ वनजा...''
इस पल ऐसा लग रहा है मानो इस जगत की विराट् सत्ता में सब शून्य हो जायेगा अगर यह आवाज़ न रही तो, जैसे आसमान से धरती के बीच यह नमकीन आवाज़ सेतु बांधती रही हो। मेरा मन चीख कर कहना चाहता है - हां, हां मैं ने छुई थी तुम्हारी कहानी। तो क्या हुआ? तुमने उसे तज क्यों दिया? तजा ही नहीं बल्कि ठीक चिड़िया की तरह घोंसले से नीचे लुढ़का भी दिया! मैं क्या अछूत हूँ?''
देखो वो कहानी के टूटे खोल मेरे पास अब भी हैं। उफ! किस कदर फाड़ा हैं कहानी के ड्राफ्ट को कि कोई अंश किसी से नहीं जुड़ता। मैं देर तक डायनिंग टेबल पर उस कहानी के टुकड़े लिये, जिगसॉ पज़ल की तरह उसे जोड़ने की कोशिश में लगी रही हूँ।

अपने आपको ढूंढ रही हूँ मैं। तुमने ठीक ही कहा था, इस कहानी में सच ही कुछ भी...कहीं भी... मैं तो सच ही में कहीं नहीं हूँ। एक बूढ़ा ज्योतिष है और उसका भविष्य की पर्चियों को चोंच से निकालने वाला, पालतू तोता है... उस बूढ़े की याद में एक खानाबदोश मादक... झरने जैसी औरत है। मैं कहां हूँ...! इसमें कुछ भी तो रूमानी नहीं है।

मनीषा कुलश्रेष्ठ
अगस्त 1, 2006

कीडे फ़तिंगे

कीडे फ़तिंगे
इलाके के इकलौते अस्पताल का इकलौता डॉक्टर कौतुक मरीज देखने वाले हॉल में अपनी कुर्सी पर बैठा था और उसके आगे की मेज के पार वाली कुर्सियों पर उसके तीन लंगोटिया दोस्त बैठ कर गपियाए जा रहे थे। जाहिर है तीनों धन धान्य और रौब दाब के मामले में असाधारण लोग थे। इसलिये डॉक्टर के मुंह लगे थे।
समय मरीज देखने का था, सो हॉल के बाहर कई कराहते - बिसूरते, हाल बेहाल लोग इंतजार में बैठे थे। पर डॉक्टर एण्ड पार्टी को इसकी कोई परवाह नहीं थी। परवाह करने वाला था भी तो वह इस अस्पताल का मेहतर छोटन था, जो अपनी सीमा में बहुत तुच्छ था। अत: इलाज सम्बन्धी कोई उपक्रम इसके अधीन नहीं था।
यारों की गप्पबाजी इस वक्त छोटन पर ही केन्द्रित थी। कुछ देर पहले उसने इन्हें टोक देने की हिमाकत की थी। बात तनिक बढक़र हुज्जत में बदल गई थी। उसका पडौसी बेंगा मांझी कई दिनों से बद से बदतर हालत में घिरता जा रहा था। उसके उल्टी दस्त बन्द होने का नाम ही नहीं ले रहे थे।उचित ध्यान के अभाव में सही दवा नहीं दिये जाने के कारण कई कष्ट उस पर आ टूटे थे। छाती में दर्द तेज बुखार भी शुरु हो गया था। आज उसका तडपना बिलखना चरम पर पहुंच गया था। हालत देखी न गई तो छोटन बेजब्त हो उठा, ''आप कैसा डॉक्टर हैं? रोगी तडप - कराह मर रहा है और आप यहाँ मजलिस जमा रहे हैं।''
डॉक्टर कौतुक इस दु:स्साहस पर एक दम उफन पडा, ''लग तो ऐसा रहा है कि तुम्हीं मर जाओगे इसके बदले में। अगर वह तुम्हारा बाप लगता है तो उसे तुम शहर क्यों नहीं ले जाते? जाओ, ले जाओ यहाँ से अब हमसे कंट्रोल नहीं होगा। बेहूदा, अनपढ, ज़ाहिल! मुझ पर हुक्म चला रहा है,अपनी औकात भूल गया है। ''
छोटन के लिये उसकी ऐसी गैरजिम्मेदाराना और अमानवीय हरकत आये दिन की बात थी। उसने धिक्कारते हुए फिर पूछा, ''यही जवाब देना था तो क्या पहले फुर्सत नहीं निकाल सकते थे? छि: छि: आपसे अच्छा तो वह जुल्ली मियां कसाई है, जो दिन में भले ही गाय गोरू काटता है लेकिन शाम को गरीबों मजलूमों के लिये मुफ्त में हकीमी करता है।''
डॉक्टर ने आंखें तरेरीं। छोटन बिना इसकी परवाह किये घृणा दिखा कर चल पडा। इस दृश्य पर त्रिमूर्ति मित्रों जाटो सिंह, गंगा सिंह और बच्चू सिंह के नथुने एक साथ फडक़ उठे। जाटो ने बत्तीसी रगडते हुए कहा, ''ससुरे इस डोम की यह मजाल। क्या डॉक्टर बहुत मन बढा दिये हो इसका! '' गाली सुनकर बरामदे में छोटन के पांव ठिठक गये। गंगा सिंह भी अपने भीतर का उबाल प्रकट कर बैठा, ''डॉक्टर यह हमारी तौहीन है कि वह तुम्हारे मुंह लग कर बात करेइसी वक्त उसका मुंह तोड देना चाहिये हमें।'' बच्चू सिंह भी अपना तैश प्रकट करने लगा, '' बोलो तो आज ही इस मरदूद की झोंपडी में आग लगा कर पूरे परिवार को जला कर स्वाहा कर दें।''
'' तुम लोग इसे नहीं जानते यार।'' डॉक्टर ने छोटन की ढठिता और अपनी लाचारी की समीक्षा की - '' यह डोमवा टिका कैसे है यहाँ? इसकी जो संकर नस्ल की पांच पांच खूबसूरत बेटियां हैं, इनमें दो को तो जानते ही हो, पहले ही भाग गईं। अब तीन बची हैं, मुखिया जी इन तीनों पर फिदा हैंएक एक को इसलिये ये समझ लो कि जब तक मुखिया बना रहेगा, यह नछत्तर अस्पताल की छाती पर कुण्डली मार कर बैठा रहेगा। इसकी बोली मुखिया के दम पर ही निकलती है।''
बरामदे में खडे छोटन के दिमाग में एक तीव्र सनसनी समा गई। मुखिया जी महज इसलिये बदनाम किये जा रहे हैं कि वे अन्य बबुआनों की तरह घृणा और भेदभाव नहीं करते थे और छोटन की तत्पर सेवा भावना से प्रसन्न प्रभावित होकर उसके साथ उदारता से पेश आते हैं। उसका जी चाह रहा था कि इस नृशंस, जलील और जल्लाद डॉक्टर की गर्दन दबा दे, मगर आपे से बाहर होना न उसका संस्कार था न अख्तियार। उसकी हैसियत और वजूद यही था कि वह बडी से बडी फ़जीहत सह सकता थाबद से बदतर जलालत झेल सकता था गंदी और सडी पची गाली पचा सकता था।
छोटन खून का घूंट पी कर बढना ही चाहता था कि जाटो की लिजलिजी हसरत ने फिर उसके पांव रोक लिये और उसके शब्द कानों में गर्म शीशे की तरह घुस गये, ''अरे डॉक्टर, तो हम लोग क्यों मुंह देख रहे हैं? इतनी माकूल जगह है यह अस्पताल उसकी बीमार लडक़ियों को पटाकर इलाज करो यारइस बीमारी के तो हम लोग भी डॉक्टर हैं।'' तनी हुई मुद्राओं का निहितार्थ एक दम करवट ले बैठा।
'' पानी तो मुंह में बहुत दिनों से आ रहा हैलेकिन यह छोटना बहुत बडा घाघ है। फिर भी चलो एक पुरजोर कोशिश करके देखते हैं। थोडी रिस्क ही सही। अगले इतवार को तय रहा विश्वास है इसकी एक न एक लडक़ी को जरूर पटा लूंगा। मुर्गे और व्हिस्की का इंतजाम तुम लोग करना।''
'' अगर उसकी कोई बेटी न फंसी तो? ''
'' तो अपना लुक्खा सिंह है न! मुसहरी में डेरा डाल कर ताडी दारू का मुफ्त सदाब्रत बांटता है। यह जो बेंगा मांझी है न जो आज मरने वाला है, इसकी जोरू को लुक्खा ने पटा रखा है, उसके जरिये दो तीन चुनी हुई मुसहरनी आसानी से बहला फुसला कर लाई जा सकती हैं। ''
छोटन का दिल दहल गया था..अस्पताल की प्रकृतिजन्य दयालुता, कोमलता सहानुभूति और करुणा पर व्याभिचार एवं बेहयाई का इतना बडा ताण्डव। अब उसमें आगे कुछ भी सुनने का धैर्य नहीं रह गया था। बेंगा मांझी की क्षण क्षण बिगडती हालत का कोई निराकरण ढूंढना उसका प्राथमिक दायित्व था। यहां अब उसे रखने की कोई तुक नहीं थी।
मुसहरी के तीन लोगों की मदद से उसे लेकर नवादा चल पडा। कल ही उसकी घरवाली सूप और खचिये आदि बेच कर सौ रूपए लाई थी।
नवादा अनुमण्डल के सदर अस्पताल की भी यों कोई भरोसेमन्द साख नहीं थी। यहां के बहुतेरे लापरवाह कारनामे गांवों तक पहुंचते रहे थे। पर दूसरा विकल्प भी भला अब क्या था? छोटन ने गौर किया कि यहां जितने डॉक्टर थे, वे अस्पताल के अपने कक्ष में बैठकर आने वाले मरीजों से बेहतर इलाज के लिये अपने प्राईवेट क्लीनिक में आने की ताकीद कर रहे थे। यहां देखने के नाम पर महज खानापूर्ति की जा रही थी। वार्ड की स्थिति तो गौहाल से भी बदतर थी। गंदगी और दुर्गन्ध के अलावा यहां हर चीज नदारद थी। गरीबी रेखा नहीं बल्कि गरीबी बिन्दु से भी नीचे रहने वाले बेउपाय लोग अपनी बीमारी को लिये फर्श पर गेनरा - गुदडी या पुआल बिछा कर अपने किसी परिजन की निगरानी में बदहवास पसरे हुए थे। कौन कह सकता था कि यह अस्पताल है? इससे कई गुना बेहतर कब्रगाह या कत्लगाह होता है, जहां मृतकों या मारे जाने वाले लोगों के लिये भी इससे अच्छे इंतजाम होते हैं।
बहरहाल बेंगा मांझी के लिये इसी नर्क में कहीं न कहीं उचित इलाज की उम्मीद करनी थी इस तरह कि सौ रूपये में ही मामला सलट जाये। मगर छोटन को क्या पता कि जोंकों की इस नगरी में सौ रूपए तो सिर्फ सूंघने में ही निकल जाएंगे। खून जांच और एक्सरे में ही पिचहत्तर रूपए पार हो गये।डॉक्टर की फीस और दवा के लिये पच्चीस रूपए कुछ भी नहीं थे। इस सरकारी अस्पताल के चप्पे चप्पे में व्याप्त बेहयाई पर छोटन हैरान था। मगर बेंगा मांझी शायद इतना बडा बेहया नहीं था कि दवा खरीदने के नाम पर छोटन को नंगा कर परीक्षा लेता। बेचारा पहले ही चल बसा।
छोटन की आत्मा एकदम चीत्कार उठी थी कि बेंगा को न कैंसर था, न एड्स, न टी बी - महज दस्त और बुखार से पीडित था, फिर भी दो दो अस्पताल से गुजर कर भी वह इलाज नहीं पा सका। वह सिहर उठा था कि आज गरीबों के लिये इलाज किस कदर हास्यास्पद और मुश्किल हो गया है। कल इन्हें फोडे फ़ुन्सी, सर्दी खांसी और सरदर्द से भी मरना पड सकता है। मानो इनके लिये हर रोग ही कैंसर और एड्स बनने जा रहा है।
अस्पताल के गेट पर ही अर्थियां बिक रही थीं। जैसे वे पहले ही चीख चीख कर यह बता रही हों कि जब इस अस्पताल में भीतर जा ही रहे हो तो हममें से किसी एक को पसन्द करते जाओ। शायद इस अस्पताल में आने वाले साठ प्रतिशत गरीब ग्रामीणों का यही हश्र था। हर स्तर और सज धज की अर्थियां यहां उपलब्ध थीं। छोटन ने बचे हुए पच्चीस रूपये से अर्थी खरीद ली। क्या संयोग था कि वह अपने साथ तीन आदमी लेकर आया था। मानो कंधा देने की पूरी तैयारी कर आया हो, नहीं तो उसे भाडे पर कुछ कंधे लेने पड ज़ाते।
बेंगा की घरवाली जो इन दिनों लुक्खा सिंह द्वारा जबरन बनाई हुई रखैल थी, अब स्थायी तौर पर मुक्त हो गई। लुक्खा को उसके एवज में बेंगा का खर्च भी प्रायोजित नहीं करना पडेग़ा। रोज रोज अध्दा पौआ पिलाना पडता था...अंतिम में पता नहीं क्या मिला कर पिला दिया कि बेंगा को इसके बाद पीने की जरूरत ही नहीं पडी। उपेक्षा की निरतंरता पहले ही उसकी नियति थी, अस्पताल ने इसे चरम पर पहुंचा दिया। चलो अच्छा हुआ कि इसके मरने से कोई विधवा न हुई कोई अनाथ न हुआ।
चारों ने अर्थी पर बेंगा का शव डाल दिया और राम नाम सत्य है कहते हुए वे पैदल चल पडे।ज़बकि बेंगा ने जो जिन्दगी जी थी उससे राम नाम सत्य नहीं सर्वथा असत्य जान पडता था। रास्ते में अजीब अजीब ख्याल छोटन के भीतर बनते और मिटते रहे। इन्हीं में एक था अपने जैसे मजलूम चेहरों के लिये एक हमदर्द और रहमदिल डॉक्टर की तलाश। उसने यह भी सोचा कि क्यों नहीं वह अपने नन्हका को पढा लिखा कर डॉक्टर बना दे। अगर वह ऐसा कर सका तो सिर्फ अपना ही नहीं पूरे जवार का उध्दार हो सकेगा। अगले ही क्षण उसके होंठ खुद पर व्यंग्य से मुस्कुरा दिये। खाने की खर्ची नहीं और डयोढी पर नाच! जाति का डोम और बेटा डॉक्टर! जो भी सुनेगा हंसी से लोट पोट हो जायेगा। छोटन ने झेंप कर इस विचार को झटक दिया। कंधे पर अर्थी है और वह क्या अनाप शनाप सोचे जा रहा है। डॉक्टर कौतुक, उसके दोस्त, उनकी रची साजिश, बेंगा की घरवाली और लुक्खा सिंह उसे फिर याद आने लगे थे।
गांव में लाश पहुंची तो किसी को कोई अचरज नहीं हुआ....कहीं कोई सुगबुगी या हलचल नहीं हुई।जैसे किसी आदमी की नहीं कीडे - फ़तिंगे की मौत हुई थी, जिस पर गम, स्यापा, शोक, अफसोस करने की कोई परिपाटी नहीं। कितना अकेला था बेंगा कि आज उसकी मौत पर कोई रोने वाला नहीं।जो हल जोत रहे थे, जोतते रहे...जो कुंए पर लाठा चला रहे थे वे चलाते रहे जो खलिहान में दौनी कर रहे थे करते रहे। मतलब किसी ने अपने धंधे को स्थगित करने की जरूरत नहीं समझी।
आदमी आदमी में कितना फर्क होता है....चाहे वह राजतन्त्र हो या जनतन्त्र। एक वह भी आदमी होता है जिसके मरने से सारा देश बन्द करा दिया जाता है, उसका अंतिम संस्कार देखने के लिये पूरे मुल्क को फुर्सत बहाल करा दी जाती है।
छोटन अब समझ गया था कि सामाजिक न्याय के हंगामे में एक गरीब मामूली आदमी की जान का कोई मूल्य नहीं। वह तो मात्र एक कीट पतंगा है।
– जयनन्दन

किराये का इन्द्रधनुष

किराये का इन्द्रधनुष
बम्बई की बरसात भी बस ! मुसीबत ही है। कहां तो सोचा था कि इन दो-तीन दिनों में पूरी बम्बई घूमूंगा। इस मायानगरी को खुद अपनी पहुंचने से देखूंगा, जानूंगा और कहां फंसा पडा हूं इस गेस्ट रूम में। जब से यहां आया हूं, यह झडी ज़ो लगी है, रूकने का नाम ही नहीं ले रही। इस कमरे में चहल-कदमी करते-करते थक गया हूं। लेटने की कई बार कोशिश की है परन्तु इतना नरम बिस्तर होते हुए भी तुरन्त उठ बैठता हूं। कमरे की एक-एक चीज को कई-कई बार देख चुका हूं। सारी पत्रिकाएं तो कल ही देख ली थीं,लेकिन मन में जो एक अजीब-सी कडवाहट घर कर रही है - गुस्से की, बेचैनी की, उससे वक्त काटना और भी मुश्किल हो रहा है।और ऊपर से यह बरसात, मेरे भीतर उठते तूफान को और तेज कर रही है। पता नहीं, कब तक इस कैद में रहना होगा।
मैं इसे कैद क्यों कह रहा हूं ! यह इतना बढिया गुदगुदे मैट्रेस वाला डबल-बैड, आरामकुर्सियां, किताबों से अटी पडी अल्मारियां, शो-केस, अटैच्ड बाथरूम, जिसमें ठण्डे-गर्म पानी की सुविधा है। सब कुछ साफ-सुथरा। सब कुछ तो यहां है! क्या हुआ जो इस कमरे में समुद्र की ओर खुलने वाली कोई खिडक़ी नहीं है। और तो कोई कमी नहीं। फिर बम्बई जैसे महंगे शहर में तीन-चार दिनों के लिए इतनी अच्छी तरह से रहने और साथ में खाने-पीने की सुविधा को मैं कैद कह रहा हूं? जिसे मैं कैद कह रहा हूं कभी सपने में भी कफ परेड जैसे पॉश इलाके में 20 वीं मंजिल पर इतने आलीशान फ्लैट के गेस्ट रूम में रहने के बारे में सोच सकता था। क्या मेरी इतनी औकात है कि मैं इतनी खूबसूरत जगह में आराम से पसरा रहूं और चाय, नाश्ता सब कुछ मेरे कमरे में पहुंचा दिया आए और यह सब सेवा एक ऐसी नौकरानी करे जो मुझसे भी अच्छी अंग्रेजी बोलती है, और स्मार्ट तो इतनी है कि कल जब मैं दिन में यहां पहुंचा था और दरवाजा उसी ने खोला था तो मैं उसे खन्ना अंकल की लडक़ी रितु ही समझा था और उसे विश भी उसी के हिसाब से किया था।
कल शाम को तैयार होकर जब कमरे से बाहर निकला तो उस वक्त आंटी ड्राइंग रूम में फोन पर किसी से बात कर रही थीं। मैं यही चाह रहा था कि कोई-न-कोई ड्राइंग रूम में मिल जाए, नहीं तो फिर किसी को बुलवाने के लिए या तो आवाज देनी पडती या फिर रूबी को ढूंढना पडता। आंटी जब तक फोन पर बात करती रहीं, मैं वहीं सोफे की टेक लगाए खडा रहा। फोन रखते ही जब वे मुडीं तो मुझ पर नजर पडी। चेहरा एकदम तुनक नया। अभी तो फोन पर हंस-हंसकर बातें कर रही थीं !
- क्या बात है मनीश ! कहीं जा रहे हो क्या! उन्होंने चेहरे की तुनक कम किए बिना साडी क़ी प्लीट्स ठीक करते हुए पूछा था। मैं एकदम सकपका गया था, फिर भी हिम्मत जुटाकर बोला था - वो सुबह से कमरे में बैठा-बैठा बोर हो रहा हूं। इस समय शायद बरसात रूकी हुई है, सोच रहा था, कहीं घूम आऊं।
मैंने जानबूझकर कार और ड्राइवर की बात नहीं की थी। हल्की-सी उम्मीद थी कि शायद वे खुद ही ड्राइवर को बुलाकर मुझे घुमा लाने के लिए कह दें। वैसे भी तो आज दोनों गाडियां घर पर हैं। सुबह अंकल ही तो बता रहे थे। आंटी भीतर के कमरे की तरफ मुडते हुए बोली थीं - भई! यहां बरसात का कोई भरोसा नहीं होता। फिर भी जाना चाहो तो बिल्डिंग के सामने ही बस स्टॉप है। मैरीन ड्राइव या फाउंटेन वगैरह घूम आओ, लेकिन डिनर के वक्त तक लौट आना। रूबी को घर जाना होता है। बाहर जाने का मेरा सारा उत्साह खत्म हो गया था। लेकिन कमरे में बैठे-बैठे कुढते रहने से तो यही अच्छा था कि बरसात में ही घूमता भीगता रहूं, यही सोचकर - अच्छा आंटी कहकर मैं बाहर आ गया था।
लिफ्ट का बटन दबाने के बाद मैं आँखें मूंदे दीवार के सहारे खडा हो गया था। मुझे बाउजी पर गुस्सा आने लगा था - क्यों भेजा उन्होंने मुझे यहां अपने वन-टाइम लंगोटिया यार और इस समय एक बहुत बडे आदमी - कृष्ण गोपाल खन्ना के घर पर ठहरने के लिए? मैं कहीं भी दस-बीस रूपये वाले होटल वगैरह में ठहर जाता। वहां कम-से-कम मुझे हर वक्त ज़लील तो न होना पडता। मुझे अपने आउटसाइडर होने का या मेरे छोटेपन का अहसास तो न कराया जाता और फिर उस हालत में मैं चार दिन के लिए थोडे ही आता। इन्टरव्यू वाला दिन और उससे एक दिन पहले यानी दो दिन की बात होती और फिर मैं सेकेण्ड क्लास से आया हूं और वापसी की टिकट भी तो सेकेण्ड क्लास का बुक करवाया है, जबकि कम्पनी मुझे दोनों तरफ का फर्स्ट क्लास का किराया दे रही है।उससे जो पैसा बचता, वह रहने-खाने के काम आ जाता।
लिफ्ट आ गई थी। मैं नीचे आ गया। सडक़ पर आने के बाद मैंने आस-पास देखा, पानी थमा हुआ था लेकिन लोग तेजी से आ-जा रहे थे। मैंने यह बात सुबह भी नोट की थी, अब भी देख रहा था कि यहां पर लोग और शहरों की तुलना में ज्यादा तेज चलते हैं,कहीं देखते नहीं, बस लपकते से रहते हैं। सुबह चर्चगेट के बाहर तो मैंने कई औरतों को भागते हुए देखा था। औरतों को इस तरह भागते देखना सचमुच मेरे लिए एक नया दृश्य था। एक बहुत मोटी औरत, जिसने स्कर्ट पहना था, भागते हुए बहुत ही अजीब लग रही थी।
अभी मुश्किल से मैंने सडक़ पार ही की थी कि एक तेज बौछार ने मुझे पूरी तरह भिगो दिया। लोगों ने फटाफट अपने फोल्डिंग छाते खोल लिये। मुझे आस-पास कोई ऐसी जगह नजर नहीं आई जहां शरण ले सकता। ऊपर वापस जाने का कतई मूड न था। नतीजतन भगता हुआ बस-स्टाप की तरफ ही चलता रहा। मूड और खराब हो गया था। अब घूमने की भी कोई तुक नहीं थी। तुक तो मुझे पहले ही नजर नहीं आ रही थी क्योंकि मुझे यहां जगहों के सिर्फ नाम ही मालूम थे, उनकी दिशा या दूरी का कोई अन्दाज नहीं था।किसी से कुछ भी पूछना बेकार लगा। बस-स्टाप से पैदल चल पडा। यूं ही काफी देर तक भटकता और भीगता रहा। भीगना मुझे अच्छा लगता है, लेकिन आज भीगने से मूड और भी बिगडता चला जा रहा था। तभी कोलाबा वाली सडक़ पर एक अच्छा-सा बार दिखाई दिया। मुझे इस वक्त अपना अकेलापन काटने का इससे अच्छा कोई रास्ता नहीं दिखाई दिया। बीयर बार में जा घुसा। बीयर पीते हुए मुझे हमेशा इस बात का अहसास होता रहता है कि आसपास कोई है जिससे मैं अपने मन की बातें कह रहा हूं। हालांकि मैं उस समय बातें खुद से ही करता हूं। जो बात किसी से कहने को बेचैन हो रहा होता हूं, किसी के सामने मन की भडास निकालना चाहता हूं तो खुद से बातें करके बहुत सुकून पाता हूं। इस वक्त भी मुझे सुकून की जरूरत थी।
बीयर के दो घूंट भरते ही मैं अन्तर्मुखी हो गया। मेरे भीतर की सारी सुगबुगाहट बुलबुलों के साथ ऊपर आने लगी। फिर से सारी चीजें दिमाग पर हावी होने लगीं। खुद पर गुस्सा आने लगा - क्यों ठहरा मैं खन्ना अंकल के घर पर। बाऊजी को कम-से-कम एक बार तो सोच लेना चाहिए था कि इन पंद्रह-बीस सालों में उनका दोस्त कितना बदल चुका होगा। ठीक है उनकी खतो-किताबत होती रहती है, लेकिन वह अलग बात है, और फिर मुझे इस बात से क्या मतलब कि खन्ना पर बाउजी के कितने अहसान हैं या दोनों बचपन के दोस्त हैं और दोनों ने मुफलिसी के दिन एक साथ काटे हैं। बाउजी किस तरह अपनी और खन्ना की दोस्ती के चर्चे किए जा रहे थे। अब मैं अगर बाउजी को बताऊं कि जिस दोस्त की उन्होंने अपने बच्चों का पेट काट कर मदद की थी, यहां तक कि एक बार हम बच्चों के लिए दीवाली पर पटाखे न खरीदकर उनके लिए बम्बई टिकट तक जुटाया था, वह आज इतना बडा आदमी हो गया है कि उसके पास उसी दोस्त के लडक़े के लिए जरा-सा भी वक्त नहीं। गर्मजोशी तो दूर, ढंग से बात करने तक की जरूरत ही नहीं समझी गयी। ये बातें सुनकर उन्हें कैसा लगेगा !
मैं बीयर पीते-पीते दुखी हो रहा था। सुबह से आया हुआ हूं और कोई बात तक नहीं कर रहा। आने पर ड्राइंग रूम में चाय पीते हुए जो दो-एक बातें हुई थीं, बाऊजी के हालचाल पूछे गए थे, उसके बाद तो मुझे जो गेस्ट रूम में पहुंचा दिया गया है, तब से वहीं घिरा बैठा था। अब बाहर निकला हूं। यहां तक कि मेरा नाश्ता और खाना भी रूबी वहीं गेस्ट रूम में पहुंचा गई थी।बीयर अपना काम कर रही थी। मैं कुढ रहा था और सभी को दोषी मान रहा था। मुझे माँ पर भी गुस्सा आ रहा था, क्यों उसने इतनी मेहनत करके खाने का सामान बना कर दिया है खन्ना के बच्चों के लिए। उसे पता तो चले कि बम्बई के बच्चे ये सब चीजें नहीं खाते। पता नहीं क्या खाते हैं ! आंटी हलवे पकवानों का डिब्बा देखते ही किस तरह मुंह बनाकर बोली थीं - क्या जरूरत थी इतना सब भेजने की? यहां तो ये सब कोई नहीं खाता। रूबी ये तुम ले जाना अपने घर, और मैं अवाक रह गया था ! माँ ने कितनी मेहनत से यह बनाया था।कितने घंटे मेहनत करती रही थी बेचारी और बाऊजी भी तो जिद किए जा रहे थे, खन्ना को ये पसन्द है, वो पसन्द है। पता नहीं बम्बई में उसे ये खाने को मिलते होंगे या नहीं! देख लें न यहां आकर ! और रितु को देखो, क्या नखरे हैं! मंजू ने इतना शानदार कार्डीगन बनाकर दिया और वो किस तरह मुंह बनाकर बोली - मुझे नहीं पहनना ये सडा हुआ कार्डीगन।और वह स्वेटर वहीं पटककर अपने कुत्ते को गोद में लिए अपने कमरे की ओर चली गई थी। सच, उस समय तो मेरा खून ही खौल गया था। मन हुआ था कि अभी अटैची उठाकर चल दूं कहीं और। साला यह भी कोई तरीका है बात करने का! माना तुम लोग रईस हो गए हो। ट्रांसपोर्ट के बिजनेस में ब्लैक की कमाई करके बीस-तीस लाख के आदमी हो गए हो लेकिन इसका ये तो कोई मतलब नहीं है कि दूसरों की इस तरह इज्जत उतार लो। अभी तो मुझे आए हुए कुल आधा घंटा ही हुआ था और किस तरह से यहां से मोहभंग हो गया था।
मन में हल्की-सी तसल्ली भी हुई थी कि अगर हम रईस नहीं हैं तो कम-से-कम इन्सानी मूल्यों पर तो टिके हुए हैं, तहजीब से बात तो कर सकते हैं। अब यही लोग मेरठ आए होते तो इनको बता देते कि मेजबानी क्या होती है! सारा परिवार इनकी जी-हुजूरी में एक टांग पर खडा होता। क्या मजाल कि कोई जरा ऊंची आवाज में बोल कर तो दिखाए। बाउजी की यही तो खासियत है। न तो किसी की बेइज्जती करते हैं, न अपनी होने देते हैं। अब उनको मैं ये सब बताऊंगा तो देखना-खन्ना अंकल से बातचीत तब बंद न हुई तो बात है। सवालों के जवाब मैं बीयर के घूंट भरते हुए खुद से पूछता रहा। बीयर के सुरूर में खुद को, सबको कोसने के बाद मैं हलका महसूस कर रहा था। सोचा, कल स्टेशन जाकर इंटरव्यू वाले दिन की टिकट की कोशिश करूंगा, ताकि फालतू में यहां दिमाग खराब न होता रहे।
दरवाजा अंकल ने खोला था। ड्राइंग रूम में हलकी रोशनी थी। उनके हाथ में भरा हुआ गिलास था और ड्राइंग रूम के कोने में बने उनके शानदार बार में बत्ती जल रही थी। बार स्टैण्ड पर आइस-बॉक्स, सोडा फाउन्टेन और खुली बोतल रखी थी।
- यस, यंग मैन, उन्होंने अपने गिलास में से लम्बा घूंट लेते हुए पूछा था - कहां घूमकर आ रहे हो?
-कहीं नहीं अंकल, बरसात की वजह से सारे दिन घर पर ही रहा, अभी जरा नीचे तक घूमने निकल गया था।
मैं उनसे नजरें नहीं मिलाना चाहता था, क्योंकि मूड अभी पूरी तरह ठीक नहीं हुआ था और मैं नहीं चाहता था कि उन्हें पता चले कि मैं बीयर पीकर आया हूं। वैसे भी अपनी और फजीहत करवाने की इच्छा नहीं थी। बेशक अंकल ने कोई ऐसी बात नहीं की थी, जिसे मैं अन्यथा लेता, लेकिन वे सुबह हो रहे पूरे ड्रामे में तो मौजूद थे। जब मैंने शहर देखने की इच्छा व्यक्त की थी तो वे भी तो मुझे गाइड कर सकते थे या रितु या ड्रायवर को मुझे घुमा लाने के लिए कह सकते थे, या फिर आंटी और रितु को चीजें रख लेने के लिए कह सकते थे।
-तुम्हारा खाना तुम्हारे कमरे में रखा है, हमें पता नहीं था तुम कितने बजे तक लौटोगे।
उन्होंने गिलास खाली किया और तिपाई पर रखते हुए बोले थे
- हम डिनर पर बाहर इन्वाइटेड हैं। आंटी वगैरह जा चुके हैं। मैं तुम्हारे लिए ही बैठा था। वे उठ खडे हुए और बाहर जाते हुए बोले - ओकेयंग मैन, सी यू टुमारो, गुड नाइट।
मैं गुडनाइट कहकर अपने कमरे में आ गया था।
कोनेवाली मेज पर ढका हुआ खाना और पानी का जग वगैरह रखे हुए थे। देखा-दो एक सब्जियां, चावल और रोटी थीं। भूख होने के बावजूद खाने की इच्छा नहीं हुई। अगर मेरी इतनी ही चिन्ता थी तो मुझे उसी वक्त बता देते या कह देते, बाहर ही खा लेता। लेकिन फिर सोचा-अगर मैं खाना न खाऊं और सुबह होने पर आंटी देखेंगी तो फिर भिनभिनाएंगी - एक तो स्पेशियली खाना बनवाया और छुआ तक नहीं। नहीं खाना था तो मना करके जाते। और मैं खाना खाकर सो गया था।
सबेरे से फिर वही रूटीन चल रहा है, बरसात हो रही है और मैं कमरे में बन्द हूं। रूबी एक बार सुबह पूछ भी गई थी वीडियो पर कोई फिल्म देखना चाहेंगे। लेकिन मैंने मना कर दिया था। फिल्म देखने का मतलब है - ड्राइंग रूम में बैठना और ड्राइंग रूम चूंकिसभी कमरों के बीच में पडता है, अतः सबकी निगाहों के बीच बैठना मुझे कतई गवारा नहीं था। रितु के कमरे से अब म्यूजिक की आवाज आनी बन्द हो गई है, लगता है कि किसी किताब वगैरह में मन लग गया होगा। फर्स्ट ईयर में है रितु। सुन्दर है, पर है अपनी माँ की तरह नकचढी। एक ही नजर में आप मालूम कर सकते हैं - माँ-बाप की बिगडैल और जिद्दी लडक़ी है। बस ड्राइंग रूम में ही कल जो हैलो हुई थी, उसके बाद नजर तो कई बार आई है लेकिन आँखें न उसने मिलाई हैं न मैंने ही जरूरत समझी है।खासकर कार्डीगन वाले प्रसंग से तो मुझे उसकी शक्ल तक से नफरत हो गई है।
इस घर में मुझे एक ही आदमी ढंग का लगा है - टीपू। सत्रह साल का टीपू देखने में खासा जवान लगता है, स्मार्ट भी है। टैन्थ में पढता है। इतना अच्छा लडक़ा, लेकिन अफसोस कि वह गूंगा-बहरा है। समझता है वह भी सिर्फ अंग्रेजी लिप मूवमेंट के सहारे।अपनी बात माइमिंग से ही समझाता है या कभी-कभी लिखकर भी। उससे आज बहुत ही शानदार ढंग से मुलाकत हुई। इन्टरव्यू के सिलसिले में कुछ तैयारी कर रहा था कि दरवाजे पर वह दिखाई दिया। पहले तो मैंने पहचाना नहीं लेकिन जब अन्दर आ गया और उसने हाथ बढाया तो मुझे याद आ गया। कल जब मैं यहां पहुंचा तो वह स्कूल जा रहा था। शायद पैसों की किसी बात को लेकर आंटी उसे डांट रही थीं। बाऊजी ने भी मुझे उसके बारे में बताया था कि खन्ना उसकी ट्रेनिंग और पढाई की वजह से काफी परेशान रहते हैं।
उसने बहुत गर्मजोशी से मेरा हाथ थामा। मुझे बहुत अच्छा लगा। कोई तो है जो यहां शब्दों के बिना भी इतनी अच्छी तरह से कम्यूनिकेट कर रहा था। हम हाथ मिलाने भर में एक-दूसरे के मित्र बन गए। मुझे उसका आना अच्छा लगा। वह अचानक उठा और दरवाजा बन्द कर आया। हालांकि उस वक्त हम दोनों और रूबी के अलावा घर में कोई और न था। उसने जेब से सिगरेट की डिब्बी और माचिस निकाली और एक सिगरेट ऊपर करके मेरे आगे बढायी। अच्छा तो यह बात थी! सिगरेट कभी-कभार मैं पी लेता हूं।चार्म्स मेरा ब्रांड भी है, परन्तु यहां अंकल के घर पर रहने के कारण मैंने फिलहाल स्थगित कर रखी थी। अब सिगरेट देखकर तलब तो उठी लेकिन एक सोलह-सत्रह साल के लडक़े के साथ इस तरह सिगरेट पीना न जाने क्यों अच्छा नहीं लगा - हालांकि ऑफर वही कर रहा था। मेरे मना करने पर उसे आश्चर्य हुआ। उसके सिगरेट सुलगाने और पीने का अन्दाज बता रहा था कि वह पुराना खिलाडी है। उससे खुलकर बातें करना चाहता था पर कभी ऐसी स्थिति से वास्ता न पडा था कि माइमिंग के सहारे बात करनी पडे या ऊंचीआवाज में अंग्रेजी बोलते हुए होंठों से सही मूवमेंट्स के जरिए अपनी बात समझानी पडे।
उसने इशारे से पूछा - यहां किस सिलसिलें में आया हूं।
मैंने बताया यहां एक कम्पनी में मेडिकल रिप्रेजेन्टेटिव के लिए इन्टरव्यू देना है। कल इन्टरव्यू है बेलार्ड पियर में। तभी उसने अपनी जेब से एक लडक़ी की तस्वीर निकाली। मुझे फोटो दिखाते हुए वह दिल पर हाथ रख कर मुस्कुराया। मैं समझ गया कि वह उसकी स्वीट हार्ट की फोटो थी। लडक़ी निश्चय ही सुन्दर और संवेदनशील लगी। मैंने नाम पूछा। उसने कागज लेकर उस पर बहुत सुन्दर अक्षरों में लिखा - उदिता, माई लव। और कागज को चूम लिया। मुझे हंसी आ गई। पूछा - तुम्हारे साथ पढती है क्या। उसने सिर हिलाया - नहीं। फ्रेंड की सिस्टर है। - वह भी तुम्हें चाहती है क्या! मेरे पूछने पर उसने कुछ नहीं कहा, सिर्फ एक मिनट में आने का इशारा करके चला गया। थोडी देर में वापस आया तो उसके हाथ में कई चीजें थीं - दो तीन किताबें, एक खूबसूरत पेन, सेंट की शीशी, गॉगल्स और कई छोटे-मोटे गिफ्ट आइटम। वह अपने हाथों में यह अनमोल खजाना लिए बहुत उल्लसित था। मैंने पूछा और तुमने क्या दिया है उसे। उसने आँख दबाकर कैमरा एडजस्ट और क्लिक करने की माइमिंग की।
- लेकिन इतने पैसे कहां से लाए तुम? जो कुछ उसने बताया, वह मुझे चौंकाने के लिए काफी था।
- नयी साइकिल बेचकर और घर में बताया कि खो गई।
मुझे उस पर तरस आया। बेचारे को अपने प्यार का इजहार करने के लिए क्या-क्या करना पडता है। मैंने यूं ही पूछा - कभी फिल्म वगैरह भी जाते हो, लेकिन तुरन्त ही अपने सवाल पर अफसोस होने लगा - टीपू बेचारा कैसे इन्जॉय कर पाता होगा। लेकिन मुझे टीपू की मुस्कराहट ने उबार लिया। उसने इशारे से बताया कि वे कई फिल्में एक साथ देख चुके हैं। मैं कुछ और पूछता इसके पहले ही टीपू ने मुझे घेर लिया - आपकी कोई गर्ल फ्रैंड है क्या! पहुंचने के सामने मृदुभा का चेहरा उभर आया और याद आयी यहां आने से पहले उससे हुई आखिरी मुलाकात। जब मैंने उससे पूछा था - तुम्हारे लिए क्या लाऊं बम्बई से, तो उसने कहा था - तुम सफल होकर लौट आना, मुझे और कुछ नहीं चाहिए। मैं अभी उस मुलाकात के ख्यालों में ही डूबा था कि टीपू ने मेरा कंधा हिलाकर अपना सवाल दोहराया। मैं मुस्करा दिया - हां है एक। उसने तुरन्त नाम पूछा, क्या करती है, कैसी है।
उसकी पहुंचने में चमक थी। मुझे अच्छा लगा कि मैंने सिगरेट की तरह इस मामले में झूठ नहीं बोला है। मेरी गर्ल फ्रैण्ड की बात जानकर वह खुद को मेरे और करीब महसूस करने लगा था। मैंने उसे बताया कि वह फिजिक्स में एमएससी कर रही है अभी।
- और आप? उसने मुझसे पूछा।
- हम तो भई, बीएससी के बाद से ही काम की तलाश में भटक रहे हैं।
उसने जेब में डिब्बी निकालकर एक और सिगरेट सुलगायी। तभी उसे कुछ याद आया। वह सिगरेट छोडक़र अपने कमरे में गया और जब वापस आया तो उसके हाथ में पासपोर्ट था। उसने बताया कि अगली जनवरी में वह एक साल के लिए न्यूयार्क जा रहा है। उसे पापा के क्लब ने स्पॉन्सर किया है स्पेशल ट्रेनिंग के लिए। कमरे में उसके आने से मुझे बहुत अच्छा लग रहा था। हमें बेशक एक-दूसरे की बात समझने में या अपनी बात समझाने में काफी दिक्कत हो रही थी, लेकिन फिर भी हम दोनों का अकेलापन कट रहा था। मेरा अकेलापन तो खैर दो-चार दिन का था। वह खुद को अभिव्यक्त करने के लिए कितना परेशान रहता होगा। तभी उसने घडी देखी।
बताया-उसके टयूटर के आने का वक्त हो गया है। उसने अपनी चीजें सहेजीं और फिर मिलने का वादा करके चला गया।वह अपने पीछे कई सवाल छोड ग़या है। कितना अकेलापन महसूस करता होगा टीपू। क्या रितु उससे उसी तरह लड-झगड क़र लाड-प्यार जताती होगी जिस तरह सामान्य भाई-बहन करते हैं। क्या आंटी अपने क्लब और पार्टियों से फुर्सत निकालकर इसके सिर पर हाथ फेरने या होमवर्क करवाने का टाइम निकाल पाती होंगी। क्या इसके उस तरह के दोस्त होंगे जो इसे अपने खेलों, अपनी दिनचर्या में खुशी-खुशी शामिल करते होंगे। क्या उदिता और टयूटर के अलावा भी कोई उससे बात करता होगा। मैं तो यहां दो दिनों के अकेलेपन से ही टूट रहा हूं, बेचारा टीपू तो कब से अकेला है। मुझे नहीं लगा कि वह अपनी दिनचर्या में इतना खो जाता हो कि उसे किसी साथी की जरूरत ही न होती हो। उसने अपनी एक अलग दुनिया बनायी तो होगी लेकिन उसका कितना दिल करता होगा कि कोई उसकी अकेली दुनिया में आए। देर तक उसके ख्यालों में खोया रहा।
इन्टरव्यू बहुत अच्छा हो गया है। मैं चुन लिया गया हूं और मुझे मेरे अनुरोध पर दिल्ली हैडक्वार्टर दिया गया है। दिल्ली, पंजाब और हरियाणा कवर करना होगा। अपॉइन्टमेंट लैटर दस दिनों में भेज दिया जाएगा। तुरन्त ज्वाइन करना है और पन्द्रह दिन की ट्रेनिंग के लिए फिर बम्बई आना होगा। मेरी खुशी का ठिकाना नहीं है। मेरे संघर्ष खत्म हो रहे हैं। मनपसन्द नौकरी मिल गयी है। अच्छी पोस्ट, बडी क़ंपनी, अच्छा वेतन, और टूरिंग जॉब। मैं इतना उत्साहित हूं कि जी कर रहा है कि किसी भी व्यक्ति को रोककर उसे अपने सेलेक्शन के बारे में बताऊं। बाऊजी को तुरन्त तार दूं, लेकिन तार तो कल ही पहुंच पाएगा। फोन कर दूं, पडौस के सचदेवा के घर, लेकिन उन लोगों से तो आजकल ठनी हुई है। कहीं मेरा नाम सुनकर ही फोन रख दिया तो मेरे तीस-चालीस रूपयों का खून हो जाएगा। मैं तो इसी वक्त और यहीं अपनी खुशी बांटना चाहता हूं। कितनी अजीब बात है, असीम दुख के क्षण मैंने तनहा काटे हैं और कभी किसी को अपने दुख का हमराज नहीं बनाया है। आज मैं अपनी खुशी के क्षणों में भी अकेला हूं। कोई हमराज है ही नहीं यहां। हालांकि खुशी बांटने के लिए कब से तरस रहा हूं।
घर पर तार डाला। मृदुभा को सांकेतिक भाषा में कार्ड डाला। थोडी देर मैरीन ड्राइव पर टहलता रहा। मन बहुत हलका हो गया है।समुद्र ज्वार पर है। लगा, मानो वह भी मेरी खुशी में शामिल है और लहरों के हाथ बढाकर मुझे बधाई दे रहा है। बहुत खूबसूरत है शहर का यह हिस्सा। वापिस आने का मन ही नहीं है। घर लौटते हुए शाम हो गई है। एक मन हुआ कि मिठाई का एक डिब्बा ही ले लूं अंकल वगैरह के लिए। लेकिन टाल गया। मुझे पता है मिठाई का भी वही हश्र होना है जो पकवानों और कार्डिगन का हुआ है।मुझे और फजीहत नहीं करानी अपनी, न ही मूड खराब करना है।
घर पर सिर्फ टीपू और रूबी हैं। मैंने टीपू को खबर सुनायी है। वह तपाक से मेरे गले मिला है। मैंने खुशी से उसका गाल चूम लिया है और उसके बाल बिखरा दिए हैं। वह बहुत खुश हो गया है। मुझे अच्छा लगा है कि घर पर सिर्फ टीपू मिला है। आंटी वगैरह को तो मैं बताता ही नहीं। रूबी ने चाय के लिए पूछा, लेकिन टीपू ने मना कर दिया है।
- आज की शाम हम सेलीब्रेट करेंगे। खाना भी बाहर खायेंगे, और उसने मुझे हाथ-मुंह धोने का भी मौका नहीं दिया है। घसीट कर बाहर ले आया है। हल्की-हल्की बूंदा-बांदी हो रही है और आज बरसात में भीगना अच्छा लग रहा है। पर शायद टीपू को यहां की बरसात में भीगने में कोई दिलचस्पी नहीं है। उसने एक टैक्सी रूकवायी है और कोलाबा की तरफ चलने का इशारा किया है। मैं परसों इस तरफ आया था लेकिन तब मूड खराब होने के कारण कुछ भी एन्जॉय नहीं कर पाया था। आज कोलाबा में घूमना चाहता हूं, पर टीपू पता नहीं कहां लिए जा रहा है। उसने दो-एक बार टैक्सी को दायें-बायें मुडने का इशारा किया है। टैक्सी ताज होटल के पोर्च में आकर रूकी है। अब तक ताज होटल और गेटवे को फिल्मों में ही देखा था। किसी फाइव स्टार होटल में जाने का यह पहला मौका है।मैं मेरठ के एयर कण्डीशण्ड होटलों में भी दो-एक बार ही कॉफी पीने ही जा पाया था। मैंने टैक्सी का बिल देने की बडी क़ोशिश की परन्तु टीपू ने दिया और चेंज लिए बिना मुझे घसीट कर अन्दर ले चला। मैंने जेब पर बाहर से ही हथेली के स्पर्श से महसूस कि किया पैसे सुरक्षित हैं। हालांकि मुझे यहां के दामों के बारे में कोई जानकारी नहीं है फिर भी मैंने मन ही मन हिसाब लगा लिया है,सौ-डेढ सौ रूपए तक तो खर्च होंगे ही।
अंदर आते समय मेरा मन मध्यमवर्गीय दब्बूपन की वजह से डर रहा है, लेकिन टीपू की चाल में ऐसी कोई बात नहीं है। वह लापरवाही के अन्दाज में मेरी बांह में बांह डाले चल रहा है। मेरा सारा ध्यान आसपास की रौनक और शानोशौकत पर लगा है। मेरी निगाहों में चकित भाव है जिसे मैं छुपाने की नाकाम कोशिश कर रहा हूं।
हम पहली मंजिल पर स्थित रेस्तरां में पहुंचे। इत्तिफाक से ठीक समुद्र वाली खिडक़ी के पास की एक मेज खाली मिल गयी। समुद्र अपना असीम विस्तार लिए हमारे सामने है। दूर खडे बडे-बडे ज़हाजों की बत्तियां बहुत अच्छी लग रही हैं। छोटी-बडी क़िश्तियां ऊंचीलहरों पर इतरा रही है। इससे पहले कि मैं मीनू पर निगाह डालूं, टीपू ने दो बीयर का आर्डर दे दिया है। हमारी निगाहें मिलती हैं तो दोनों मुस्करा देते हैं। टीपू मुझसे मेरे इन्टरव्यू के बारे में पूछता है। मैं बतलाता हूं कि किस तरह सत्ताइस लडक़ों में से पांच को इन्टरव्यू के बाद भी रूकने के लिए कहा गया था। उन पांच में मैं भी था। उन्हें कुल तीन लडक़े लेने थे। बाद में इन्फॉरमली बातचीत के लिए बुलाया गया था और तभी मुझे बता दिया गया था कि मैं चुन लिया गया हूं। बीयर आ गयी है। साथ में भुनी हुई मूंगफली और सलाद। सर्विस बहुत अच्छी है और वेटर वगैरह बहुत नम्र।
हम धीरे-धीरे सिप करने लगे हैं। मैं टीपू से उसके दोस्तों, उसके परिवार वालों के व्यवहार के बारे में पूछना चाहता हूं। परिवार वालों का नाम सुनते ही उसने मुंह बिचकाया है। मुझे पहले ही आशंका थी कि उसे बहुत अच्छा ट्रीटमेंट नहीं मिलता। वह माइमिंग करके बताता रहा कि किस तरह पापा से बात किए हुए उसे कई दिन बीत जाते हैं, सिर्फ हैलो, हाय से आगे वे कभी बात नहीं करते।अव्वल तो वे घर पर होते ही नहीं। क्लब, पार्टियां, बिजनेस ट्रिप्स वगैरह और जब घर पर होते हैं तो या तो अपने बैडरूम में बैठे रहते हैं और बिजनेस के फोन वगैरह करते रहते हैं या शाम के वक्त अपने बार में बैठे पीते रहते हैं। मुझे बहुत धक्का लगा जब उसने बताया कि मम्मी अपने कुत्ते को तो गोद में बिठाकर खाना खिलाती है लेकिन उससे कभी सीधे मुंह बात नहीं करती हैं। जब भी सामने पडती हैं किसी-न-किसी बात पर डांटने लगती हैं - पढता क्यों नहीं, बाहर क्यों घूमता रहता हूं, पैसे क्यों माँगता हूं हर वक्त। वह बहुत उदास हो गया है। उसका चेहरा बता रहा है कि अरसे से किसी ने प्यार से बात तक नहीं की है। जब मैंने रितु के बारे में पूछा तो उसका चेहरा और विकृत हो गया। वह बुदबुदाया - शी इज ए बिच। तो मेरा अन्दाज सही था। वह सचमुच बिगडी हुई लडक़ी है। टीपू उसके बारे में बात करने तक को तैयार नहीं है। बहुत कुरेदने पर उसने बताया कि वह पता नहीं किन आवारा लडक़ों के साथ घूमती रहती है और ड्रग्स भी लेती है।
हम एक-एक बीयर ले चुके हैं। हलका-सा सुरूर आने लगा है। टीपू ने इशारे से दो और बीयर का आर्डर दे दिया। मेरी इच्छा नहीं है और बीयर पीने की। साथ ही टीपू की उम्र देखते हुए भी डर रहा हूं कि कहीं उसे ज्यादा न हो जाए। थोडा सा ध्यान जेब पर भी है।पर बीयर आ चुकी हैं। मैं उसका खराब मूड देखकर बातचीत को उदिता पर ले आया। उसका चेहरा कुछ संभला। लगता है, वह उदिता को जी-जान से चाहता है, वह उसकी छोटी-छोटी बातें भी बताने लगा। उदिता की चर्चा करते हुए वह इतना भावुक हो गया कि उसकी पहुंचने में पानी आ गया। उसके हाथ कांपने लगे। किसी तरह हमने बीयर खत्म की। मुझे डर लगने लगा है टीपू घर पहुंचभी पाएगा या नहीं। जब अंकल को पता चलेगा कि हम दोनों ने दो-दो बीयर पी हैं तो मुझे ही डांटेंगे। मैंने बिल मंगवाया। मैंने सौ का नोट निकालकर बिल के फोल्डर में रखा लेकिन टीपू अड ग़या - यह ट्रीट उसकी तरफ से है, वही पे करेगा। वह हाथ-पैर चलाने लगा। मैं सीन क्रिएट नहीं करना चाहता। बिल उसी ने दिया। हलकी-सी राहत भी हुई। मैं तय कर लेता हूं डिनर के पैसे मैं दूंगा। टीपू उठा और लडख़डाते हुए मेरे साथ चलने लगा। वह ठीक तरह चल भी नहीं पा रहा है। मेरी चिंता बढती जा रही है।
बाहर आए तो दखा कि नौ बज रहे हैं। मैंने टैक्सी रूकवायी तो उसने मना कर दिया। हम पैदल ही फिर कोलाबा की ओर चल दिये हैं। हालांकि मैं भी पूरे सुरूर में हूं लेकिन टीपू की वजह से मैं खुद को भूले हुए हूं। टीपू ने मेरा हाथ मजबूती से थामा हुआ है। तभी मेरी निगाह सडक़ के दोनों तरफ खडी सजी-धजी लडक़ियों पर पडती है। पहले तो उन्हें देख कर हैरान होता हूं, तभी ख्याल आता है,अरे! ये तो धंधा करने वाली लडक़ियां हैं। पर इस तरह सरे आम! उनकी तरफ देखते हुए भी मुझे अजीब लग रहा है। कुछेक लडक़ियां तो काफी अच्छी लग रही हैं। टीपू अपने ख्यालों में मस्त चला जा रहा है। मेरे हाथ में कसा उसका हाथ अस्थिर है।
हम धीरे-धीरे कदम बढा रहे हैं। तभी मैंने देखा कि एक खंभे की आड में खडी एक खूबसूरत लडक़ी हमारी तरफ देखकर मुस्कराई।निश्चय ही यह मुस्कुराहट प्रोफेशनल है। उसके रंग-ढंग से प्रभावित होने के बावजूद मैंने उसकी तरफ ज्यादा ध्यान नहीं दिया है और आगे बढ ग़या हूं। लेकिन टीपू ने मेरे हाथ से अपना हाथ छुडवा लिया है और उसके पास चला गया है। मैं चौंका और भौंचक-सा वहीं खडा रह गया। टीपू यह क्या कर रहा है? मेरा दब्बूपन मुझे उस लडक़ी के पास जाने से रोक रहा है। टीपू उससे इशारों से बात कर रहा है। मेंरे पांव कांपने लगे हैं। असमंजस में पड ग़या हूं। वहीं बुत-सा खडा सब देख रहा हूं। इतनी भी हिम्मत नहीं जुटा पा रहाहूं कि टीपू का हाथ पकडक़र उसे वहां से हटाऊं। तभी टीपू मेरे पास लौटा है। उसकी पहुंचने में एक अजीब-सी चमक आ गयी है।उसने मेरी सहमति चाही है। मैं उसे समझाने की कोशिश करता हूं। उसका हाथ पकडक़र आगे बढना चाहता हूं पर वह वहीं मेरा हाथ पकडक़र अड ग़या है। आज आयी मुसीबत! एक तो यह पहले ही होश में नहीं है। उस पर यह सब कुछ। मैं टीपू को प्यार से समझाता हूं, पर टीपू कुछ सुनने को तैयार नहीं है। तभी टीपू ने मुझे अपनी बांहों में भरा और मेरी मनुहार करने लगा है। वह कुछ कहना चाह रहा है, पर उसके मुंह से गों-गों की आवाज निकलने लगी है। यह आवाज मैंने उसके मुंह से पहले कभी नहीं सुनी थी।लडक़ी अभी भी वहीं खडी है और कनखियों से हमारी तरफ देख रही है। मैं लडक़ी की तरफ बढक़र उससे ही टीपू की हालत पर तरस खाने के लिए कहना चाहता हूं, लेकिन हिम्मत नहीं जुटा पाता।
स्थितियां मेरी पहुंच से बाहर हो गई हैं। मैं कुछ भी करने में अपने को असमर्थ पा रहा हूं। कहां तो हम सेलिब्रेट करने निकले थे और कहां टीपू यह सब नाटक करने लगा। सोलह-सत्रह वर्ष की उम्र और यह सब धंधे। मैंने हथियार डाल दिए हैं। लेकिन मैंने तय कर लिया है कि मैं इस सब में शरीक नहीं होऊगां। टीपू ने टेक्सी रूकवायी है। लडक़ी आगे बैठी है। हम दोनों पीछे। मैंने कनखियों से लडक़ी की तरफ देखा है- बीस-बाइस साल की और पढी-लिखी लग रही है जो शायद गलत धंधे में आ गयी है। मैंने आँखें फिरा ली हैं। लडक़ी ने ही टैक्सी वाले को जगह बतायी। टीपू बहुत गंभीर है। उसकी मुट्ठियां तनी हुई हैं और वह कहीं नहीं देख रहा। हम दोनों ने एक बार भी आँखें नहीं मिलायी हैं। टैक्सी कहां जा रही है, मुझे कुछ पता नहीं।
लगभग 10 मिनट बाद हम टैक्सी से उतरते हैं। टीपू अभी भी लडख़डा रहा है। लडक़ी एक पुरानी-सी इमारत की तीसरी मंजिल पर ले आयी है और डोर बेल दबाकर दरवाजा खुलने का इन्तजार करती है। लडक़ी को फिर कनखियों से देखता हूं। यह लडक़ी कॉलगर्ल कतई नहीं लगती। मैं कल्पना करता हूं - अगर यही लडक़ी मेरठ में होती और खुद को इस धंधे में नहीं डालती तो अच्छी-अच्छी लडक़ियां इसके आगे पानी भरतीं। मैं जितना सोचता हूं, उतना ही परेशान होता हूं। मैं इस दलदल में कहां आ फंसा! किसी को पता चले कि मनीश बम्बई में कोठे पर गया था तो क्या सोचे! तभी एक बूढी औरत ने दरवाजा खोला है। हमें देखते ही दरवाजा खुला छोडक़र भीतर चली गई है। साधारण-सा ड्राइंगरूम, लेकिन साफ-सुथरा। मेज पर कुछ पत्रिकाएं। लडक़ी हमें वहीं बैठने को कह कर भीतर चली गई है।
थोडी देर में जब वह लौटती है तो वह गाउन पहने है। परदे के पीछे खडे होकर उसने मुझे आमंत्रित किया है। यह आमंत्रण बिलकुल ठंडा है। मैं सकपका गया हूं। इसके लिए कतई तैयार नहीं हूं। मैं सिर हिलाकर मना करता हूं। कुछ कह ही न पाया। तभी टीपू मेरा हाथ पकडक़र पहले भीतर जाने के लिए मुझसे आग्रह करने लगा है। मैं मना करता हूं। और टीपू को ही खडा करके भीतर भेज देताहूं। उसके शरीर का तनाव कम हो गया है पर नशा अभी भी बरकरार है। दरवाजा बन्द कर दिया गया है और परदा फिर अपनी जगह आ गया है। मेरा नशा उड चुका है। दिमाग शून्य हो गया है। मुझे कतई गुमान न था कि इतनी खुशनुमा शाम का अन्त इस तरह से होगा और एक सोलह-सत्रह साल का मासूम और अपाहिज लडक़ा मुझे इस तरह यहां ले आएगा।
मैंने सोफे की टेक से सिर लगा लिया है और आँखें बन्द कर ली हैं। तभी भीतर से टीपू की गों-गों की आवाज सुनाई देती है। मैं डर जाता हूं। दिमाग सुन्न हो गया है। सारी चीजें गडमड हो रही हैं। टीपू, अंकल, रितु, उदिता, मृदुभा, भीतर वाली लडक़ी। सबके चेहरे तेजी से मानस पटल पर आ-जा रहे हैं। मुझे टीपू पर तरस आ रहा है। बेचारा इतनी कम उम्र में इन धंधों में फंस गया है। उधर रितु ड्रग्स के नशे में किसी और की बांहों में झूल रही होगी। और यह लडक़ी - उसके बारे में सोचना चाहता हूं, पर कहीं लिंक नहीं जुडता। उसे इस वातावरण से अलग किसी और वातावरण के फ्रेम में देखना चाहता हूं पर उसका चेहरा बदल जाता है। उसकी जगह कोई और चेहरा ले लेता है। सिर बुरी तरह घूम रहा है। आँखें बन्द किए बैठा हूं। कमरे में हल्की रोशनी है, पर पहुंचने में जलन हो रही है। कम से कम लडक़ी को तो यह देखना चाहिए था कि वह कैसे मासूम बच्चे को फंसाकर लाई है। तभी गों-गों की आवाज आनी बन्द हो गयी। मैंने फिर आँखें बन्द कर लीं। जितना सोचता हूं, दिमाग उतना ही खराब होता है।
तभी खटके की आवाज से मेरी आँख खुली। वह लडक़ी दरवाजे में खडी है। निर्विकार सी। मैं डर गया - तो क्या वह फिर मुझे आमंत्रित करने आयी है पैसे ऐंठने के लिए। मैं कुछ हूं, इसके पहले ही वह धम्म से सामने वाले सोफे पर बैठ गयी है - सॉरी सर,वह कुछ कहना चाहती है पर सिर झुका लेती हैं।
- क्यों क्या हुआ! मेरी जान हलक में आ गयी है।
-आपके दोस्त को किसी लडक़ी की नहीं, माँ की गोद की जरूरत थी। भीतर जाइए, वह सो रहा है। इतना कहते ही वह मुझसे नजरें चुराने लगती है।
मैं भीतर लपकता हूं। टीपू सोया हुआ है और लडक़ी उसे कंधों तक चादर ओढा गयी है। मैं कमरे की पीली रोशनी में उसका चेहरा नजदीक से देखता हूं। उसके चेहरे पर तृप्ति का वही भाव है, जो माँ का दूध पीने के बाद शिशु के चेहरे पर होता है।
मेरी पहुंचने के सामने आंटी का तुनक भरा चेहरा आ जाता है।
- सूरज प्रकाश
फरवरी 1, 2005

कारोबार

कारोबार
दरवाजे को हौले-से भेड़कर वह अंदर आया और इशारा पाते ही कुर्सी पर बैठ गया. चालू फ़ाइल को एहतियातन वहीं बंद कर मैंने नीचे सरका दिया. इस दरम्यान एक मिनट की खामोशी रही. एक अबूझ-सी राहत समेटकर मैं कुर्सी के पिछवाड़े पर झूल गया और आश्वस्ति टटोलती निगाह से उसके हाव-भाव परखने लगा.
''तो तुम्हारे हिसाब से केस हिट करने लायक है ?''
''एकदम साब, सोचने जैसा कुछ है ही नहीं.''
आंखों में आंखें डालकर उसने यक़ीन से गर्दन हिलाई और कहते हुए हल्की-सी चपत टेबल के कांच पर जड़ दी.
इस काम में जिसे गट 'फीलिंग' कहते हैं, वह मुझे आ चुकी थी मगर एक परीक्षार्थी का-सा अंदरूनी डर फिर भी बना हुआ था. मैं उसी पर नकेल डालने की जुगत में था. ''अच्छा, कितने की जब्ती हो जाएगी?``
बेहिसाबी रोकड़ा और दूसरी चल संपत्तियों की जब्ती पूरे मिशन की कामयाबी की जान थी इसलिए मैं उसी पर चढ़कर मॉक-फेंसिंग आजमा रहा था. झूठ-फरेब करने में कोई कितना ही उस्ताद बन ले मगर हर पेशेवर मुखबिर इस सवाल का जवाब देने से कतराता है क्योंकि इससे उसकी रोज़ी-रोटी ही नहीं, साख-प्रतिष्ठा भी जुड़ी होती है. सीधे-सीधे. एवजी में कोई दलील काम नहीं करती है. इसलिए निमिष भर को वह झिझका. एक अलिखित काय़दे के मुताबिक़ रत्ती-भर से ज्य़ादा की झिझक मेहनत से बनाए आपके ढांचे को भुरभुरा कर सकती है -- शक की वजह से. इसलिए भटकती पुतलियों को दबोच कर उसने लम्बी सांस खींची.
''करोड़ से कम नहीं होगी.``

''तुम्हारा दिमाग ठीक है...करोड़ से ऊपर तो हमारे यहां सारे ही केस होते हैं, सवाल हैं, कितने करोड़?``मैंने उसे खारिज-सा करते हुए धमकाया.
''दो-तीन होई जाएगी, नसीब ने साथ दिया तो चार-पांच भी हो सकती है.`` उसने गोकि बिखरे पत्ते समेटे.
''हम नसीब पर कुछ नहीं छोड़ते पठान भाई...इतनी बड़ी दुनिया में इतने बड़े-बड़े मुर्गे खुले घूम रहे हैं...किसे पकड़ना है यह नसीब नहीं, नज़र और समझ की बिना पर तय होना चाहिए...``
''फिर भी साब, नसीब तो समझो होना ही हुआ.`` उसने मेरी बात बीच में पकड़ ली. उसकी बातों में'समझो` तकियाकलाम की तरह रहता है.
''ठीक है ठीक है, तुम नसीब की नहीं काम की बात पर आओ.``
''वो तो साब मैंने पैलेई बतला दी है.``
पहले उसने जो बतलाया था...वह अपनी नवीनता के कारण काफ़ी कौतूहल भरा लगा था. हर दूसरे-तीसरे छापे में बिल्डरों और ज्वैलर्स की धर-पकड़ करते हुए मैं खासा ऊब गया था. हमारा निदेशक बार-बार दुहाई देता कि गए दस बरसों में दुनिया के कारोबार का नक्श़ा बदल गया है मगर हम अपनी आरामपरस्ती में फंसे पड़े हैं. चार लोगों की हमारी टीम ने डेढ़-सौ से ज्य़ादा कारोबारों की छंटनी की थी मगर याद नहीं पड़ता कि ''फलों का थोक व्यापार`` उसमें था या नहीं.
उसने जब सुझाया तो पहली प्रतिक्रिया में खारिज करते हुए मैंने तल्खी ली थी कि विभाग के इतने बुरे दिन भी नहीं आए हैं कि धनिए-पुदीने वालों पर भी छापा मारें.
''धनिया-पुदीना और सेब-संतरों में फ़र्क है साब.``
''क्या फ़र्क है भाई?``
''पचास लाख की आबादी के इस शहर में हर रोज़ तो ढाई - तीन लाख का धनिया बिकता और तीस-पैंतीस लाख के फल...फिर फ्रूट्स खाने वाला तबका कौन-सा है ये आप बखूबी जानते हैं.``
मैं अचानक रुका. उसकी दलील में आंकड़े नहीं, मानवीय व्यवहार की गहरी समझ थी. एक चौखटे में फंसे सोच के तहत मैं मन ही मन मोटा-मोटा हिसाब लगाने लगा कि हर रोज़ के तीस लाख के बाज़ार में आठ लाख का हिस्सा रखनेवाले एक थोक व्यापारी की साल भर में कितनी कमाई होती होगी...पच्चीस करोड़ की सालाना बिक्री के हिसाब से छह साल की हो गई सौ करोड़ से ऊपर. जिस ट्रेड को आज तक हाथ नहीं लगाया उसका तो सारा कारोबार ही बेहिसाबी होगा. उसने आगे बताया कि आम को लोग भले उसके स्वाद के कारण फलों का बादशाह कहते हों मगर व्यापारियों को यह मुनाफे की वजह से बादशाह लगता है. हर सीज़न की शुरुआत केरल के सिंदूरी आमों से होती है, फिर रत्नागिरी और जूनागढ़ के अल्फांसो और हापुस आते हैं, आखिऱ में सोने पर सुगंध उत्तर-भारत के दशहरी और लंगड़ा की होती है. सारा ट्रेड कमीशन के आधार पर चलता है जिसकी तयशुदा दर छह प्रतिशत है...मगर यह तो सिक्के का दिखावटी पहलू है : बड़े-बड़े थोक व्यापारी किसानों के आम नहीं, बाग के बाग खऱीद लेते हैं...कभी-कभी तो अगले ५-७ सालों के लिए. अपने उत्पाद की क़ीमत तय किए जाने में किसान के साथ जो छल किया जाता है उसकी नजीर भी उसने मुझे दिखा दी थी. यह देखकर मैं हक्का-बक्का रह गया कि एक तौलिए के भीतर हाथ की उंगलियां घुमाकर व्यापारियों की कार्टल, 'प्रतियोगिता` के सिद्धांत की कैसे धज्जियां उड़ाती चली जाती है.
मैं वापस उसकी तरफ़ लौटा.
''कितने पार्टनर हैं?``
''तीन हैं, तीनों भाई.``
''ठिकाने कितने रहेंगे?``
''समझो तीन हो गए बंगले, एक बाप का, एक मार्किट-ऑफिस एक गोदाम.``
''यानी छह.``
''सात समझो, साला भी है एक, बड़े वाले का. मामू कहते हैं.``
''बाप एक्टिव है?``
''एक्टिव तो नहीं है मगर इन तीनों को पैदा करने का कसूरवार तो है ही...``
काम की बात के बीच थोड़ी चुटकी मुझे सुहाती है. वह जानता है.
''कसूरवार है तो इस बुढ़ापे में बंगलों को छोड़कर उस फ्ल़ैट में क्या कर रहा है?``
''इन सिंधियों का घर या शक्ल देखकर आप इनकी हैसियत के बारे में अंदाज़ा नहीं लगा सकते हैं...ये जो दिखते हैं उसके अलावा कुछ भी हो सकते हैं.`` अपनी बात मनवाने के लिए पठान अक्सर ऐसे शगूफे छोड़ने लगता. लगभग यही बात उसने एक मारवाड़ी के संदर्भ में कही थी. आप बहस कीजिए और मुद्दे से हाथ धो बैठिए.
अपने निदेशक को विश्वास में लेकर चौथे दिन मैंने उस निशाने को 'साध` लिया था. बस दो एहतियात अपनी तरफ़ से और बरते, एक तो इस खिलाड़ी नं १ के साथ इस बाज़ार के खिलाड़ी नं २ को भी उसी दिन शिकार बनाया और दूसरे, दोनों के बही खाते लिखने वाले मुनीमों को भी वही इज्ज़त बख्शी जो उनके आकाओ को. दोनों घरानों से कोई पौने चार करोड़ की जब्ती हुई थी जो अपेक्षा से कहीं कम थी मगर दूसरे घराने के एक भागीदार के यहां से मिली कुल जमा इक्यावन लाख की नकदी ने किसी तात्कालिक मलाल से बरी कर दिया था. निर्वासित पिता और मामू को 'कवर` करने की हिदायत बड़े काम आई : पिता के यहां से एक ऐसी 'चोपड़ी` मिल गई जिसमें हिसाबी कमीशन को क्रमश: घटाने को एक कला का दर्जा दे रखा था, मामू के यहां से तो तीन बेनामी खाते ही मिल गए जिनसे निकाली राशि उसी बैंक में 'फिक्स` कर रखी थी. हमारी मामूली बदसलूकी से मामू टूट गया और बिना कोताही किए 'कॉआपरेट` करने लगा.
खिलाड़ी नं २ की जानकारी मैंने अपने कंप्यूटर से ही जुटाई थी मगर काग़ज़ पर पठान को मुखबिर के तौर पर डाल दिया ताकि उसका अतिरिक्त 'उत्साहवर्धन` हो सके. महीने भर बाद उसे पचास-पचास हज़ार का अंतरिम इनाम भी दिलवा दिया. रकम पकड़ाने के बाद मैंने उसे आड़े हाथ ले धरा ''जीवतराम (खिलाड़ी नं २) ने मेरी लाज बचा ली वरना पठान तुम तो मुझे ले डूबे थे.`
''क्यों साब क्या हुआ?``
''पूछते हो क्या हुआ? नकदी की कितनी बढ़-चढ़कर उम्मीद बंधा रहे थे...तुम्हारे खिलाड़ी नं १ के यहां से सवा पांच लाख मिले हैं बस.`` मैं गुस्से में था, लताड़ रोक नहीं पाया.
''आपका गुस्सा वाजिब है साब मगर मैं कुछ कहूं तो मानेंगे?`` उसकी आंखों में मोहलत की गुहार थी.
''चलो अब यह भी सही, बताओ,`` मैंने सख्त़ बेरुखी में टाला.
''रेवतीराम के यहां आपने किसी मैथ्यूज को इन्चार्ज रखा था?``
''हां, हां, पार्टी नंबर तीन में.``
''वहां गड़बड़ हो गई.``
''मतलब?``
''स्टेट बैंक का एक लॉकर ऑपरेट ही नहीं हुआ...मतलब ऑपरेट तो किया मगर बिना खोले ही छोड़ दिया...`` अपने बचाव से उसने मुझे छलनी कर दिया. मैथ्यूज के प्रति कोई भाव उजागर किए बगैर मेरे भीतर खून उबलने लगा...अक्सर मेरे कमरे में सुबह की चाय पीता है, फिर भी...डायन का पुल्लिंग क्या होगा...हरामी.
''अच्छा!`` निष्कवच होकर मेरी आंखें फटी थीं.
''जाने दो साब, थोड़ी-बहुत ऊंच-नीच तो होती रहती है.``
रवायत के मुताबिक़ अगले तीन-चार महीने उसे मेरे दफ्त़र की शक्ल नहीं देखनी थी. इस दरम्यान सारे काग़जात के गट्ठर से मुझे कर-चोरी की एक ऐसी मूल्यांकित रिपोर्ट लिखनी थी जो मिशन की कामयाबी को सौ-गुना बढ़ाकर सिद्ध करते हुए भी सल्वाडोर डाली की चित्राकारी याद दिला दे. रिपोर्ट पूरी होने के ठीक दो रोज़ पहले उसका फ़ोन आ गया. अपनी नस्ल के नाम को रोशन करती गर्मजोशी से वह बताने लगा कि साब ''ऐसी चीज़ हाथ लगी है कि दिल खुश हो जाएगा.``
''यार तीन महीने से क़ायदे से एक रात नहीं सोया हूं और तुम दूसरी क़ब्र में ठेल रहे हो`` मेरी आवाज़ मुरझाई थी.
''आप देखोगे तो कमल से खिल जाओगे`` उसके जोश की जुम्बिश जारी थी.
''इस कमल को इस बार तुम चन्द्रा साहब के सरोवर में खिलाओ पठान.``
मैं हर क़ीमत उसके फुसलाने में नहीं आना चाहता था. यूं, हर बार एक नया मुर्गा पकड़ने की आदिम इच्छा खून के बहाव में शामिल रहती थी, मगर पौने तीन साल से वही पंचनामा बनवाते, कैवटीज़ ढूंढते, झूठ के मनोगत औज़ारों से धन्नासेठों को धराशायी करते काफ़ी ऊब भी होने लगी थी. सोने-जागने की असामान्यता और खाने-पीने की अनियमितता ने अजीब तरह से तोंदियल और नतीजतन 'हवाबाज़` बना छोड़ा था. मोर्चे पर आक्रमण करने के इस मजबूर दस्ते में हम आठ लोग थे इसलिए हर हफ्ते ही किसी न किसी की'बारात` निकलती थी. यह भी खूब होता कि एक बारात से लौटे नहीं और उधर दूसरी में भागना पड़ रहा है. मगर उस दुनिया में हम प्रसन्न-सुखी थे तो इसलिए कि एक क़िस्म के परपीड़ा-सुख को सलीके से बगल में दबोचने के बावजूद, बेडौल ही सही मगर न्याय के एक नामुराद से बच्चे को हम अपने तइं हर रोज़ डिलीवर होते देखते थे. पठान थोड़ी देर झिझका था क्योंकि अक्सर तो मैं स्वयं उसे 'कुछ नया` लाने को प्रोम्प्ट करता था और फिर भी मेहनत से सुझाए उसके पांच-सात प्रपोजल्स में एकाध को ही तवज्जो देता.
''नहीं साब, देना तो आपको ही है, चाहे महीना और लग जाए...`` उसका इतना विश्वास ही काफ़ी था मगर उसके अगले पांच लफ्ज़ों ने पिघला ही दिया... ''आपके हाथों में बरक्कत है...``
किसी विदग्ध लती की तरह एक पखवाड़े के भीतर ही मैं उसके साथ मामले की निटी-ग्रिटीज में उतरता जा रहा था.
यह एक हडिड्यों के डॉक्टरों का गेंग था जो ट्रौमा अस्पताल चलाता था. पांच समवयस्क डॉक्टरों की भागेदारी जिसकी रहनुमाई डॉक्टर आकाश जोशी के सुपुर्द थी. 'ऑपरेशन` की कागजाती तसल्ली के लिए ज़रूरी बातें वहां पहले से ही मौजूद थीं : क्रीम कलर की छह मंजिला भव्य इमारत के अंदर-बाहर के फ़ोटोग्रास सभी भागीदार डॉक्टरों का सांझा नोट-पैड, सभी डॉक्टरों के घर के पते और मोबायल नंबर, उनके द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली चमाचम गाड़ियां...
''मगर धन-चोरी का तरीक़ा क्या है?`` मैंने मुद्दा कसा.
''तरीका तो जी बड़ा सीधा है. ट्रौमा के केसिज को हाथ लगाने में दूसरे अस्थि-विशेषज्ञ डरते हैं. इसके यहां एक डॉक्टर हैं, मित्रा. उसका भाई पुलिस में है. उसके कारण मित्रा पुलिस को संभाल लेता है और जमकर वसूलता है. यह काम समझो कोई १०-१२ साल से हो रहा है. ज्य़ादातर बेहिसाबी. मगर पिछले चार-पांच साल से डॉक्टर जोशी ने घुटने बदलने (नी-रिपलेसमेंट) की शल्य चिकित्सा में खूब नाम और नामा कमाया है...रोज़ के दो घुटने ऑपरेट करता है, एक सुबह, एक शाम. हरेक का डेढ़ लाख लेता है ''यानी साल के तीन सौ दिन भी गिनो तो नौ करोड़ की बिक्री (डॉक्टरों के संदर्भ में बिक्री शब्द कहते मैं इसके अटपटे प्रयोग पर हँसा)...इम्प्लांट समेत कितने ही खर्चे डालो, तीन करोड़ से ऊपर का मुनाफ़ा तो बैठेगा ही`` मेरे कारोबारी जेह़न ने अपनी चिड़िया की आंख साधी.
''बेशक, तीन नहीं तो, टके से उसने सरकाया. वैसे खूब लंबी चौड़ी हांक ले मगर चलो, कुछ तो 'फिगर्स फोबिया` इसे है.
''पठान, इस शहर में क्या इतने बेवकूफ़ लोग हैं जो अपनी गाढ़ी कमाई को आधे दिन के इलाज में उड़ा देंगे? साले हर चीज़ में तो डिस्काउंट और वटाव मांगते हैं...आइ डोंट थिंक बॉस विल डाइजैस्ट और एग्री टू इट`` मुंह बिचकाकर मैंने उसे आदतन खारिज करना चाहा. मगर उसकी जवाबी कार्रवाई ने मेरे शक का पलीता कर दिया.
इन्फोसिस में कार्यरत अपने काल्पनिक चाचा के घुटने के आरोपण के सिलसिले में वह आकाश जोशी की घसीट लिखावट में संभावित खर्चे का हस्ताक्षरित पर्चा मुझे दिखा रहा था. एक मार्मिक आशुकथा के सहारे,इलाज करवाकर बाहर निकल रहे क़स्बाई मरीज के बिल की फ़ोटोकॉपी उसने अलग से करवा ली थी. मेरे सामने सब कुछ दिन के उजाले-सा उज्ज्वल था या, इतनी रोशनी तो दे ही रहा था कि डॉक्टर जोशी के खड़े किए अंधेरे चुहचुहा जाएं. अब कोई गुंजाइश नहीं थी.
और वाकई, हमारी कार्रवाई के बाद कोई गुंजाइश रही थी नहीं. नकदी ज़रूर हमारी अपेक्षा से कम मिली मगर उसकी एवज़ में बेहिसाबी चल-अचल संपत्ति के ऐसे दस्तावेज़ मिल गए कि मिशन के चयन और सफलता की खूब वाहवाही हो गई.
मिशन की एक मज़ेदार बात डॉक्टर आकाश जोशी के बचपन की सरेआम वापसी थी : वार्ड वॉइज और नर्सों के सामने अपनी मालिकी का मुल्लमा उतार वह बार-बार मेरे घुटने पकड़कर फूट-फूटकर रोने लगता और''मैंने तो कभी किसी का कुछ नहीं बिगाड़ा, मैंने तो कभी चींटी भी नहीं मारी...`` की सुबकियां भरता जाता. बहुत जल्द वह गुत्थी मेरे हाथ लग गई जो उसके पांव तले की ज़मीन को इस क़दर पोला किए दे रही थी : उसके चेम्बर से एक कम-उम्र और यक़ीनन खूबसूरत हसीना के साथ उसकी रंगीनी पर मुहर लगाती खतो-किताबत और चंद तस्वीरें. यानी तस्वीरें-बुतां और खातूनों के खत़ मरने से पहले ही! कौन बचाएगा तुझे मेरे मियां मजनू जोशी!
मुखबिर के लिहाज़ से पठान मेरा मुंह लगा था मगर हमारे आपसी ताल्लुक़ात पेशेवर ही थे. दुनिया-जहां के राज़ बटोरकर जब वह मुझसे मिलना चाहता तो मैं उसे किसी नए रेस्तरां, पार्क या स्टेशन पर आने को कहता, न कि दफ्त़र या घर. फ़ोन पर उसे अपना या मेरा नाम लेने की मनाही थी, मेरे साथ किए उसके केसेज़ के हिसाब से मैं उसे एक संख्या पकड़ा देता था जो उसकी तात्कालिक पहचान का काम करती. किसी मुखब़िर को हमारा फ़ोन करना तो उसूलन ही नहीं बनता था क्योंकि निजी तौर पर हमने अविश्वास की यह घुट्टी पी रखी थी कि ''वंस एन इन्फोरमेंट, आल्वेज़ एन इन्फोरमेंट.`` आर्थिक विषमताएं पाटने के रास्ते संसाधन जुटाने की राज्य की घोषित नीति के हम हरावल पुर्जे थे तो पठान की बिरादरी मानव के सामाजिक व्यवहार से उत्पन्न एक कुटिल पूंजीवादी लुब्रीकेंट. उसका इनाम तो ज़ाहिर था मगर हमारा हासिल वह भटकती ईगो थी जो अपने संभावित शिकारों के बीच रात को शराब की पार्टियों में बाइज्ज़त न्यौते जाने अथवा स्थानीय क्लब की तैराक़ी प्रतियोगिता में 'अतिथि विशेष` बना दिए जाने पर पर्याप्त तृप्त महसूस करती थी.
बहरहाल, डॉक्टर जोशी के सफल 'ऑपरेशन` के बाद मैंने उसे घर बुलाया और ब्लैक लेबल खोल दी. उसने तौबा में कान पकड़ते हुए माफ़ी चाही ''साब आपने इस क़ाबिल समझा शुक्रिया. मैं नहीं पीता...इस्लाम में शराब पीना कुफ्र है.`` अकेले पीने की मेरी आदत नहीं रही. बोतल एक तरफ़ सरका ही रहा था कि उसने मेरे घुटने पकड़ लिए और नौसिखिया अंदाज़ में मिन्नत करने लगा, ''साब यह दूसरा कुफ्र तो मत करवाइए...आप बाक़ायदा लें...इस्लाम में किसी को शराब पीते हुए देखना क़ाबिले-गुनाह नहीं है`` मज़हब पर कसी इस फुरफुरी चुटकी के साथ भरे आदमखोर ठहाके का मैंने भी साथ दिया.
''आज आपकी सिगरेट अलबत्ता ज़रूर पीऊंगा.`` नवाजी इज्ज़त ने स्नेहिल अधिकार ले लिया था. सिगरेट का कश वह कन्नी उंगली के बीच दबाकर खींचता और थोड़ी-थोड़ी देर बाद चुटकी बजाकर राख झाड़ता.
शराब के घूंटों के साथ तबादलों और प्रोन्नतियों को लेकर रोज़ किए जाने वाले आलाप और विमर्श आज नदारद थे. न क्रिकेट का मौसम था और न ही उस पर बात हो सकती थी. कुछ देर हम अपने साझा शिकारों और उनकी खासियतों पर बात करते रहे. गए तीन बरस में मेरे हाथों घायल ग्यारह शिकारों में छह पठान की मेहरबानी थे (तीन मैंने खुद-ब-खुद यानी 'सुओ मोटो` तैयार किए थे और दो में दो अलग-अलग मुखब़िर थे). यानी पठान और मेरी खासी जुगलबंदी थी. मगर त्राासदी देखिए कि उसकी किसी जाती चीज़ की मुझे शायद ही कोई जानकारी थी. आज उसके भीतर कुछ पिघल रहा था.
''इस धंधे में कभी नहीं आता अगर शर्राफ ने उस रोज़ मुझे साढ़े चार सौ एडवांस दे दिए होते. मैं उसके यहां डेढ़ हज़ार रुपए महीने की नौकरी पर था. मुख्य काम था सहकारी बैंक में चैक जमा कराना, रोकड़ा निकालना और तयशुदा पार्टियों से वसूली करने जाना. पगार मिलने में अभी आठ दिन थे. बरसात के दिन थे. बहन छत से फिसल गिरी थी और कूल्हे खिसकने का इलाज कराने दवाखाने में दाखिल थी. पड़ोस के गल्ले से फ़ोन करवाकर अब्बा ने साढ़े चार सौ का इंतज़ाम करने को बोला था. अब आप ये समझो कि बाइस दिन की तो मेरी पगार चढ़ी हुई थी और आधा घंटा पहले ही मैं खुद पर डाल दी मगर मुझसे वह भी न बने. बेवजह ब्याज चढ़ गई. दस जगह ठोकर खाकर इंतज़ाम तो हुआ मगर एक कड़वाहट भीतर जम गई...कि तंगी में कोई सगा नहीं होता...कि पैसे का दरियादिली से समझो कोई वास्ता नहीं. मैंने वह धंधा भी छोड़ दिया और एक तेल मिल में काम करने लगा. छह महीने बाद वह मिल बंद हो गई. बीच में पता नहीं कितनी जगह धक्के खाने के बाद एक शेयर दलाल के यहां टंग लिया. थोड़े दिनों बाद ही आपके विभाग ने उसके यहां छापा मारा था, वह भी दोपहर को. पंद्रह साल तो हो ही गए. सेठ ने मुझे बतौर साक्षी रखवा दिया जिससे मुझे आपके विभाग की ताक़त और तौर-तरीक़ों का पता चला. सारी कार्यवाही में पता नहीं उन्होंने मुझमें क्या देखा कि बड़े नामालूम तरीके से अपने दफ्तर आकर मिलने की दावत दे दी.
बस, वह दिन है और आज का दिन. इतने दिनों सेठ लोगों से खाई जिल्लत, इतने दिनों हर मुमकिन बेगार में खुद को जोतने का नतीजा, समझो मेरा सरमाया बन गया. हिसाबी-बेहिसाबी का फ़र्क तो मुझे ज्य़ादा नहीं पता था मगर यह खूब जानता था कि हर कामयाब धंधे की बुनियाद चोरी पर टिकी होती है. वैसे तो हर आदमी अपनी तरह और हालात के मुताबिक़ चोरी करने को आमादा रहता है मगर इतने दिनों की बेपनाह ठोकरों ने इतना इल्म दे दिया है कि खब़र हो जाती है कि मुक्तलिफ़ कारोबारों की कमज़ोर नसें कहां होती हैं और उन्हें कैसे कुरेदा जा सकता है...देखा जाए तो सरकार ने भी तो आपको इसी काम के लिए रख छोड़ा है...``
''बेशक, बेशक.`` गोकि किसी स्वप्न से जागकर मैं बड़बड़ाया.
उसके ''रख छोड़ा है`` के वाहियात प्रयोग के बावजूद तभी मुझे अहसास हुआ कि अपने पसंदीदा पेय को मैं कितनी शर्मनाक रफ्तार से पी रहा था. एक लंबा घूंट खींचकर मैंने दूसरा पैग बनाया और उसके लिए सूप मंगवाया जिसे, जल्दी खत़्म करने के फेर में वह बारी-बारी से प्लेट में डालकर सुड़कने लगा था.
बात का सिरा जोड़ने के इंतज़ार में मैंने एक और लंबा घूंट खींचा और सहारे का कंधा बदलकर पांव फैला दिए. ''यार पठान तुम्हारी तत्काल झूठ गढ़ने की काबिलियत का मैं बहुत मुरीद हूं...सही कहूं तो इस मामले में तुमसे बहुत सीखा है मैंने...कैसे कर लेते हो...?``
गहराते सुरूर में ऊपरी तौर पर नागवार लगने वाले इस आरोप में छापों से पहले की जाने वाली ज़रूरी टोही हरक़तों (रिकॉनिसंस जिसे 'रैकी` कहने का चलन था) का तजुर्बा था. वह अर्राता हुआ गोकि शे`र की मांद में हाथ डाल देता था. मैं यथासंभव अनचीन्हा-सा उसके दायरे में डोलता रहता इत्तफाकन भी किसी परिचित से टकराए जाने की संभावना से खुद को बचाते हुए.
''सर, ज़रा एक मिनट हल्का हो आऊं.`` उंगली के इशारे से पठान ने अपनी थुलथुल काया को अचकचाकर सीधा किया.
''सामने राइट को है`` मैंने इशारे से समझाया.

वह एक बिल्डर का केस था. श्री पैराडाइज़ बिल्डर्स का. संभावित ग्राहक बनकर वह किसी फ्ल़ैट का इस बारीकी से मुआयना करता मानो कल से आकर रहने लगेगा.
''किचिन में काम करवाना पड़ेगा...करवा देंगे ना...भैया ऐसा है मेरे सेठ के साथ उसकी बूढ़ी मां रहती है जिसे एलर्जिक अस्थमा है इसलिए कैमिस्ट शॉप नजदीक चाहिए...इसके सामने वाला रिहाइशी है या इन्वैस्टर का है, सुनसान में तो नहीं रहना पड़ेगा...`` वह सख्त़मिजाजी से बकता जाता. बिल्डर से क़ीमत तय होने के बाद वह दस्तावेज़ी और 'ऑन` में दी जाने वाली राशि का हिसाब बिल्डर से ही लिखवाता.
''ऑन का प्रतिशत पचास से साठ या सत्तर हो सकता है मालिक`` कहकर वह जेब में पड़े माइक्रोटेप को चालू कर देता. किसी जीनियस शिल्पी की तरह अपने मकसद में वह यूं एकाग्र हो जाता कि मेरी मौजूदगी को भी भुला देता.
''साठ तक आराम से हो जाएगा.``
''फिर ठीक है...वो क्या है सेठ के अपने एक्सपोर्ट के चक्कर में मालिक साब तो लंदन-फ्रांस घूमते रहते हैं,उनका सारा हिसाब मुझे संभालना पड़ता है मगर माफ़ करना, पैसे के मामले में एक रुपए की हेर-फेर जायका बिगाड़ देती है...मुझे आप यहां इस सत्राह लाख का ब्रेक-अप करके दे दो`` कहकर वहीं पड़ा काग़ज़ उसने उसकी कलम के नीचे सरका दिया. बिल्डर ने ७ डी और १० सी को ऊपर नीचे लिखकर लाइन खींची और उसके नीचे १७ लिख दिया. आंख में बाल दबाए पठान के लिए यह नाकाफ़ी था. वह उठा और उसके सामने अध-झुका होकर मासूमियत से दरयात़ करने लगा:
''७ डी माने?``
''अरे यह भी नहीं पता, सात डी यानी दस्तावेज़ सात लाख का.``
''और १० सी?``
''दस लाख कैश रहेगा.``
''यह हिसाब ५-१२ का नहीं हो सकता मालिक.``
''भाई, हमारे यहां सात के आसपास के दस्तावेज़ हो रहे हैं, आपको दिक्क़त है तो पांच का करवा देंगे.``
''मेहरबानी मालिक, मैं हफ्त़े-दस रोज़ में आपसे कॉन्टैक्ट कर लूंगा.`` कहकर पठान उठ लिया. मगर भूल-सुधार सी करता बिल्डर बोला.
''आपका नाम?``
''राजन.``
''मोबाइल है?``
''छोटा आदमी हूं, साब, क्यों मज़ाक़ करते हैं.`` पठान की यह परिचित पगडंडी थी. वह जानता था कि शक को ज़हर बनते देर नहीं लगती है. 'शिकार` अब क्या वार कर सकता है?...वह मालिक का नाम-पता या टेलीफ़ोन पूछ सकता था. नाम-पते की पुष्टि करने की फुर्सत चाहे न हो मगर टेलीफ़ोन तो कोई भी खडूस़ घुमा सकता था. इसका तोड़ उसके पास था : वह अपने घर के फ़ोन का ऐसी आपात स्थिति के लिए उपयोग करता. मगर पहली कोशिश ऐसी नौबत न आने देने की होती. इसलिए वह तुरंत प्रति-आक्रमण कर बैठता.
''मालिक आप तो ऐसे सुनवाई कर रहे हैं जैसे हम तिहाड़ से छूटे हों.``
बात निपटाकर वह नजदीक के पान के गल्ले पर सिगरेट सुलगाता और कुटिलता से हँसकर कहता. ''कोई गुंजाइश साब.``
काग़ज़ की लिखावट को उदघाटित करती बिल्डर की आवाज़ का साक्ष्य 'पैराडाइज़` की खुशहाली की मुकम्मल पोल खोल रहा था.
''नहीं, कुछ नहीं.`` अपनी तसल्ली और खुशी पर काबू रखते हुए मैं हामी भरता.
मगर किशनचंद लक्ष्मणदास ज्वैलरी डिजाइनर के मामले में झूठ के तरीक़े ने हमें दूसरी ज़िंदगी दी थी. एक निष्कासित कारिंदे की मार्फत उसके दो नंबरी तौर-तरीक़ों की ब्यौरेवार तफ़सील पठान ने पहले ही मुहैया करा दी थी. शिकायतों के पुलिंदे को 'ऑपरेशन` में तब्दील करने के लिहाज से हम पहली मंज़िल पर उसके दफ्त़र की घुमावदार सीढ़ियां चढ़ने वाले ही थे कि पास आ रहे आदमी से हमने किशनचंद लक्ष्मणदास की ताक़ीद कर दी जो बदक़िस्मती से वह खुद था.
''जी आप?`` मेरी ज़मीन खिसक गई.
वह साथ-साथ चढ़ता रहा. दरबान ने उसे देखते ही दरवाज़ा खोल डाला और हमें भीतर धकेल-सा दिया.
''जी मैं किशन...मगर आप?``
''हम एअरटैल से हैं.`` पठान ने बचाव में कूद लगाई.
''मगर मैं तो एअरटैल का कस्टमर नहीं हूं.`` संशय के उसी तेजाबी तेवर ने हमें बर्खास्त किया.
''नहीं हैं तभी तो आपके पास आए हैं`` पठान ने नर्मी ओढ़ी.
''आपको मेरा नाम-पता कहां से मिला?``
कमबख्त़ सूत भर गुंजाइश नहीं दे रहा था.
''हम कस्टमर केअर से हैं...अच्छे या संभावित ग्राहकों की खब़र रखते हैं.``
मरहम लगाते हुए पठान मिन्नत की मुद्रा में आ गया.
अपने-अपने मॉनीटर्स पर पैवस्त सभी लोगों की निगाहें अब तक हम पर एकाग्र हो चुकी थी.
''आपका आई कार्ड या कार्ड होगा?``
मेरी सांस रुक गई. क्या करेगा अब पठान? किस घड़ी चले थे घर से. यह केस तो हो गया चौपट. साले कैसे-कैसे दुष्ट लोग हैं दुनिया में...
''आई कार्ड और कार्ड तो हम अपने सेल्सवालों को इशू करते हैं.``
क्या दूर की कौड़ी लाया है पट्ठा! मगर हे भगवान, यह काम कर जाए.
''तो जो काम आप करने आए हैं यह सेल्सवालों का नहीं है?``
अबे हरामी निमोलियों का नाश्ता करके आ रहा है क्या?
''आपने बजा फरमाया...यह काम मेनली तो उन्हीं का है मगर कस्टमर केअर वालों को तो ओवरऑल देखना ही पड़ता है...आप जानते होंगे कि सैल कंपनियों में कितना कंपटीशन हो गया है`` पठान ने चिरौरी की. वह बात को वृहत फलक पर ले जाकर टूटे तारे की तरह गुम कर देना चाह रहा था.
तभी, 'होम कालिंग` को लैश करता मेरा मोबाइल जिंगलबैल की धुन टेरने लगा. मैंने तपाक़ से हरा बटन दबा दिया : ''हां सर, हम मार्किट में ही है...सात-आठ कस्टमर विज़िट किए हैं. रेस्पॉन्स तो अच्छा ही है...आना पड़ेगा, ठीक है सर, बाक़ी आफ्टरनून में कर लेंगे...ओ के सर, आते हैं...`` मेरे एकालाप पर पत्नी सन्न होकर ''क्या बकवास किए जा रहे हो`` की लाचारी कुनमुनाती रही मगर उसे ज्य़ादा मौक़ा दिए बगैर मैं उस औज़ार का दम घोंट चुका था ताकि वह फिर से सान्ता क्लौज़ को न पुकारने लग जाए. टोहगिरी करते वक्त़ हमारे मोबाइल अमूमन गूंगी हालत में ही रहते थे. आज गल़ती हो गई थी, मगर गल़ती भी तिनके का सहारा बनकर आ गई थी. यही तो इस पेशे की विचित्र गति है.
जान छुड़ाकर हम बाहर आए तो कन्नी उंगली में फंसाकर सिगरेट का कश खींचते हुए पठान ने चेताया, ''साब इस केस में देर करना ठीक नहीं...इसकी जान-पहचान में ज़रूर किसी के कोई छापा पड़ चुका है वरना कोई आर्टिस्टिक दिमाग इतना एलर्ट नहीं हो सकता.`` उसी केस में, निदेशक गंगाधर जांगिड़ के सामने दर्ज झूठ ने सारी समस्या ही सुलझा दी.
''फार्म हाउस का पता कर लिया है?``
फ़ाइल में मेरी लिखी टिप्पणी और लैग किए दस्तावेज़ों को ध्यान से पढ़ने के बाद जांगिड़ साब ने पूरे गुरु-गांभीर्य के साथ, नजदीक के चश्मे से निगाह उठाकर मुझे तौलते हुए दरफ्यात की.
''यस सर, वहां एक सर्वे टीम रखी है.``
''डज़ ही हैव ए कीप?``
जांगिड़ की यह स्थायी गांठ थी कि अनाप-शनाप पैसे वालों की जेब में रखैल का न होना इन्सानी फितरत के बेमेल पड़ता है...यू सी, द अदर वोमन इज द नेच्यूरल सैक्टयूअरिटी ऑफ बिग बिजनैस...हमें नहीं खब़र तो यह उसकी होशियारी कम, हमारी टोही...कोशिशों की नाकामी ज्य़ादा है...`` उन पर जैसे भगवान ओशो सवार हो जाते. न बताए जाने पर वह केस को मुल्तवी करते हुए कहते ''फाइंड आउट, देअर इज नो हरी``और हम 'यस सर` की पूंछ हिलाकर कसमसाकर निकल पड़ते : सच्ची-झूठी की रखैल पैदा करने.
मैं कोई आधी-अधूरी रखैल खड़ी करने ही वाला था कि पठान ने पुख्त़ा यक़ीन की सहजता से जड़ा (मुझे ताज्जुब रहा कि अंग्रेज़ी में खासा पैदल दिखने के बाद उसने जांगिड़ की बात कैसे लपक ली!)
''दो हैं न साब.``
''दो!`` अपने यक़ीन की इस क़दर पुख्त़गी में जांगिड़ बेयक़ीनी से उछल पड़े (नौकरशाहों के ऐसे यक़ीनों पर हाय में सदके जावां!)
''हां साब, एक बाप की है, एक बेटे की`` पठान ने ऐसे कहा मानो वे दोनों बाहर खड़ी उसका इंतज़ार कर रही थीं.
'अइ शाबाश!``
इन्सानी फितरत के इस दो टूक और समतामूलक खुलासे ने जांगिड़ की बांछें खिला दीं.अब केस अकस्मात् ही इतना मजबूत हो गया था कि दूसरे सबूत बेमानी हो गए थे.बाद में जब मैंने पठान से पूछा तो तौबा में बारी-बारी से दोनों कान छूकर बोला, ''वो तो साब मैंने ऐसे ही बोल दिया था.``
''ऐसे ही मतलब?`` धीमी होते हुए भी मेरी आवाज़ कड़क थी.
''ऐसे ही समझो खाली-पीली`` वह दांत निपोरकर हिनहिनाया.
''तू मरवाएगा.``
पहली बार उसके लिए मेरे मुंह से 'तू` संबोधन फिसल गया. मैं कभी उन बेअदब बिरादरानों में नहीं रहा जो उम्र में अपने हर छोटे और दो-चार बरस बड़े को फट से 'तू` दाग देते हैं, इस गुमान से कि 'विक्टिम` के प्रति वे कितने स्नेह और नज़दीकी का जज्ब़ा रखते हैं.
''तौबा मेरी...आप यह देखिए साब कि केस के बारे में आप खूब जानते-समझते थे और बड़े साब को रखैल चाहिए थी...तो इसमें गल़त या झूठ क्या है.`` वह नब्बे डिग्री कोण पर सामने अपना पंजा छितराकर मुझे कनविंस कर रहा था. अपनी आवाज़ की पिच को फिर अचानक धीमे करके बेशर्मी से बोला, ''एक बात बताइए साब...शादी के बाद किसी ने दुल्हन की छातियों की शिकायत की है क्या?``
''व्हाट बुलशिट`` मैंने नरमी से हँसकर उसे चलता किया.
एक अबूझ तसल्ली से वापस लौटकर सामने पकौड़ों और दो-तीन तरह के नमकीनों की ताज़ा खेप देखकर पठान ने पिघलकर ताना दिया, ''क्या साब, घर भी जाने देंगे कि नहीं`` सभी प्लेटों से कुछ न कुछ उदरस्थ करने में अलबत्ता उसने ज्य़ादा तकल्लुफ नहीं की.
मुझे ही लगने लगा मानो पकौड़ों के मोल मैंने उससे जवाब मांगा है. पहले तो उसने आसमान की तरफ़ इशारा करके ''सब ऊपर वाले की दुआ समझो`` कहकर शराफतन बचना चाहा मगर अगला घूंट भरते न भरते मैंने देखा कि वह किसी निश्चित यक़ीन से फूले जा रहा है. अपनी तसल्ली के लिहाज़ से बोला, ''आपका गिलास खाली हो रहा है, इसे तो भरिए?``
''आधे मिनट में एक 'स्माल` के साथ सोडा-पानी मिक्स करके मैंने सामान्य रत़ार पकड़ी तो किसी पैगम्बर की सी भंगिमा ओढ़कर बोला, ''पता नहीं साब...कभी सोचा नहीं...हमारी जाती ज़िंदगियों के तजुर्बे ही हमारी फितरत तय करते हैं. बड़े दिनों तक ट्रकों के भाड़े की दलाली में ईमानदारी ने मुझे इतनी और ऐसी पटकियां खिलाई कि क्या पूछिए. मैं कायदे से आधे टके पर काम करूं तो व्योपारियों को ज्य़ादा लगता मगर पुलिसिए और मुंसीपल्टी के नाम का रोज़ दो-पट लूं तो उन्हें कोई एतराज नहीं. हक़ीक़त बात ये है कि सच बोल के ज़मीर तो सुकून से रहता है मगर दुनियादारी के खामियाजे इस पर भारी पड़ते हैं. गांव के मैदानी स्कूल में मेरे साथ एक लड़का पढ़ता था चमन. हमारी तरह ही फाकेहाल मगर रहता बड़ी साफ़-सफ़ाई से था. मास्साब उसी से लोटे में हैंडपंप का पानी मंगवाते. एक दिन चमचमाते लोटे में जब वह ठंडा-ठंडा पानी लेकर आया तो मास्साब ने उसकी दरफ्यात कर दी : ''ले आया?``
उनकी आंखें किसी घात लगाए चीते सी नापाक थीं.
चमन की समझ न पड़े कि माजरा क्या है. क्या कहे?
''?``
''थूक डाल दिया था`` अपने गुबार को मास्साब ज्य़ादा देर नहीं रोक पाए.
''ना मास्साब`` बेनूर होते जा रहे चमन ने सफ़ाई में गर्दन हिलाई.
मगर एक बलिष्ठ हथेली ने तभी चमन के बाएं गाल और कान की खपच्चे बिखेर दीं. भरे लोटे के साथ वह औंधे मुंह जाकर गिरा. हालत इतनी खस्ता कि रोने लायक हौसला भी नहीं बटोर पा रहा था.
दरअसल उसकी पीठ पीछे किसी ने इस 'सच` से मास्साब के कान भर दिए थे. चमन क़सम खाकर मना करता रहा कि इल्जाम सच नहीं है. उसकी बेतरह धुनाई करते जा रहे मास्साब ने इस बिना पर अपने ब्रेक लगाए ''ठीक है, आज नहीं थूका मगर सच बता...पहले कभी थूका था...ध्यान रखियो...सच बोलेगा तो मैं छोड़ भी दूंगा पर झूठ बोलेगा तो तेरी खैर नहीं...``
सच या झूठ मगर चमन ने गुनाह कबूल कर लिया, मगर मास्साब ने सरासर वादाखिलाफ़ी की : चमन को जमकर सूंता और स्कूल से निकलवा दिया.
आप यह देखिए कि सच की राह के ज़रा से वाकये ने एक अच्छे-खासे बच्चे की ज़िंदगी बदल दी. देहात भर में मची खब़र की खिल्ली ने उसके बाप को सन्न कर दिया. तीसरे रोज़ चमन गांव से भाग गया जो कभी नहीं लौटा. सुनने में यही आया कि कुछ दिनों उसने गुमटियों पर चाय के बर्तन मांजे, जेबें काटीं और दो-चार बार पुलिस हिरासत में रहने के बाद होते-होते जिस्मानी कारोबार का दल्ला बन गया.
चमन और स्कूल को छोड़िए, मेरी अपनी ज़िंदगी में कितने वाकए और हादसे हुए कि सच से यक़ीन उठ गया. हमारी दुनिया में इतनी कूवत नहीं है कि वह सच को एक हक़ीक़त की तरह पचा ले...दूसरों के नाजायज़ ताल्लुक़ात की तरह वह उसमें एक मालूमाती दिलचस्पी तो रखती है मगर बर्दाश्त नहीं करती है. सच कहूं, सच इस दुनिया का सबसे बड़ा झूठ है. कितनी तो इसकी बैसाखियां हैं...आप हिंदी में क्या कहते हैं...समय-सापेक्ष, व्यक्ति-सापेक्ष, परिस्थिति-सापेक्ष, नीयत-सापेक्ष...
मैंने उससे क्या पूछा था और पट्ठे ने कहां ले जा पटका. बहरहाल अपनी दुनिया के काले-सफेद और खुरदरे झूठों से परे मुझे इन्सानी फितरत में पैवस्त ऐसे चिकने और बेरंग झूठों की याद ताज़ा हो आई थी जो कड़वे सचों से ज्य़ादा घातक और मारक रहे थे. स्कूल में वीके गुप्ता भौतिकी पढ़ाते थे. अपेक्षाकृत जवान-से दिखते और हँसमुख. विषय में दुरुस्त. बढ़-चढ़कर सवाल पूछने को प्रेरित करते ''मुझे लगना चाहिए मैं कद्दू-बैगनों को नहीं, समझदारों को पढ़ा रहा हूं,`` वे जैसे चुनौती फैंकते. भला हो उस सीनियर का जिसने वक्त़ रहते चेता दिया ''कभी इस चक्कर में मत पड़ना...समझ में न आए तो घर पर दो घंटे एक्स्ट्रा लगा लेना या किसी साथी से पूछ लेना...अपने पढ़ाए पर सवाल किए जाने से गुप्ताजी को एलर्जी है...प्रैक्टीकल्स तो हमेशा इनके ही पास रहने हैं.``
और सालाना नतीजे वाक़ई इसके गवाह थे.
मगर उसके फलसफे में दो ईटें जोड़ने की बजाय मैंने बात का रुख बदला, ''मगर मियां ज़मील अहमद पठान, मेरी समझ में यह नहीं आ रहा है कि तुम सच की पैरवी कर रहे हो या झूठ की?``
''पता नहीं साब...मैं दोनों को ज़िंदगी के बरक्स, सिक्के के दो पहलुओं की तरह देखता हूं, अलहदा करके नहीं...``
मियां तुम इतने बड़े फिलॉसफर नहीं हो जितना बने जा रहे हो.
''अमां सच-झूठ के दरम्यान इतना घपला भी नहीं है कि दोनों में फ़ऱ्क ही न हो सके`` मुझे सख्त़ी से कहना पड़ा.
एक बार फिर उसने कंधे का सहारा बदला और खुजली की हाजत में तर्जनी उंगली कान में डालकर झनझना दी. एक पकौड़े को एक बार में आधे से ज्य़ादा गड़प किया और किसी पोशीदा चाल को दबाती मुस्कराहट में बोला, ''उसे जाने दीजिए. फ़िलहाल आप यह बताइए कि आप मेरी काबलियत कितनी समझते हैं...बताइए,बताइए...``
''काबलियत की तुममें क्या कमी है, अच्छे-अच्छों की ऐसी-तैसी कर देते हो...``
''मज़ाक़ नहीं सर, सच बताइए.`` उसका कौतूहल कुछ दर्ज करने को बेताब था.
''बहुत पहले तुम्हीं ने कहा था...तुम चौथी पास हो...`` स्मृति के अंधेरे बस्ते से मेरे हाथ जो लगा, निकाल खींचा.
''जी हां, कहा था और अब कह रहा हूं कि मैं ग्रेज्युएट हूं, एमए प्रीवियस का फार्म भी भरा था मगर हालात नहीं बन पाए...बीए में मेरे पास हिस्ट्री, सोशियोलॉजी और इकॉनॉमिक्स थे...``
मेरा तीसरा पैग खत़्म हो गया था मगर उसके खुलासे ने सुरूर को फुसलाते रहना और, अभी-अभी उसके बताए वे सभी दोयम-कमतर काम जो किसी पढ़े-लिखे की सोच और गैरत में शामिल नहीं हो सकते थे. एक पल को जेह़न में यह खय़ाल खटके बगैर नहीं रह सका कि पठान के 'केस` में मेरी 'रैकी` कितनी बुरी तरह 'ऑफ टारगैट` हो गई है. यह कम बड़ा सदमा नहीं था. शायद उसे भी लगा कि अपने बारे में ऐसी बात छिपाकर उसने क्या फिजूल का गैप खड़ा कर लिया है.
भीतर से 'डिनर रैडी` का संदेश आया तो पठान हड़बड़ाकर उठ खड़ा हुआ. घर से बाहर निकलकर उसे विदा करने की छूट मुझे नहीं थी. अधखुले दरवाज़े पर किसी चूहे की तरह उसने दाएं-बाएं झांका और चला गया इस उम्मीद में कि उसे फ़ोन पर मेरे 'सात नंबर` पुकारे जाने का इंतज़ार रहेगा.
मगर मैंने उसे ''हां भाई सात नंबर`` टहेलता फ़ोन नहीं किया. मैं पल-पल अपने तबादले की इंतज़ार कर रहा था. तीन साल से दिन-रात छापे मारते-मारते मेरी हालत स्टड फार्म के उस घोड़े जैसी हो गई थी जिसके 'काम` को दूसरे बड़े रश्क से देखते हैं मगर एक तात्कालिक आनंद के बावजूद अपने कर्म से वह इतना ऊब-उकता चुका होता है कि दिन रात 'उसी` से पलायन करने की सोचता रहता है...गधा बनकर बोझा सहलाने में लगा था. क्यों इस मुर्दे में जान डालने में लगा है खुदगर्ज...कितना ही करले, अब तेरी दाल नहीं गलेगी...अवर हनीमून इज़ ओवर!
''आपने ऐसा 'केस` नहीं किया होगा.`` अच्छा, ऐसा नहीं किया होगा तो कैसा किया होगा? एक अदद उबासी खींचकर मैंने चटखारा लिया...तो जनाब फरमा रहे हैं कि अभी तक हम घास छीलते रहे हैं.
''आपका दिल खुश हो जाएगा.``
वह अपनी लेन में घुसने को आमादा हो रहा था.
''पठान, इस वक्त़ यह जगह ऐसी बात करने को मुनासिब नहीं है...तुम्हें बताना है तो छह बजे के बाद आना.``
मेरे द्वारा बेतकल्लुफ पर क़तर दिए जाने के बावजूद वह 'सॉरी सर` गिड़गिड़ाने लगा और शाम को आने का हुक्म सर पर ओढ़े चला गया.
जब आम खाने ही नहीं हैं तो पेड़ क्या गिनने?
मगर ठीक छह बजे वह उसी तरह दबे पांव चेंबर में घुस आया. इस दरम्यान मैंने अपना मन और पुख्त़ा कर लिया था कि बिना मोहलत दिए उसे टरका देना है. इसलिए उसके कायदेसर बैठने से पहले ही मैंने दाग दिया, ''तुम जानते तो हो पठान कि मेरे ट्रांसफर का बस आजकल-आजकल हो रहा है...क्या फ़ायदा कि केस करने की वजह से किसी को चार्ज देने में डिले हो जाए.``
''आप केस को एक नज़र देख लो... जितना हो सके डैवलप कर लो...बाक़ी जैसी ऊपर वाले की मऱ्जी...``कहते हुए उसने हाथ ऊपर उठाया. ऐसी जायज अर्जी पर बेरुखी में सुनते हुए भी मुझे 'चलो बताओ` की रियायत देनी पड़ गई.
उसने उचककर एक पुलिंदा मेरी नज़र कर दिया. ज्य़ादातर चीज़ें अभद्र-सी लिखावट में सिलसिलेवार नाम जावेद अहमद सिद्दकी. बीवियां तीन. बंगले चार (एक पुश्तैनी जिसमें विधवा मां रहती है और जहां जावेद दूसरे-चौथे रोज़ आता-जाता है). बेटे सात, पांच शादी-शुदा. आठ दुकानें चमनपुरा बाज़ार में, पांच नवाबगंज में. 'सुकून` सुपर मार्किट में आधे की भागेदारी. नीलमबाग से थोड़ा आगे पांच हज़ार गज़ का प्लॉट जिसमें एक बिल्डर के साथ मिलकर लैट्स-दुकानें बनाने का काम शुरू होने वाला है. तीन पैट्रोल पंप (दो शहर में,एक हाइवे पर). तीन टैंकर और बाइस ट्रक. निजी वाहनों में तीन लांसर, दो होंडासिटी, दो कॉलिस, तीन सेंट्रो और एक टाटा सूमो...``
''कोई काम ऐसा भी है जो यह नहीं करता है.``
मैंने तंज कसा...क्या पता मुझे मोहरा बनाने के लिए ही इतना बड़ा चुग्गा डाल रहा है.
''तभी तो.`` मेरा मंतव्य समझे बगैर उसने अधीरता से जड़ा.
''यार लानत है हमारे जैसे चश्मपोशों को जिन्हें ऐसे माफिया अहमक की खब़र तक नहीं...``
मैं अब भी उसके 'किला-ए-तसव्वुर` को गिराने में लगा था.
''ज्य़ादातर चीज़ें तो बेनामी हैं...फिर साब आप लोग हमारी बस्ती-मोहल्लों में आते कहां हैं? आप तो वहां घिन और गंदगी ही देखते आए हैं...और आपका भी क्या कसूर जब पुलिस भी किसी मुहिम के दौरान ही हाजरी बनाती है...बिजली वाला रीडिंग लेने नहीं जाता...`` वह अपनी बात बढ़ाता ही जा रहा था कि मैंने टोका, ''अमां तुमने हमारी वक्त़ मीटर रीडर जितनी कर दी?``
''वो बात नहीं है साब...जो ताक़त और रुतबा आपके विभाग के हाथ है, और किसी के पास कहां? पैसा इन्सान की सारी करतूतों का समझो जोड़ भी है और निचोड़ भी. पैसे के बगैर धर्म का भी गुज़ारा नहीं होता,पैसा ईमान डिगाता ही है...और आप लोग आदमी के हलक़ से इसी को निकाल लेते हो. कमा ले कोई जितना चाहे हिसाबी-बेहिसाबी पैसा...खा तो वह सकता नहीं है, बस उड़ा सकता है मगर कितना? आखिऱ में तो वह बीवी के गहने-जेवर बनवाएगा, पुश्तों के इन्तजामात में ज़मीन-जायदाद बनाएगा, लॉकर-एफडी में रखेगा...``
''रखैलों पर उड़ाएगा?``
मेरे ज़ेहन में जांगिड़ साब आ खड़े हुए.
''बेशक, रखैलों पर भी उड़ाएगा`` 'पर` पर जोर देकर उसने मेरी बात दोहराई.
''तो तीन बीवियों के बावजूद जावेद यह शौक़ फरमाता है या नही?``
''क्यों नहीं साब, क्या वह इन्सान नहीं है?``
मेरी चुहल पर पठान भी जुगलबन्दी करने लगा.
''ऐसे ही जैसे किशनचंद लक्ष्मणदास की थी या सचमुच की?``
मेरे चटखारे की नब्ज़ पर पोटुओं से अपना टेंटुआ पकड़कर वह पिघल पड़ा.
''अल्ला कसम साब! लो, वो तो मैं भूल ही गया था...एक स्कूल भी तो है इसके... उसकी प्रिंसिपल...कई साल से है. आपको तो पता ही होगा कि स्कूल से बढ़िया आजकल कोई धंधा नहीं. मनमाफिक फीस लो,बिल्डिंग के नाम पर डोनेशन लूटो, उधर सरकारी ग्रांट्स अलैदा...और खऱ्चे के नाम पर थोड़ा-बहुत बिजली-पानी और स्टाफ- टीचर्स की तन्खाहें...उसमें मनमानी कटौती, जिस मर्जी को लगाओ-हटाओ या अपनी'प्रिंसिपल` बना लो...``
विभागीय निस्संगता के उस दौर में रिवार्ड की एक फ़ाइल जांगिड़ साब की स्वीकृति के लिए लेकर गया तो उन्होंने बुरी खब़र दे मारी : विभाग के अखिल भारतीय तबादलों की नई नीति आ रही थी जिसके तहत इस वर्ष कोई तबादला नहीं होना था, सिवाय शिकायत अथवा अनुकंपाशील मामलों के जिनमें मेरी गिनती नहीं थी. लंबी पारी के कारण मेरे ज़ाहिर आलस्य को भांपकर उन्होंने अपनी तरह से मुझे खूब झिंझोड़ा मुख्यत: एक सफल छापेबाज होने के मेरे पोशीदा अहम् को सहलाते हुए. ऐसी हालत में हफ्ता-दस दिन यूं ही निकालने के बाद मैंने जावेद अहमद सिद्दकी का केस उनके समक्ष रख दिया. उसका नैटवर्क, तौर-तरीका और कारोबारी विविधता देखकर वे लगभग उछल पड़े. टारगैट हिट करने के लिए हर सुरमई रंग वहां पहले से ही मौजूद था मगर उनकी अतिरिक्त तसल्ली का सबब कुछ और ही निकला : ''एक प्रवर्तन संस्था के तौर पर इतने बरसों काम करते हुए हमने कभी इस नज़रिए से नहीं सोचा मगर पिछले तीन-चार छापों के बाद कई संगठनों ने हम पर आरोप लगाया है और मैं समझता हूं कि आरोप बेबुनियाद नहीं है कि हम अपनी दादागिरी सब पर चला लेते हैं, सिवाय एक खास कम्यूनिटी के...आई थिंक इफ वी आर इम्पार्शल, लैट्स लुक लाइक वन...``
इससे ज्य़ादा ग्रीन सिग्नल की दरकार नहीं थी कि मुझे क्या करना है. उल्टे, मुझे एक भीतरी तसल्ली थी कि केस के 'सही` होने की बाबत मुझे निदेशक के सामने कोई खसखसा जस्टीफिकेशन गढ़ने से निजात रहेगी.
जावेद की जड़ों की तहक़ीकात करना मेरे अभी तक के अभियानों का सबसे कसैला अनुभव था. दूसरे कारोबारी शिकारों में बखूबी आजमाया मेरा हर हथकंडा यहां मुंह की खा रहा था. मैं पस्त-हालत (यानी बेनहाया और हवाई चप्पलें चढ़ाए) में कूरियर बॉय बनकर जाता तो तंग गलियों के उस गंदले चक्रव्यूह में निठल्ले बैठे-घूमते लड़के मेरी ऐसी सुनवाई करने लगते कि जान पर बन आती. मैं दत़र से दूर किसी पीसीओ बूथ से ग्राहक बनकर 'अस्सला वालेकुम` से शुरुआत करता तो दूसरे ही पल चौराहे पर अपनी मां-बहन की इज्ज़त नीलाम कर दिए जाने की बजबजाती धमकी बर्दाश्त करता. उसकी आवाजाही को ट्रैक करना तो नामुमकिन ही था. पता नहीं क्यों उसे रक्तचाप की शिकायत नहीं थी वरना आसपास के पार्कों में सुबह-सुबह स्पोर्टस वियर में दो हफ्ते ब्रिस्क वॉक करते किसी एक दिन तो मैं उससे टकराता. भला हो'प्रिंसिपल साहिबा` का जिनकी दरियादिली ने मुझे बस फेल होने से रोक दिया. बहरहाल, मैं इस बात को बहुत अच्छी तरह समझ गया था कि दफ्तरी काम-काज के सिलसिले में लोग क्यों अवसादग्रस्त हो जाते हैं.
जानकारी के आपसी लेन-देन और आगे की रणनीति तय करने की जगह इस बार शहर की बड़ी लाइब्रेरी थी जिसके भीमकाय हॉल में दोपहर को अमूमन सन्नाटा रहता था. एकाध किताब बगल में दबाकर हम मजे से ज़रूरी खुसपुस कर सकते थे.
''अमां किस दोज़ख में फंसा दिया तुमने पठान.`` दो हतों की पिसायी के बाद मैंने अपनी कोफ्त निकाली.
''दोज़ख नहीं साब, समझो रिवार्ड केस है...आपके हल्ले हो जाएंगे`` वह ठंडक से आश्वस्त करता.
''जान तो बच जाएगी ना.`` किसी निरंकुश के भीतर एक कोने में ठहरे डर की तरह मैं अपना पोस्ट-ऑपरेशन डर उस पर उगलता.
''आज तक कभी हुआ है क्या?``
''तुम यह बताओ कि इतनी सारी जानकारी तुमने कैसे हासिल कर ली?`` यह उसके राज़ की तहक़ीकात नहीं, टोहगिरी के जोखिम रास्तों मिले फफोलों की कसक थी.
''आपको जोखिम ज्य़ादा लगते हैं क्योंकि आप कौम से बाहर के हैं. कौम के भीतर कुछ न कुछ तो चलता ही रहता है...शादी-ब्याह के चर्चे, बिरादरी-रिश्तेदारी की बातें. फिर इसके एक लड़के के यहां मेरे साले की लड़की नौकरानी है...जिस आदमी की लाखों की ज़मीन इसने दहशत के दम पर कौड़ियों के मोल हड़प ली,वह मेरी खाला के यहां किसी का रिश्ता लेकर आया था...``
मुझे यक़ीन आने लगा था फिर भी पूछे बगैर नहीं रहा, ''कोई जाती मामला तो नहीं?``
दरअसल जाती समीकरण चीज़ों को इतना तोड़-मरोड़ डालते थे कि 'सही` टारगैट की शिनाख्त़ मुश्किल पेश करती थी...हर निष्कासित कर्मचारी, नाराज़ भागीदार और त्रस्त लेनदार हमारी मार्फत 'हिसाब` चुकता करने को बौराया रहता था (सिवाय उन चंद 'मित्रों` के जिनकी राष्ट्रीयता की भावना ज्य़ादा उदात्त क़िस्म की थी.).
''एकदम नहीं साब...आपके काम की तरह मेरे काम में जाती बात कुछ नहीं होती है. अल्लाह के फ़जल से किसी चीज़ की कमी नहीं है...आप जैसे मेहरबानों का साया है. मेरे मुसलमान होने के खय़ाल से आपके मन में यह शक आ रहा हो तो बता दूं कि मैं अपने क़ारोबार में ऐसी किसी तकसीम को पनाह नहीं देता...पैसे का कोई धर्म नहीं होता साब और वैसे समझो तो सभी धर्मों का धर्म ही पैसा है. छोटा आदमी हूं साब मगर एक बात जानता हूं कि ज्य़ादा पैसा गुनाह की बिना के बगैर नहीं जुड़ सकता और जुड़ भी जाए तो गुनाह की मोरी में ले जाए बगैर नहीं बख्श़ता...``
यह बात तूने खूब कही मेरे गफ्फार खान. पूछा जाए कुछ, मगर जवाब ऐसा तगड़ा-सा मार दो कि पूछने वाला ढें।
काम की बात पर आने के लिए बात बदलनी पड़ी.
''ऐसा है, एस आर पी पूरी मिल गई तो अगले महीने के पहले हते हिट करने का इरादा है. तुम किसी तरह पता लगाओ कि उन दिनों जावेद कहीं बाहर तो नहीं जाने वाला है`` मेरी अपेक्षानुसार उसने काम की गंभीरता पर कान दिए.
''समझो पता लग गया.``
''तो समझो प्रिंसिपल साहिबा आ गइंर् लपेट में...गो इस कार्रवाई का नाम 'ऑपरेशन प्रिंसिपल` कर देते हैं...``
मगर टोहगिरी की राह में कुछ हफ्तों की मेरी दिलतोड़ मेहनत और पठान की सूचनाएं धरी की धरी रह गईं. लायब्रेरी में की गई मुलाक़ात के तीसरे रोज़ शहर में लूटपाट, आगजनी, अपराध और हत्याओं का ऐसा एकतरफ़ा विस्फोट हुआ कि आंखों को यक़ीन न हो. दक्षिणपंथी हिंदुओं के नियोजित जत्थों ने राज्य संस्था की मदद और सांठ-गांठ से राज्य भर में नृशंसता का ऐसा तांडव रचा कि किताबों में पढ़े दूसरे विश्वऱ्युद्ध के वक्त़ के थर्रा देने वाले मनहूस फासी दिन भड़भड़ाकर ताज़ा हो गए. आदमी-औरत, बच्चे-बूढ़े, अमीर-गऱीब,सभी को हुल्लड़ दस्तों ने खरगोश-मेमनों की तरह लाचार हालत में हलाक़ करने में कोई भेदभाव नहीं बरता...किसी को बाहर से कमरा बंद करके फूंक दिया गया तो किसी को शिकारी कुत्तों की मानिंद दुरदुराकर जिबह कर दिया गया. परिवार के परिवार ही नहीं, बस्तियों की बस्तियां भट्टों की तरह कालिख उगलकर श्मशान बन रही थीं. तकनीकी और प्रबंधन की एक से एक नई जानकारी, अस्तित्व और पहचान के संकट से हिंदुत्व को उबारने में झोंक दी जा रही थी. ग्लोब्लाइजेशन के मजबूत दावों के तहत हो रही सूचना क्रांति,रातों-रात शहर को यातना शिविर बन जाने से नहीं रोक पाई. हैवानियत के इस वीभत्स जश्न में अधिसंख्य गैऱ-मुस्लिम आबादी दर्शक भर नहीं थी, बाक़ायदा या बेक़ायदा वह उसमें शरीक थी. अखब़ार वह उस बर्बरता की इन्तहां पर शर्मसार होने की गरज से नहीं, अपनी जीत का 'आंकड़ा` जानने की परपीड़न इच्छा से ज्य़ादा पढ़ती थी. खब़रों से भरे उस दुपहरिया अखब़ार में ही मैंने अजीब तरह से चुभती तकलीफ़ से पढ़ा कि जावेद को भी उसकी पैदाइश की सज़ा दे दी गई थी...तीन लड़कों समेत परिवार में आठ लोग मौत के घाट उतार दिए गए थे. उसके कारोबारी नुकसान की तो अटकल लगानी भी फिजूल थीं क्योंकि अभी जहां बेनामीदारों की फेहरिस्त बनाई जानी थी वहीं ज़रूरी नामदार ही गायब हो गए. फ़िलहाल तो उसके नौ ट्रक और चार निजी कारों के लावारिस कंकाल ही हिंदुओं की विजय-स्मृति बने पड़े थे. जंगली वहशत की तीन-चार रोज़ चली हुकूमत के बाद, यानी बहुसंख्यकों द्वारा मुसलमानों को 'सबक़` सिखा देने के तीन-चार रोज़ बाद मार-काट की सामूहिक दास्तानों में कमी तो हुई मगर इन्हीं तीन-चार दिनों ने सैकड़ों बरसों की सभ्यता खारिज कर दी थी. उसके कई महीनों तक राहत शिविरों के हज़ारों बेघर, बेज़ार और अभिशप्त, नारकीय ज़िंदगी बख्श़ दिए जाने (बख्श़ा किसने था, वे तो बस छूट गए थे) पर खुद को खुशक़िस्मत समझते रहे. तंगी और गंदगी में रहकर एकजुटता पनपती है इस फलसफे के तहत अल्पसंख्यकों द्वारा प्रति-आक्रमण कर दिए जाने के डर से हिंदू समाज के शेरों की नींद अलबत्ता फिर भी उड़ी हुई थी. यह कयास तो वाजिब भी था कि नेस्तनाबूद कर दिए जाने के डर और कौम से ली जा रही बेवजह कुरबानी ने मुसलमानों को ज़ाहिरन बिरादरेपन में बांध दिया था.
तीन-चार महीने से पठान की कोई खब़र नहीं थी. मेरे भीतर वक्त़-बेवक्त़ यह खय़ाल फिरककर चला जाता कि उन्मादियों ने कहीं उसे भी तो ठिकाने नहीं लगा दिया...आखिऱ हाईकोर्ट के जज, विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर और खुद पुलिस के अफ़सरान सत्ता-तंत्रा में अपनी उपस्थिति रखे जाने के बावजूद अपनी पैदाइश के खिल़ाफ़ कुछ भी न कर पाने को मजबूर हो गए थे. ऐसे सामाजिक झंझावात के दौर में अपना दतरी'फ़र्ज़` जैसा टुच्चा काम करने का सवाल ही नहीं था. जावेद अहमद सिद्दकी और उसके परिवार के साथ जो हुआ उससे मोटे तौर पर अफ़सोस हुआ था मगर ऐसे घाघ और कपटी व्यक्ति को अपना शिकार न बनाए जाने की अंदरुनी राहत भी थी.
मगर कोई छह महीने बाद, लाइब्रेरी के उसी हॉल में पठान की 'नमस्ते साब` ने एक शनिवार मुझे चौंका दिया. ''तुम यहां...अरे...कैसे हो...फ़ोन करके हालचाल तो बता देते...`` बेकाबू होकर मेरे मुंह से सवालों की झड़ी गिरने लगी. उसे ज़िंदा और साबुत हाल देखना पूरी तरह गले नहीं उतरा था.
''अल्ला के फजल से सलामत हूं साब, कोई नुकसान भी नहीं. मस्जिद पास ही है मेरे घर के...``
उसने मुझे बताया कि हर शनिवार इस लाइब्रेरी में आने की मेरी आदत के चलते वह कई शनिवारों से मुझे पकड़ना चाह रहा था मगर हो ही नहीं पाया. ''तो मोबाइल कर दिया होता`` मैंने आत्मीय नाराजगी जताई.''नहीं साब आजकल मोबाइल का भी कुछ ठिकाना नहीं...हमारी कौम तो वैसे भी शक के निशाने पर रहती है`` लाचारगी में उसकी आवाज़ निकली.
लाइब्रेरी के पिछवाड़े की गुमटी पर खड़े-खड़े ही चाय की सुड़की भरते वक्त़ मेरी आवाज़ बोझिल थी.
''बहुत बुरा हुआ पठान...नहीं होना चाहिए था.``
मैं जैसे कहीं न कहीं 'हत्यारी` कौम के अहसास से दबा था. ''अरे जाने दो साब...क्या अच्छा क्या बुरा...``
कहना होगा उसने काफ़ी नुनखुरेपन से मुझे क़तर दिया. उसकी कौम पर. ''ऑपरेशन प्रिंसिपल` तो खटाई में ही गया...बेचारे के साथ देखिए आतताइयों ने क्या नहीं कर डाला...``
''वो तो है मगर चारों तरफ़ से जो 'रिलीफ` आ रही है, उसे भी तो उसी के लोग हथिया रहे हैं...गऱीब तो इसमें भी मर रिया है...``
देश-विदेश की सरकारी, गैर-सरकारी संस्थाओं से आने वाली सहायता की खब़रें अखब़ारों में आती रहती थीं. किसी सरकारी योजना के तहत उसके आबंटन में जो भेदभाव या घपला होता है, उससे मैं वाकिफ़ था.
किसी भी तरह के प्रतिवाद का मौक़ा पठान ने नहीं दिया, ''और फिर साब जो प्रोपर्टीज़ बेनामीदारों के हाथ महफूज हैं, जो पैसा बैंकों के लॉकर्स और एफडीज़ में सेफ पड़ा है...जो इनकम बेहिसाबी खातों में दऱ्ज है उसके बरक्स इस्लामिक रिलीफ़ कमेटी या दूसरी किसी एजेंसी की मदद का क्या मोल है...'हमको` यह सब थोड़े ही देखने का होता है...कि दंगे-फसाद में क्या हुआ...यह तो बीमा कंपनी वाले देखेंगे...हमारे मुल्क में यह सब तो चलता ही रहता है. आपका अभी मूड नहीं हो तो कुछ दिन और रुक लेते हैं...``
पठान के 'धर्म` को मैंने मन ही मन सलाम किया और गिलास पटककर गहरी आश्वस्ति में उठ खड़ा हुआ.
ओमा शर्मा
सितम्बर 10, 2006
Top

Hindinest is a website for creative minds, who prefer to express their views to Hindi speaking masses of India.




दरवाजे को हौले-से भेड़कर वह अंदर आया और इशारा पाते ही कुर्सी पर बैठ गया. चालू फ़ाइल को एहतियातन वहीं बंद कर मैंने नीचे सरका दिया. इस दरम्यान एक मिनट की खामोशी रही. एक अबूझ-सी राहत समेटकर मैं कुर्सी के पिछवाड़े पर झूल गया और आश्वस्ति टटोलती निगाह से उसके हाव-भाव परखने लगा.
''तो तुम्हारे हिसाब से केस हिट करने लायक है ?''
''एकदम साब, सोचने जैसा कुछ है ही नहीं.''
आंखों में आंखें डालकर उसने यक़ीन से गर्दन हिलाई और कहते हुए हल्की-सी चपत टेबल के कांच पर जड़ दी.
इस काम में जिसे गट 'फीलिंग' कहते हैं, वह मुझे आ चुकी थी मगर एक परीक्षार्थी का-सा अंदरूनी डर फिर भी बना हुआ था. मैं उसी पर नकेल डालने की जुगत में था. ''अच्छा, कितने की जब्ती हो जाएगी?``
बेहिसाबी रोकड़ा और दूसरी चल संपत्तियों की जब्ती पूरे मिशन की कामयाबी की जान थी इसलिए मैं उसी पर चढ़कर मॉक-फेंसिंग आजमा रहा था. झूठ-फरेब करने में कोई कितना ही उस्ताद बन ले मगर हर पेशेवर मुखबिर इस सवाल का जवाब देने से कतराता है क्योंकि इससे उसकी रोज़ी-रोटी ही नहीं, साख-प्रतिष्ठा भी जुड़ी होती है. सीधे-सीधे. एवजी में कोई दलील काम नहीं करती है. इसलिए निमिष भर को वह झिझका. एक अलिखित काय़दे के मुताबिक़ रत्ती-भर से ज्य़ादा की झिझक मेहनत से बनाए आपके ढांचे को भुरभुरा कर सकती है -- शक की वजह से. इसलिए भटकती पुतलियों को दबोच कर उसने लम्बी सांस खींची.
''करोड़ से कम नहीं होगी.``

''तुम्हारा दिमाग ठीक है...करोड़ से ऊपर तो हमारे यहां सारे ही केस होते हैं, सवाल हैं, कितने करोड़?``मैंने उसे खारिज-सा करते हुए धमकाया.
''दो-तीन होई जाएगी, नसीब ने साथ दिया तो चार-पांच भी हो सकती है.`` उसने गोकि बिखरे पत्ते समेटे.
''हम नसीब पर कुछ नहीं छोड़ते पठान भाई...इतनी बड़ी दुनिया में इतने बड़े-बड़े मुर्गे खुले घूम रहे हैं...किसे पकड़ना है यह नसीब नहीं, नज़र और समझ की बिना पर तय होना चाहिए...``
''फिर भी साब, नसीब तो समझो होना ही हुआ.`` उसने मेरी बात बीच में पकड़ ली. उसकी बातों में'समझो` तकियाकलाम की तरह रहता है.
''ठीक है ठीक है, तुम नसीब की नहीं काम की बात पर आओ.``
''वो तो साब मैंने पैलेई बतला दी है.``
पहले उसने जो बतलाया था...वह अपनी नवीनता के कारण काफ़ी कौतूहल भरा लगा था. हर दूसरे-तीसरे छापे में बिल्डरों और ज्वैलर्स की धर-पकड़ करते हुए मैं खासा ऊब गया था. हमारा निदेशक बार-बार दुहाई देता कि गए दस बरसों में दुनिया के कारोबार का नक्श़ा बदल गया है मगर हम अपनी आरामपरस्ती में फंसे पड़े हैं. चार लोगों की हमारी टीम ने डेढ़-सौ से ज्य़ादा कारोबारों की छंटनी की थी मगर याद नहीं पड़ता कि ''फलों का थोक व्यापार`` उसमें था या नहीं.
उसने जब सुझाया तो पहली प्रतिक्रिया में खारिज करते हुए मैंने तल्खी ली थी कि विभाग के इतने बुरे दिन भी नहीं आए हैं कि धनिए-पुदीने वालों पर भी छापा मारें.
''धनिया-पुदीना और सेब-संतरों में फ़र्क है साब.``
''क्या फ़र्क है भाई?``
''पचास लाख की आबादी के इस शहर में हर रोज़ तो ढाई - तीन लाख का धनिया बिकता और तीस-पैंतीस लाख के फल...फिर फ्रूट्स खाने वाला तबका कौन-सा है ये आप बखूबी जानते हैं.``
मैं अचानक रुका. उसकी दलील में आंकड़े नहीं, मानवीय व्यवहार की गहरी समझ थी. एक चौखटे में फंसे सोच के तहत मैं मन ही मन मोटा-मोटा हिसाब लगाने लगा कि हर रोज़ के तीस लाख के बाज़ार में आठ लाख का हिस्सा रखनेवाले एक थोक व्यापारी की साल भर में कितनी कमाई होती होगी...पच्चीस करोड़ की सालाना बिक्री के हिसाब से छह साल की हो गई सौ करोड़ से ऊपर. जिस ट्रेड को आज तक हाथ नहीं लगाया उसका तो सारा कारोबार ही बेहिसाबी होगा. उसने आगे बताया कि आम को लोग भले उसके स्वाद के कारण फलों का बादशाह कहते हों मगर व्यापारियों को यह मुनाफे की वजह से बादशाह लगता है. हर सीज़न की शुरुआत केरल के सिंदूरी आमों से होती है, फिर रत्नागिरी और जूनागढ़ के अल्फांसो और हापुस आते हैं, आखिऱ में सोने पर सुगंध उत्तर-भारत के दशहरी और लंगड़ा की होती है. सारा ट्रेड कमीशन के आधार पर चलता है जिसकी तयशुदा दर छह प्रतिशत है...मगर यह तो सिक्के का दिखावटी पहलू है : बड़े-बड़े थोक व्यापारी किसानों के आम नहीं, बाग के बाग खऱीद लेते हैं...कभी-कभी तो अगले ५-७ सालों के लिए. अपने उत्पाद की क़ीमत तय किए जाने में किसान के साथ जो छल किया जाता है उसकी नजीर भी उसने मुझे दिखा दी थी. यह देखकर मैं हक्का-बक्का रह गया कि एक तौलिए के भीतर हाथ की उंगलियां घुमाकर व्यापारियों की कार्टल, 'प्रतियोगिता` के सिद्धांत की कैसे धज्जियां उड़ाती चली जाती है.
मैं वापस उसकी तरफ़ लौटा.
''कितने पार्टनर हैं?``
''तीन हैं, तीनों भाई.``
''ठिकाने कितने रहेंगे?``
''समझो तीन हो गए बंगले, एक बाप का, एक मार्किट-ऑफिस एक गोदाम.``
''यानी छह.``
''सात समझो, साला भी है एक, बड़े वाले का. मामू कहते हैं.``
''बाप एक्टिव है?``
''एक्टिव तो नहीं है मगर इन तीनों को पैदा करने का कसूरवार तो है ही...``
काम की बात के बीच थोड़ी चुटकी मुझे सुहाती है. वह जानता है.
''कसूरवार है तो इस बुढ़ापे में बंगलों को छोड़कर उस फ्ल़ैट में क्या कर रहा है?``
''इन सिंधियों का घर या शक्ल देखकर आप इनकी हैसियत के बारे में अंदाज़ा नहीं लगा सकते हैं...ये जो दिखते हैं उसके अलावा कुछ भी हो सकते हैं.`` अपनी बात मनवाने के लिए पठान अक्सर ऐसे शगूफे छोड़ने लगता. लगभग यही बात उसने एक मारवाड़ी के संदर्भ में कही थी. आप बहस कीजिए और मुद्दे से हाथ धो बैठिए.
अपने निदेशक को विश्वास में लेकर चौथे दिन मैंने उस निशाने को 'साध` लिया था. बस दो एहतियात अपनी तरफ़ से और बरते, एक तो इस खिलाड़ी नं १ के साथ इस बाज़ार के खिलाड़ी नं २ को भी उसी दिन शिकार बनाया और दूसरे, दोनों के बही खाते लिखने वाले मुनीमों को भी वही इज्ज़त बख्शी जो उनके आकाओ को. दोनों घरानों से कोई पौने चार करोड़ की जब्ती हुई थी जो अपेक्षा से कहीं कम थी मगर दूसरे घराने के एक भागीदार के यहां से मिली कुल जमा इक्यावन लाख की नकदी ने किसी तात्कालिक मलाल से बरी कर दिया था. निर्वासित पिता और मामू को 'कवर` करने की हिदायत बड़े काम आई : पिता के यहां से एक ऐसी 'चोपड़ी` मिल गई जिसमें हिसाबी कमीशन को क्रमश: घटाने को एक कला का दर्जा दे रखा था, मामू के यहां से तो तीन बेनामी खाते ही मिल गए जिनसे निकाली राशि उसी बैंक में 'फिक्स` कर रखी थी. हमारी मामूली बदसलूकी से मामू टूट गया और बिना कोताही किए 'कॉआपरेट` करने लगा.
खिलाड़ी नं २ की जानकारी मैंने अपने कंप्यूटर से ही जुटाई थी मगर काग़ज़ पर पठान को मुखबिर के तौर पर डाल दिया ताकि उसका अतिरिक्त 'उत्साहवर्धन` हो सके. महीने भर बाद उसे पचास-पचास हज़ार का अंतरिम इनाम भी दिलवा दिया. रकम पकड़ाने के बाद मैंने उसे आड़े हाथ ले धरा ''जीवतराम (खिलाड़ी नं २) ने मेरी लाज बचा ली वरना पठान तुम तो मुझे ले डूबे थे.`
''क्यों साब क्या हुआ?``
''पूछते हो क्या हुआ? नकदी की कितनी बढ़-चढ़कर उम्मीद बंधा रहे थे...तुम्हारे खिलाड़ी नं १ के यहां से सवा पांच लाख मिले हैं बस.`` मैं गुस्से में था, लताड़ रोक नहीं पाया.
''आपका गुस्सा वाजिब है साब मगर मैं कुछ कहूं तो मानेंगे?`` उसकी आंखों में मोहलत की गुहार थी.
''चलो अब यह भी सही, बताओ,`` मैंने सख्त़ बेरुखी में टाला.
''रेवतीराम के यहां आपने किसी मैथ्यूज को इन्चार्ज रखा था?``
''हां, हां, पार्टी नंबर तीन में.``
''वहां गड़बड़ हो गई.``
''मतलब?``
''स्टेट बैंक का एक लॉकर ऑपरेट ही नहीं हुआ...मतलब ऑपरेट तो किया मगर बिना खोले ही छोड़ दिया...`` अपने बचाव से उसने मुझे छलनी कर दिया. मैथ्यूज के प्रति कोई भाव उजागर किए बगैर मेरे भीतर खून उबलने लगा...अक्सर मेरे कमरे में सुबह की चाय पीता है, फिर भी...डायन का पुल्लिंग क्या होगा...हरामी.
''अच्छा!`` निष्कवच होकर मेरी आंखें फटी थीं.
''जाने दो साब, थोड़ी-बहुत ऊंच-नीच तो होती रहती है.``
रवायत के मुताबिक़ अगले तीन-चार महीने उसे मेरे दफ्त़र की शक्ल नहीं देखनी थी. इस दरम्यान सारे काग़जात के गट्ठर से मुझे कर-चोरी की एक ऐसी मूल्यांकित रिपोर्ट लिखनी थी जो मिशन की कामयाबी को सौ-गुना बढ़ाकर सिद्ध करते हुए भी सल्वाडोर डाली की चित्राकारी याद दिला दे. रिपोर्ट पूरी होने के ठीक दो रोज़ पहले उसका फ़ोन आ गया. अपनी नस्ल के नाम को रोशन करती गर्मजोशी से वह बताने लगा कि साब ''ऐसी चीज़ हाथ लगी है कि दिल खुश हो जाएगा.``
''यार तीन महीने से क़ायदे से एक रात नहीं सोया हूं और तुम दूसरी क़ब्र में ठेल रहे हो`` मेरी आवाज़ मुरझाई थी.
''आप देखोगे तो कमल से खिल जाओगे`` उसके जोश की जुम्बिश जारी थी.
''इस कमल को इस बार तुम चन्द्रा साहब के सरोवर में खिलाओ पठान.``
मैं हर क़ीमत उसके फुसलाने में नहीं आना चाहता था. यूं, हर बार एक नया मुर्गा पकड़ने की आदिम इच्छा खून के बहाव में शामिल रहती थी, मगर पौने तीन साल से वही पंचनामा बनवाते, कैवटीज़ ढूंढते, झूठ के मनोगत औज़ारों से धन्नासेठों को धराशायी करते काफ़ी ऊब भी होने लगी थी. सोने-जागने की असामान्यता और खाने-पीने की अनियमितता ने अजीब तरह से तोंदियल और नतीजतन 'हवाबाज़` बना छोड़ा था. मोर्चे पर आक्रमण करने के इस मजबूर दस्ते में हम आठ लोग थे इसलिए हर हफ्ते ही किसी न किसी की'बारात` निकलती थी. यह भी खूब होता कि एक बारात से लौटे नहीं और उधर दूसरी में भागना पड़ रहा है. मगर उस दुनिया में हम प्रसन्न-सुखी थे तो इसलिए कि एक क़िस्म के परपीड़ा-सुख को सलीके से बगल में दबोचने के बावजूद, बेडौल ही सही मगर न्याय के एक नामुराद से बच्चे को हम अपने तइं हर रोज़ डिलीवर होते देखते थे. पठान थोड़ी देर झिझका था क्योंकि अक्सर तो मैं स्वयं उसे 'कुछ नया` लाने को प्रोम्प्ट करता था और फिर भी मेहनत से सुझाए उसके पांच-सात प्रपोजल्स में एकाध को ही तवज्जो देता.
''नहीं साब, देना तो आपको ही है, चाहे महीना और लग जाए...`` उसका इतना विश्वास ही काफ़ी था मगर उसके अगले पांच लफ्ज़ों ने पिघला ही दिया... ''आपके हाथों में बरक्कत है...``
किसी विदग्ध लती की तरह एक पखवाड़े के भीतर ही मैं उसके साथ मामले की निटी-ग्रिटीज में उतरता जा रहा था.
यह एक हडिड्यों के डॉक्टरों का गेंग था जो ट्रौमा अस्पताल चलाता था. पांच समवयस्क डॉक्टरों की भागेदारी जिसकी रहनुमाई डॉक्टर आकाश जोशी के सुपुर्द थी. 'ऑपरेशन` की कागजाती तसल्ली के लिए ज़रूरी बातें वहां पहले से ही मौजूद थीं : क्रीम कलर की छह मंजिला भव्य इमारत के अंदर-बाहर के फ़ोटोग्रास सभी भागीदार डॉक्टरों का सांझा नोट-पैड, सभी डॉक्टरों के घर के पते और मोबायल नंबर, उनके द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली चमाचम गाड़ियां...
''मगर धन-चोरी का तरीक़ा क्या है?`` मैंने मुद्दा कसा.
''तरीका तो जी बड़ा सीधा है. ट्रौमा के केसिज को हाथ लगाने में दूसरे अस्थि-विशेषज्ञ डरते हैं. इसके यहां एक डॉक्टर हैं, मित्रा. उसका भाई पुलिस में है. उसके कारण मित्रा पुलिस को संभाल लेता है और जमकर वसूलता है. यह काम समझो कोई १०-१२ साल से हो रहा है. ज्य़ादातर बेहिसाबी. मगर पिछले चार-पांच साल से डॉक्टर जोशी ने घुटने बदलने (नी-रिपलेसमेंट) की शल्य चिकित्सा में खूब नाम और नामा कमाया है...रोज़ के दो घुटने ऑपरेट करता है, एक सुबह, एक शाम. हरेक का डेढ़ लाख लेता है ''यानी साल के तीन सौ दिन भी गिनो तो नौ करोड़ की बिक्री (डॉक्टरों के संदर्भ में बिक्री शब्द कहते मैं इसके अटपटे प्रयोग पर हँसा)...इम्प्लांट समेत कितने ही खर्चे डालो, तीन करोड़ से ऊपर का मुनाफ़ा तो बैठेगा ही`` मेरे कारोबारी जेह़न ने अपनी चिड़िया की आंख साधी.
''बेशक, तीन नहीं तो, टके से उसने सरकाया. वैसे खूब लंबी चौड़ी हांक ले मगर चलो, कुछ तो 'फिगर्स फोबिया` इसे है.
''पठान, इस शहर में क्या इतने बेवकूफ़ लोग हैं जो अपनी गाढ़ी कमाई को आधे दिन के इलाज में उड़ा देंगे? साले हर चीज़ में तो डिस्काउंट और वटाव मांगते हैं...आइ डोंट थिंक बॉस विल डाइजैस्ट और एग्री टू इट`` मुंह बिचकाकर मैंने उसे आदतन खारिज करना चाहा. मगर उसकी जवाबी कार्रवाई ने मेरे शक का पलीता कर दिया.
इन्फोसिस में कार्यरत अपने काल्पनिक चाचा के घुटने के आरोपण के सिलसिले में वह आकाश जोशी की घसीट लिखावट में संभावित खर्चे का हस्ताक्षरित पर्चा मुझे दिखा रहा था. एक मार्मिक आशुकथा के सहारे,इलाज करवाकर बाहर निकल रहे क़स्बाई मरीज के बिल की फ़ोटोकॉपी उसने अलग से करवा ली थी. मेरे सामने सब कुछ दिन के उजाले-सा उज्ज्वल था या, इतनी रोशनी तो दे ही रहा था कि डॉक्टर जोशी के खड़े किए अंधेरे चुहचुहा जाएं. अब कोई गुंजाइश नहीं थी.
और वाकई, हमारी कार्रवाई के बाद कोई गुंजाइश रही थी नहीं. नकदी ज़रूर हमारी अपेक्षा से कम मिली मगर उसकी एवज़ में बेहिसाबी चल-अचल संपत्ति के ऐसे दस्तावेज़ मिल गए कि मिशन के चयन और सफलता की खूब वाहवाही हो गई.
मिशन की एक मज़ेदार बात डॉक्टर आकाश जोशी के बचपन की सरेआम वापसी थी : वार्ड वॉइज और नर्सों के सामने अपनी मालिकी का मुल्लमा उतार वह बार-बार मेरे घुटने पकड़कर फूट-फूटकर रोने लगता और''मैंने तो कभी किसी का कुछ नहीं बिगाड़ा, मैंने तो कभी चींटी भी नहीं मारी...`` की सुबकियां भरता जाता. बहुत जल्द वह गुत्थी मेरे हाथ लग गई जो उसके पांव तले की ज़मीन को इस क़दर पोला किए दे रही थी : उसके चेम्बर से एक कम-उम्र और यक़ीनन खूबसूरत हसीना के साथ उसकी रंगीनी पर मुहर लगाती खतो-किताबत और चंद तस्वीरें. यानी तस्वीरें-बुतां और खातूनों के खत़ मरने से पहले ही! कौन बचाएगा तुझे मेरे मियां मजनू जोशी!
मुखबिर के लिहाज़ से पठान मेरा मुंह लगा था मगर हमारे आपसी ताल्लुक़ात पेशेवर ही थे. दुनिया-जहां के राज़ बटोरकर जब वह मुझसे मिलना चाहता तो मैं उसे किसी नए रेस्तरां, पार्क या स्टेशन पर आने को कहता, न कि दफ्त़र या घर. फ़ोन पर उसे अपना या मेरा नाम लेने की मनाही थी, मेरे साथ किए उसके केसेज़ के हिसाब से मैं उसे एक संख्या पकड़ा देता था जो उसकी तात्कालिक पहचान का काम करती. किसी मुखब़िर को हमारा फ़ोन करना तो उसूलन ही नहीं बनता था क्योंकि निजी तौर पर हमने अविश्वास की यह घुट्टी पी रखी थी कि ''वंस एन इन्फोरमेंट, आल्वेज़ एन इन्फोरमेंट.`` आर्थिक विषमताएं पाटने के रास्ते संसाधन जुटाने की राज्य की घोषित नीति के हम हरावल पुर्जे थे तो पठान की बिरादरी मानव के सामाजिक व्यवहार से उत्पन्न एक कुटिल पूंजीवादी लुब्रीकेंट. उसका इनाम तो ज़ाहिर था मगर हमारा हासिल वह भटकती ईगो थी जो अपने संभावित शिकारों के बीच रात को शराब की पार्टियों में बाइज्ज़त न्यौते जाने अथवा स्थानीय क्लब की तैराक़ी प्रतियोगिता में 'अतिथि विशेष` बना दिए जाने पर पर्याप्त तृप्त महसूस करती थी.
बहरहाल, डॉक्टर जोशी के सफल 'ऑपरेशन` के बाद मैंने उसे घर बुलाया और ब्लैक लेबल खोल दी. उसने तौबा में कान पकड़ते हुए माफ़ी चाही ''साब आपने इस क़ाबिल समझा शुक्रिया. मैं नहीं पीता...इस्लाम में शराब पीना कुफ्र है.`` अकेले पीने की मेरी आदत नहीं रही. बोतल एक तरफ़ सरका ही रहा था कि उसने मेरे घुटने पकड़ लिए और नौसिखिया अंदाज़ में मिन्नत करने लगा, ''साब यह दूसरा कुफ्र तो मत करवाइए...आप बाक़ायदा लें...इस्लाम में किसी को शराब पीते हुए देखना क़ाबिले-गुनाह नहीं है`` मज़हब पर कसी इस फुरफुरी चुटकी के साथ भरे आदमखोर ठहाके का मैंने भी साथ दिया.
''आज आपकी सिगरेट अलबत्ता ज़रूर पीऊंगा.`` नवाजी इज्ज़त ने स्नेहिल अधिकार ले लिया था. सिगरेट का कश वह कन्नी उंगली के बीच दबाकर खींचता और थोड़ी-थोड़ी देर बाद चुटकी बजाकर राख झाड़ता.
शराब के घूंटों के साथ तबादलों और प्रोन्नतियों को लेकर रोज़ किए जाने वाले आलाप और विमर्श आज नदारद थे. न क्रिकेट का मौसम था और न ही उस पर बात हो सकती थी. कुछ देर हम अपने साझा शिकारों और उनकी खासियतों पर बात करते रहे. गए तीन बरस में मेरे हाथों घायल ग्यारह शिकारों में छह पठान की मेहरबानी थे (तीन मैंने खुद-ब-खुद यानी 'सुओ मोटो` तैयार किए थे और दो में दो अलग-अलग मुखब़िर थे). यानी पठान और मेरी खासी जुगलबंदी थी. मगर त्राासदी देखिए कि उसकी किसी जाती चीज़ की मुझे शायद ही कोई जानकारी थी. आज उसके भीतर कुछ पिघल रहा था.
''इस धंधे में कभी नहीं आता अगर शर्राफ ने उस रोज़ मुझे साढ़े चार सौ एडवांस दे दिए होते. मैं उसके यहां डेढ़ हज़ार रुपए महीने की नौकरी पर था. मुख्य काम था सहकारी बैंक में चैक जमा कराना, रोकड़ा निकालना और तयशुदा पार्टियों से वसूली करने जाना. पगार मिलने में अभी आठ दिन थे. बरसात के दिन थे. बहन छत से फिसल गिरी थी और कूल्हे खिसकने का इलाज कराने दवाखाने में दाखिल थी. पड़ोस के गल्ले से फ़ोन करवाकर अब्बा ने साढ़े चार सौ का इंतज़ाम करने को बोला था. अब आप ये समझो कि बाइस दिन की तो मेरी पगार चढ़ी हुई थी और आधा घंटा पहले ही मैं खुद पर डाल दी मगर मुझसे वह भी न बने. बेवजह ब्याज चढ़ गई. दस जगह ठोकर खाकर इंतज़ाम तो हुआ मगर एक कड़वाहट भीतर जम गई...कि तंगी में कोई सगा नहीं होता...कि पैसे का दरियादिली से समझो कोई वास्ता नहीं. मैंने वह धंधा भी छोड़ दिया और एक तेल मिल में काम करने लगा. छह महीने बाद वह मिल बंद हो गई. बीच में पता नहीं कितनी जगह धक्के खाने के बाद एक शेयर दलाल के यहां टंग लिया. थोड़े दिनों बाद ही आपके विभाग ने उसके यहां छापा मारा था, वह भी दोपहर को. पंद्रह साल तो हो ही गए. सेठ ने मुझे बतौर साक्षी रखवा दिया जिससे मुझे आपके विभाग की ताक़त और तौर-तरीक़ों का पता चला. सारी कार्यवाही में पता नहीं उन्होंने मुझमें क्या देखा कि बड़े नामालूम तरीके से अपने दफ्तर आकर मिलने की दावत दे दी.
बस, वह दिन है और आज का दिन. इतने दिनों सेठ लोगों से खाई जिल्लत, इतने दिनों हर मुमकिन बेगार में खुद को जोतने का नतीजा, समझो मेरा सरमाया बन गया. हिसाबी-बेहिसाबी का फ़र्क तो मुझे ज्य़ादा नहीं पता था मगर यह खूब जानता था कि हर कामयाब धंधे की बुनियाद चोरी पर टिकी होती है. वैसे तो हर आदमी अपनी तरह और हालात के मुताबिक़ चोरी करने को आमादा रहता है मगर इतने दिनों की बेपनाह ठोकरों ने इतना इल्म दे दिया है कि खब़र हो जाती है कि मुक्तलिफ़ कारोबारों की कमज़ोर नसें कहां होती हैं और उन्हें कैसे कुरेदा जा सकता है...देखा जाए तो सरकार ने भी तो आपको इसी काम के लिए रख छोड़ा है...``
''बेशक, बेशक.`` गोकि किसी स्वप्न से जागकर मैं बड़बड़ाया.
उसके ''रख छोड़ा है`` के वाहियात प्रयोग के बावजूद तभी मुझे अहसास हुआ कि अपने पसंदीदा पेय को मैं कितनी शर्मनाक रफ्तार से पी रहा था. एक लंबा घूंट खींचकर मैंने दूसरा पैग बनाया और उसके लिए सूप मंगवाया जिसे, जल्दी खत़्म करने के फेर में वह बारी-बारी से प्लेट में डालकर सुड़कने लगा था.
बात का सिरा जोड़ने के इंतज़ार में मैंने एक और लंबा घूंट खींचा और सहारे का कंधा बदलकर पांव फैला दिए. ''यार पठान तुम्हारी तत्काल झूठ गढ़ने की काबिलियत का मैं बहुत मुरीद हूं...सही कहूं तो इस मामले में तुमसे बहुत सीखा है मैंने...कैसे कर लेते हो...?``
गहराते सुरूर में ऊपरी तौर पर नागवार लगने वाले इस आरोप में छापों से पहले की जाने वाली ज़रूरी टोही हरक़तों (रिकॉनिसंस जिसे 'रैकी` कहने का चलन था) का तजुर्बा था. वह अर्राता हुआ गोकि शे`र की मांद में हाथ डाल देता था. मैं यथासंभव अनचीन्हा-सा उसके दायरे में डोलता रहता इत्तफाकन भी किसी परिचित से टकराए जाने की संभावना से खुद को बचाते हुए.
''सर, ज़रा एक मिनट हल्का हो आऊं.`` उंगली के इशारे से पठान ने अपनी थुलथुल काया को अचकचाकर सीधा किया.
''सामने राइट को है`` मैंने इशारे से समझाया.

वह एक बिल्डर का केस था. श्री पैराडाइज़ बिल्डर्स का. संभावित ग्राहक बनकर वह किसी फ्ल़ैट का इस बारीकी से मुआयना करता मानो कल से आकर रहने लगेगा.
''किचिन में काम करवाना पड़ेगा...करवा देंगे ना...भैया ऐसा है मेरे सेठ के साथ उसकी बूढ़ी मां रहती है जिसे एलर्जिक अस्थमा है इसलिए कैमिस्ट शॉप नजदीक चाहिए...इसके सामने वाला रिहाइशी है या इन्वैस्टर का है, सुनसान में तो नहीं रहना पड़ेगा...`` वह सख्त़मिजाजी से बकता जाता. बिल्डर से क़ीमत तय होने के बाद वह दस्तावेज़ी और 'ऑन` में दी जाने वाली राशि का हिसाब बिल्डर से ही लिखवाता.
''ऑन का प्रतिशत पचास से साठ या सत्तर हो सकता है मालिक`` कहकर वह जेब में पड़े माइक्रोटेप को चालू कर देता. किसी जीनियस शिल्पी की तरह अपने मकसद में वह यूं एकाग्र हो जाता कि मेरी मौजूदगी को भी भुला देता.
''साठ तक आराम से हो जाएगा.``
''फिर ठीक है...वो क्या है सेठ के अपने एक्सपोर्ट के चक्कर में मालिक साब तो लंदन-फ्रांस घूमते रहते हैं,उनका सारा हिसाब मुझे संभालना पड़ता है मगर माफ़ करना, पैसे के मामले में एक रुपए की हेर-फेर जायका बिगाड़ देती है...मुझे आप यहां इस सत्राह लाख का ब्रेक-अप करके दे दो`` कहकर वहीं पड़ा काग़ज़ उसने उसकी कलम के नीचे सरका दिया. बिल्डर ने ७ डी और १० सी को ऊपर नीचे लिखकर लाइन खींची और उसके नीचे १७ लिख दिया. आंख में बाल दबाए पठान के लिए यह नाकाफ़ी था. वह उठा और उसके सामने अध-झुका होकर मासूमियत से दरयात़ करने लगा:
''७ डी माने?``
''अरे यह भी नहीं पता, सात डी यानी दस्तावेज़ सात लाख का.``
''और १० सी?``
''दस लाख कैश रहेगा.``
''यह हिसाब ५-१२ का नहीं हो सकता मालिक.``
''भाई, हमारे यहां सात के आसपास के दस्तावेज़ हो रहे हैं, आपको दिक्क़त है तो पांच का करवा देंगे.``
''मेहरबानी मालिक, मैं हफ्त़े-दस रोज़ में आपसे कॉन्टैक्ट कर लूंगा.`` कहकर पठान उठ लिया. मगर भूल-सुधार सी करता बिल्डर बोला.
''आपका नाम?``
''राजन.``
''मोबाइल है?``
''छोटा आदमी हूं, साब, क्यों मज़ाक़ करते हैं.`` पठान की यह परिचित पगडंडी थी. वह जानता था कि शक को ज़हर बनते देर नहीं लगती है. 'शिकार` अब क्या वार कर सकता है?...वह मालिक का नाम-पता या टेलीफ़ोन पूछ सकता था. नाम-पते की पुष्टि करने की फुर्सत चाहे न हो मगर टेलीफ़ोन तो कोई भी खडूस़ घुमा सकता था. इसका तोड़ उसके पास था : वह अपने घर के फ़ोन का ऐसी आपात स्थिति के लिए उपयोग करता. मगर पहली कोशिश ऐसी नौबत न आने देने की होती. इसलिए वह तुरंत प्रति-आक्रमण कर बैठता.
''मालिक आप तो ऐसे सुनवाई कर रहे हैं जैसे हम तिहाड़ से छूटे हों.``
बात निपटाकर वह नजदीक के पान के गल्ले पर सिगरेट सुलगाता और कुटिलता से हँसकर कहता. ''कोई गुंजाइश साब.``
काग़ज़ की लिखावट को उदघाटित करती बिल्डर की आवाज़ का साक्ष्य 'पैराडाइज़` की खुशहाली की मुकम्मल पोल खोल रहा था.
''नहीं, कुछ नहीं.`` अपनी तसल्ली और खुशी पर काबू रखते हुए मैं हामी भरता.
मगर किशनचंद लक्ष्मणदास ज्वैलरी डिजाइनर के मामले में झूठ के तरीक़े ने हमें दूसरी ज़िंदगी दी थी. एक निष्कासित कारिंदे की मार्फत उसके दो नंबरी तौर-तरीक़ों की ब्यौरेवार तफ़सील पठान ने पहले ही मुहैया करा दी थी. शिकायतों के पुलिंदे को 'ऑपरेशन` में तब्दील करने के लिहाज से हम पहली मंज़िल पर उसके दफ्त़र की घुमावदार सीढ़ियां चढ़ने वाले ही थे कि पास आ रहे आदमी से हमने किशनचंद लक्ष्मणदास की ताक़ीद कर दी जो बदक़िस्मती से वह खुद था.
''जी आप?`` मेरी ज़मीन खिसक गई.
वह साथ-साथ चढ़ता रहा. दरबान ने उसे देखते ही दरवाज़ा खोल डाला और हमें भीतर धकेल-सा दिया.
''जी मैं किशन...मगर आप?``
''हम एअरटैल से हैं.`` पठान ने बचाव में कूद लगाई.
''मगर मैं तो एअरटैल का कस्टमर नहीं हूं.`` संशय के उसी तेजाबी तेवर ने हमें बर्खास्त किया.
''नहीं हैं तभी तो आपके पास आए हैं`` पठान ने नर्मी ओढ़ी.
''आपको मेरा नाम-पता कहां से मिला?``
कमबख्त़ सूत भर गुंजाइश नहीं दे रहा था.
''हम कस्टमर केअर से हैं...अच्छे या संभावित ग्राहकों की खब़र रखते हैं.``
मरहम लगाते हुए पठान मिन्नत की मुद्रा में आ गया.
अपने-अपने मॉनीटर्स पर पैवस्त सभी लोगों की निगाहें अब तक हम पर एकाग्र हो चुकी थी.
''आपका आई कार्ड या कार्ड होगा?``
मेरी सांस रुक गई. क्या करेगा अब पठान? किस घड़ी चले थे घर से. यह केस तो हो गया चौपट. साले कैसे-कैसे दुष्ट लोग हैं दुनिया में...
''आई कार्ड और कार्ड तो हम अपने सेल्सवालों को इशू करते हैं.``
क्या दूर की कौड़ी लाया है पट्ठा! मगर हे भगवान, यह काम कर जाए.
''तो जो काम आप करने आए हैं यह सेल्सवालों का नहीं है?``
अबे हरामी निमोलियों का नाश्ता करके आ रहा है क्या?
''आपने बजा फरमाया...यह काम मेनली तो उन्हीं का है मगर कस्टमर केअर वालों को तो ओवरऑल देखना ही पड़ता है...आप जानते होंगे कि सैल कंपनियों में कितना कंपटीशन हो गया है`` पठान ने चिरौरी की. वह बात को वृहत फलक पर ले जाकर टूटे तारे की तरह गुम कर देना चाह रहा था.
तभी, 'होम कालिंग` को लैश करता मेरा मोबाइल जिंगलबैल की धुन टेरने लगा. मैंने तपाक़ से हरा बटन दबा दिया : ''हां सर, हम मार्किट में ही है...सात-आठ कस्टमर विज़िट किए हैं. रेस्पॉन्स तो अच्छा ही है...आना पड़ेगा, ठीक है सर, बाक़ी आफ्टरनून में कर लेंगे...ओ के सर, आते हैं...`` मेरे एकालाप पर पत्नी सन्न होकर ''क्या बकवास किए जा रहे हो`` की लाचारी कुनमुनाती रही मगर उसे ज्य़ादा मौक़ा दिए बगैर मैं उस औज़ार का दम घोंट चुका था ताकि वह फिर से सान्ता क्लौज़ को न पुकारने लग जाए. टोहगिरी करते वक्त़ हमारे मोबाइल अमूमन गूंगी हालत में ही रहते थे. आज गल़ती हो गई थी, मगर गल़ती भी तिनके का सहारा बनकर आ गई थी. यही तो इस पेशे की विचित्र गति है.
जान छुड़ाकर हम बाहर आए तो कन्नी उंगली में फंसाकर सिगरेट का कश खींचते हुए पठान ने चेताया, ''साब इस केस में देर करना ठीक नहीं...इसकी जान-पहचान में ज़रूर किसी के कोई छापा पड़ चुका है वरना कोई आर्टिस्टिक दिमाग इतना एलर्ट नहीं हो सकता.`` उसी केस में, निदेशक गंगाधर जांगिड़ के सामने दर्ज झूठ ने सारी समस्या ही सुलझा दी.
''फार्म हाउस का पता कर लिया है?``
फ़ाइल में मेरी लिखी टिप्पणी और लैग किए दस्तावेज़ों को ध्यान से पढ़ने के बाद जांगिड़ साब ने पूरे गुरु-गांभीर्य के साथ, नजदीक के चश्मे से निगाह उठाकर मुझे तौलते हुए दरफ्यात की.
''यस सर, वहां एक सर्वे टीम रखी है.``
''डज़ ही हैव ए कीप?``
जांगिड़ की यह स्थायी गांठ थी कि अनाप-शनाप पैसे वालों की जेब में रखैल का न होना इन्सानी फितरत के बेमेल पड़ता है...यू सी, द अदर वोमन इज द नेच्यूरल सैक्टयूअरिटी ऑफ बिग बिजनैस...हमें नहीं खब़र तो यह उसकी होशियारी कम, हमारी टोही...कोशिशों की नाकामी ज्य़ादा है...`` उन पर जैसे भगवान ओशो सवार हो जाते. न बताए जाने पर वह केस को मुल्तवी करते हुए कहते ''फाइंड आउट, देअर इज नो हरी``और हम 'यस सर` की पूंछ हिलाकर कसमसाकर निकल पड़ते : सच्ची-झूठी की रखैल पैदा करने.
मैं कोई आधी-अधूरी रखैल खड़ी करने ही वाला था कि पठान ने पुख्त़ा यक़ीन की सहजता से जड़ा (मुझे ताज्जुब रहा कि अंग्रेज़ी में खासा पैदल दिखने के बाद उसने जांगिड़ की बात कैसे लपक ली!)
''दो हैं न साब.``
''दो!`` अपने यक़ीन की इस क़दर पुख्त़गी में जांगिड़ बेयक़ीनी से उछल पड़े (नौकरशाहों के ऐसे यक़ीनों पर हाय में सदके जावां!)
''हां साब, एक बाप की है, एक बेटे की`` पठान ने ऐसे कहा मानो वे दोनों बाहर खड़ी उसका इंतज़ार कर रही थीं.
'अइ शाबाश!``
इन्सानी फितरत के इस दो टूक और समतामूलक खुलासे ने जांगिड़ की बांछें खिला दीं.अब केस अकस्मात् ही इतना मजबूत हो गया था कि दूसरे सबूत बेमानी हो गए थे.बाद में जब मैंने पठान से पूछा तो तौबा में बारी-बारी से दोनों कान छूकर बोला, ''वो तो साब मैंने ऐसे ही बोल दिया था.``
''ऐसे ही मतलब?`` धीमी होते हुए भी मेरी आवाज़ कड़क थी.
''ऐसे ही समझो खाली-पीली`` वह दांत निपोरकर हिनहिनाया.
''तू मरवाएगा.``
पहली बार उसके लिए मेरे मुंह से 'तू` संबोधन फिसल गया. मैं कभी उन बेअदब बिरादरानों में नहीं रहा जो उम्र में अपने हर छोटे और दो-चार बरस बड़े को फट से 'तू` दाग देते हैं, इस गुमान से कि 'विक्टिम` के प्रति वे कितने स्नेह और नज़दीकी का जज्ब़ा रखते हैं.
''तौबा मेरी...आप यह देखिए साब कि केस के बारे में आप खूब जानते-समझते थे और बड़े साब को रखैल चाहिए थी...तो इसमें गल़त या झूठ क्या है.`` वह नब्बे डिग्री कोण पर सामने अपना पंजा छितराकर मुझे कनविंस कर रहा था. अपनी आवाज़ की पिच को फिर अचानक धीमे करके बेशर्मी से बोला, ''एक बात बताइए साब...शादी के बाद किसी ने दुल्हन की छातियों की शिकायत की है क्या?``
''व्हाट बुलशिट`` मैंने नरमी से हँसकर उसे चलता किया.
एक अबूझ तसल्ली से वापस लौटकर सामने पकौड़ों और दो-तीन तरह के नमकीनों की ताज़ा खेप देखकर पठान ने पिघलकर ताना दिया, ''क्या साब, घर भी जाने देंगे कि नहीं`` सभी प्लेटों से कुछ न कुछ उदरस्थ करने में अलबत्ता उसने ज्य़ादा तकल्लुफ नहीं की.
मुझे ही लगने लगा मानो पकौड़ों के मोल मैंने उससे जवाब मांगा है. पहले तो उसने आसमान की तरफ़ इशारा करके ''सब ऊपर वाले की दुआ समझो`` कहकर शराफतन बचना चाहा मगर अगला घूंट भरते न भरते मैंने देखा कि वह किसी निश्चित यक़ीन से फूले जा रहा है. अपनी तसल्ली के लिहाज़ से बोला, ''आपका गिलास खाली हो रहा है, इसे तो भरिए?``
''आधे मिनट में एक 'स्माल` के साथ सोडा-पानी मिक्स करके मैंने सामान्य रत़ार पकड़ी तो किसी पैगम्बर की सी भंगिमा ओढ़कर बोला, ''पता नहीं साब...कभी सोचा नहीं...हमारी जाती ज़िंदगियों के तजुर्बे ही हमारी फितरत तय करते हैं. बड़े दिनों तक ट्रकों के भाड़े की दलाली में ईमानदारी ने मुझे इतनी और ऐसी पटकियां खिलाई कि क्या पूछिए. मैं कायदे से आधे टके पर काम करूं तो व्योपारियों को ज्य़ादा लगता मगर पुलिसिए और मुंसीपल्टी के नाम का रोज़ दो-पट लूं तो उन्हें कोई एतराज नहीं. हक़ीक़त बात ये है कि सच बोल के ज़मीर तो सुकून से रहता है मगर दुनियादारी के खामियाजे इस पर भारी पड़ते हैं. गांव के मैदानी स्कूल में मेरे साथ एक लड़का पढ़ता था चमन. हमारी तरह ही फाकेहाल मगर रहता बड़ी साफ़-सफ़ाई से था. मास्साब उसी से लोटे में हैंडपंप का पानी मंगवाते. एक दिन चमचमाते लोटे में जब वह ठंडा-ठंडा पानी लेकर आया तो मास्साब ने उसकी दरफ्यात कर दी : ''ले आया?``
उनकी आंखें किसी घात लगाए चीते सी नापाक थीं.
चमन की समझ न पड़े कि माजरा क्या है. क्या कहे?
''?``
''थूक डाल दिया था`` अपने गुबार को मास्साब ज्य़ादा देर नहीं रोक पाए.
''ना मास्साब`` बेनूर होते जा रहे चमन ने सफ़ाई में गर्दन हिलाई.
मगर एक बलिष्ठ हथेली ने तभी चमन के बाएं गाल और कान की खपच्चे बिखेर दीं. भरे लोटे के साथ वह औंधे मुंह जाकर गिरा. हालत इतनी खस्ता कि रोने लायक हौसला भी नहीं बटोर पा रहा था.
दरअसल उसकी पीठ पीछे किसी ने इस 'सच` से मास्साब के कान भर दिए थे. चमन क़सम खाकर मना करता रहा कि इल्जाम सच नहीं है. उसकी बेतरह धुनाई करते जा रहे मास्साब ने इस बिना पर अपने ब्रेक लगाए ''ठीक है, आज नहीं थूका मगर सच बता...पहले कभी थूका था...ध्यान रखियो...सच बोलेगा तो मैं छोड़ भी दूंगा पर झूठ बोलेगा तो तेरी खैर नहीं...``
सच या झूठ मगर चमन ने गुनाह कबूल कर लिया, मगर मास्साब ने सरासर वादाखिलाफ़ी की : चमन को जमकर सूंता और स्कूल से निकलवा दिया.
आप यह देखिए कि सच की राह के ज़रा से वाकये ने एक अच्छे-खासे बच्चे की ज़िंदगी बदल दी. देहात भर में मची खब़र की खिल्ली ने उसके बाप को सन्न कर दिया. तीसरे रोज़ चमन गांव से भाग गया जो कभी नहीं लौटा. सुनने में यही आया कि कुछ दिनों उसने गुमटियों पर चाय के बर्तन मांजे, जेबें काटीं और दो-चार बार पुलिस हिरासत में रहने के बाद होते-होते जिस्मानी कारोबार का दल्ला बन गया.
चमन और स्कूल को छोड़िए, मेरी अपनी ज़िंदगी में कितने वाकए और हादसे हुए कि सच से यक़ीन उठ गया. हमारी दुनिया में इतनी कूवत नहीं है कि वह सच को एक हक़ीक़त की तरह पचा ले...दूसरों के नाजायज़ ताल्लुक़ात की तरह वह उसमें एक मालूमाती दिलचस्पी तो रखती है मगर बर्दाश्त नहीं करती है. सच कहूं, सच इस दुनिया का सबसे बड़ा झूठ है. कितनी तो इसकी बैसाखियां हैं...आप हिंदी में क्या कहते हैं...समय-सापेक्ष, व्यक्ति-सापेक्ष, परिस्थिति-सापेक्ष, नीयत-सापेक्ष...
मैंने उससे क्या पूछा था और पट्ठे ने कहां ले जा पटका. बहरहाल अपनी दुनिया के काले-सफेद और खुरदरे झूठों से परे मुझे इन्सानी फितरत में पैवस्त ऐसे चिकने और बेरंग झूठों की याद ताज़ा हो आई थी जो कड़वे सचों से ज्य़ादा घातक और मारक रहे थे. स्कूल में वीके गुप्ता भौतिकी पढ़ाते थे. अपेक्षाकृत जवान-से दिखते और हँसमुख. विषय में दुरुस्त. बढ़-चढ़कर सवाल पूछने को प्रेरित करते ''मुझे लगना चाहिए मैं कद्दू-बैगनों को नहीं, समझदारों को पढ़ा रहा हूं,`` वे जैसे चुनौती फैंकते. भला हो उस सीनियर का जिसने वक्त़ रहते चेता दिया ''कभी इस चक्कर में मत पड़ना...समझ में न आए तो घर पर दो घंटे एक्स्ट्रा लगा लेना या किसी साथी से पूछ लेना...अपने पढ़ाए पर सवाल किए जाने से गुप्ताजी को एलर्जी है...प्रैक्टीकल्स तो हमेशा इनके ही पास रहने हैं.``
और सालाना नतीजे वाक़ई इसके गवाह थे.
मगर उसके फलसफे में दो ईटें जोड़ने की बजाय मैंने बात का रुख बदला, ''मगर मियां ज़मील अहमद पठान, मेरी समझ में यह नहीं आ रहा है कि तुम सच की पैरवी कर रहे हो या झूठ की?``
''पता नहीं साब...मैं दोनों को ज़िंदगी के बरक्स, सिक्के के दो पहलुओं की तरह देखता हूं, अलहदा करके नहीं...``
मियां तुम इतने बड़े फिलॉसफर नहीं हो जितना बने जा रहे हो.
''अमां सच-झूठ के दरम्यान इतना घपला भी नहीं है कि दोनों में फ़ऱ्क ही न हो सके`` मुझे सख्त़ी से कहना पड़ा.
एक बार फिर उसने कंधे का सहारा बदला और खुजली की हाजत में तर्जनी उंगली कान में डालकर झनझना दी. एक पकौड़े को एक बार में आधे से ज्य़ादा गड़प किया और किसी पोशीदा चाल को दबाती मुस्कराहट में बोला, ''उसे जाने दीजिए. फ़िलहाल आप यह बताइए कि आप मेरी काबलियत कितनी समझते हैं...बताइए,बताइए...``
''काबलियत की तुममें क्या कमी है, अच्छे-अच्छों की ऐसी-तैसी कर देते हो...``
''मज़ाक़ नहीं सर, सच बताइए.`` उसका कौतूहल कुछ दर्ज करने को बेताब था.
''बहुत पहले तुम्हीं ने कहा था...तुम चौथी पास हो...`` स्मृति के अंधेरे बस्ते से मेरे हाथ जो लगा, निकाल खींचा.
''जी हां, कहा था और अब कह रहा हूं कि मैं ग्रेज्युएट हूं, एमए प्रीवियस का फार्म भी भरा था मगर हालात नहीं बन पाए...बीए में मेरे पास हिस्ट्री, सोशियोलॉजी और इकॉनॉमिक्स थे...``
मेरा तीसरा पैग खत़्म हो गया था मगर उसके खुलासे ने सुरूर को फुसलाते रहना और, अभी-अभी उसके बताए वे सभी दोयम-कमतर काम जो किसी पढ़े-लिखे की सोच और गैरत में शामिल नहीं हो सकते थे. एक पल को जेह़न में यह खय़ाल खटके बगैर नहीं रह सका कि पठान के 'केस` में मेरी 'रैकी` कितनी बुरी तरह 'ऑफ टारगैट` हो गई है. यह कम बड़ा सदमा नहीं था. शायद उसे भी लगा कि अपने बारे में ऐसी बात छिपाकर उसने क्या फिजूल का गैप खड़ा कर लिया है.
भीतर से 'डिनर रैडी` का संदेश आया तो पठान हड़बड़ाकर उठ खड़ा हुआ. घर से बाहर निकलकर उसे विदा करने की छूट मुझे नहीं थी. अधखुले दरवाज़े पर किसी चूहे की तरह उसने दाएं-बाएं झांका और चला गया इस उम्मीद में कि उसे फ़ोन पर मेरे 'सात नंबर` पुकारे जाने का इंतज़ार रहेगा.
मगर मैंने उसे ''हां भाई सात नंबर`` टहेलता फ़ोन नहीं किया. मैं पल-पल अपने तबादले की इंतज़ार कर रहा था. तीन साल से दिन-रात छापे मारते-मारते मेरी हालत स्टड फार्म के उस घोड़े जैसी हो गई थी जिसके 'काम` को दूसरे बड़े रश्क से देखते हैं मगर एक तात्कालिक आनंद के बावजूद अपने कर्म से वह इतना ऊब-उकता चुका होता है कि दिन रात 'उसी` से पलायन करने की सोचता रहता है...गधा बनकर बोझा सहलाने में लगा था. क्यों इस मुर्दे में जान डालने में लगा है खुदगर्ज...कितना ही करले, अब तेरी दाल नहीं गलेगी...अवर हनीमून इज़ ओवर!
''आपने ऐसा 'केस` नहीं किया होगा.`` अच्छा, ऐसा नहीं किया होगा तो कैसा किया होगा? एक अदद उबासी खींचकर मैंने चटखारा लिया...तो जनाब फरमा रहे हैं कि अभी तक हम घास छीलते रहे हैं.
''आपका दिल खुश हो जाएगा.``
वह अपनी लेन में घुसने को आमादा हो रहा था.
''पठान, इस वक्त़ यह जगह ऐसी बात करने को मुनासिब नहीं है...तुम्हें बताना है तो छह बजे के बाद आना.``
मेरे द्वारा बेतकल्लुफ पर क़तर दिए जाने के बावजूद वह 'सॉरी सर` गिड़गिड़ाने लगा और शाम को आने का हुक्म सर पर ओढ़े चला गया.
जब आम खाने ही नहीं हैं तो पेड़ क्या गिनने?
मगर ठीक छह बजे वह उसी तरह दबे पांव चेंबर में घुस आया. इस दरम्यान मैंने अपना मन और पुख्त़ा कर लिया था कि बिना मोहलत दिए उसे टरका देना है. इसलिए उसके कायदेसर बैठने से पहले ही मैंने दाग दिया, ''तुम जानते तो हो पठान कि मेरे ट्रांसफर का बस आजकल-आजकल हो रहा है...क्या फ़ायदा कि केस करने की वजह से किसी को चार्ज देने में डिले हो जाए.``
''आप केस को एक नज़र देख लो... जितना हो सके डैवलप कर लो...बाक़ी जैसी ऊपर वाले की मऱ्जी...``कहते हुए उसने हाथ ऊपर उठाया. ऐसी जायज अर्जी पर बेरुखी में सुनते हुए भी मुझे 'चलो बताओ` की रियायत देनी पड़ गई.
उसने उचककर एक पुलिंदा मेरी नज़र कर दिया. ज्य़ादातर चीज़ें अभद्र-सी लिखावट में सिलसिलेवार नाम जावेद अहमद सिद्दकी. बीवियां तीन. बंगले चार (एक पुश्तैनी जिसमें विधवा मां रहती है और जहां जावेद दूसरे-चौथे रोज़ आता-जाता है). बेटे सात, पांच शादी-शुदा. आठ दुकानें चमनपुरा बाज़ार में, पांच नवाबगंज में. 'सुकून` सुपर मार्किट में आधे की भागेदारी. नीलमबाग से थोड़ा आगे पांच हज़ार गज़ का प्लॉट जिसमें एक बिल्डर के साथ मिलकर लैट्स-दुकानें बनाने का काम शुरू होने वाला है. तीन पैट्रोल पंप (दो शहर में,एक हाइवे पर). तीन टैंकर और बाइस ट्रक. निजी वाहनों में तीन लांसर, दो होंडासिटी, दो कॉलिस, तीन सेंट्रो और एक टाटा सूमो...``
''कोई काम ऐसा भी है जो यह नहीं करता है.``
मैंने तंज कसा...क्या पता मुझे मोहरा बनाने के लिए ही इतना बड़ा चुग्गा डाल रहा है.
''तभी तो.`` मेरा मंतव्य समझे बगैर उसने अधीरता से जड़ा.
''यार लानत है हमारे जैसे चश्मपोशों को जिन्हें ऐसे माफिया अहमक की खब़र तक नहीं...``
मैं अब भी उसके 'किला-ए-तसव्वुर` को गिराने में लगा था.
''ज्य़ादातर चीज़ें तो बेनामी हैं...फिर साब आप लोग हमारी बस्ती-मोहल्लों में आते कहां हैं? आप तो वहां घिन और गंदगी ही देखते आए हैं...और आपका भी क्या कसूर जब पुलिस भी किसी मुहिम के दौरान ही हाजरी बनाती है...बिजली वाला रीडिंग लेने नहीं जाता...`` वह अपनी बात बढ़ाता ही जा रहा था कि मैंने टोका, ''अमां तुमने हमारी वक्त़ मीटर रीडर जितनी कर दी?``
''वो बात नहीं है साब...जो ताक़त और रुतबा आपके विभाग के हाथ है, और किसी के पास कहां? पैसा इन्सान की सारी करतूतों का समझो जोड़ भी है और निचोड़ भी. पैसे के बगैर धर्म का भी गुज़ारा नहीं होता,पैसा ईमान डिगाता ही है...और आप लोग आदमी के हलक़ से इसी को निकाल लेते हो. कमा ले कोई जितना चाहे हिसाबी-बेहिसाबी पैसा...खा तो वह सकता नहीं है, बस उड़ा सकता है मगर कितना? आखिऱ में तो वह बीवी के गहने-जेवर बनवाएगा, पुश्तों के इन्तजामात में ज़मीन-जायदाद बनाएगा, लॉकर-एफडी में रखेगा...``
''रखैलों पर उड़ाएगा?``
मेरे ज़ेहन में जांगिड़ साब आ खड़े हुए.
''बेशक, रखैलों पर भी उड़ाएगा`` 'पर` पर जोर देकर उसने मेरी बात दोहराई.
''तो तीन बीवियों के बावजूद जावेद यह शौक़ फरमाता है या नही?``
''क्यों नहीं साब, क्या वह इन्सान नहीं है?``
मेरी चुहल पर पठान भी जुगलबन्दी करने लगा.
''ऐसे ही जैसे किशनचंद लक्ष्मणदास की थी या सचमुच की?``
मेरे चटखारे की नब्ज़ पर पोटुओं से अपना टेंटुआ पकड़कर वह पिघल पड़ा.
''अल्ला कसम साब! लो, वो तो मैं भूल ही गया था...एक स्कूल भी तो है इसके... उसकी प्रिंसिपल...कई साल से है. आपको तो पता ही होगा कि स्कूल से बढ़िया आजकल कोई धंधा नहीं. मनमाफिक फीस लो,बिल्डिंग के नाम पर डोनेशन लूटो, उधर सरकारी ग्रांट्स अलैदा...और खऱ्चे के नाम पर थोड़ा-बहुत बिजली-पानी और स्टाफ- टीचर्स की तन्खाहें...उसमें मनमानी कटौती, जिस मर्जी को लगाओ-हटाओ या अपनी'प्रिंसिपल` बना लो...``
विभागीय निस्संगता के उस दौर में रिवार्ड की एक फ़ाइल जांगिड़ साब की स्वीकृति के लिए लेकर गया तो उन्होंने बुरी खब़र दे मारी : विभाग के अखिल भारतीय तबादलों की नई नीति आ रही थी जिसके तहत इस वर्ष कोई तबादला नहीं होना था, सिवाय शिकायत अथवा अनुकंपाशील मामलों के जिनमें मेरी गिनती नहीं थी. लंबी पारी के कारण मेरे ज़ाहिर आलस्य को भांपकर उन्होंने अपनी तरह से मुझे खूब झिंझोड़ा मुख्यत: एक सफल छापेबाज होने के मेरे पोशीदा अहम् को सहलाते हुए. ऐसी हालत में हफ्ता-दस दिन यूं ही निकालने के बाद मैंने जावेद अहमद सिद्दकी का केस उनके समक्ष रख दिया. उसका नैटवर्क, तौर-तरीका और कारोबारी विविधता देखकर वे लगभग उछल पड़े. टारगैट हिट करने के लिए हर सुरमई रंग वहां पहले से ही मौजूद था मगर उनकी अतिरिक्त तसल्ली का सबब कुछ और ही निकला : ''एक प्रवर्तन संस्था के तौर पर इतने बरसों काम करते हुए हमने कभी इस नज़रिए से नहीं सोचा मगर पिछले तीन-चार छापों के बाद कई संगठनों ने हम पर आरोप लगाया है और मैं समझता हूं कि आरोप बेबुनियाद नहीं है कि हम अपनी दादागिरी सब पर चला लेते हैं, सिवाय एक खास कम्यूनिटी के...आई थिंक इफ वी आर इम्पार्शल, लैट्स लुक लाइक वन...``
इससे ज्य़ादा ग्रीन सिग्नल की दरकार नहीं थी कि मुझे क्या करना है. उल्टे, मुझे एक भीतरी तसल्ली थी कि केस के 'सही` होने की बाबत मुझे निदेशक के सामने कोई खसखसा जस्टीफिकेशन गढ़ने से निजात रहेगी.
जावेद की जड़ों की तहक़ीकात करना मेरे अभी तक के अभियानों का सबसे कसैला अनुभव था. दूसरे कारोबारी शिकारों में बखूबी आजमाया मेरा हर हथकंडा यहां मुंह की खा रहा था. मैं पस्त-हालत (यानी बेनहाया और हवाई चप्पलें चढ़ाए) में कूरियर बॉय बनकर जाता तो तंग गलियों के उस गंदले चक्रव्यूह में निठल्ले बैठे-घूमते लड़के मेरी ऐसी सुनवाई करने लगते कि जान पर बन आती. मैं दत़र से दूर किसी पीसीओ बूथ से ग्राहक बनकर 'अस्सला वालेकुम` से शुरुआत करता तो दूसरे ही पल चौराहे पर अपनी मां-बहन की इज्ज़त नीलाम कर दिए जाने की बजबजाती धमकी बर्दाश्त करता. उसकी आवाजाही को ट्रैक करना तो नामुमकिन ही था. पता नहीं क्यों उसे रक्तचाप की शिकायत नहीं थी वरना आसपास के पार्कों में सुबह-सुबह स्पोर्टस वियर में दो हफ्ते ब्रिस्क वॉक करते किसी एक दिन तो मैं उससे टकराता. भला हो'प्रिंसिपल साहिबा` का जिनकी दरियादिली ने मुझे बस फेल होने से रोक दिया. बहरहाल, मैं इस बात को बहुत अच्छी तरह समझ गया था कि दफ्तरी काम-काज के सिलसिले में लोग क्यों अवसादग्रस्त हो जाते हैं.
जानकारी के आपसी लेन-देन और आगे की रणनीति तय करने की जगह इस बार शहर की बड़ी लाइब्रेरी थी जिसके भीमकाय हॉल में दोपहर को अमूमन सन्नाटा रहता था. एकाध किताब बगल में दबाकर हम मजे से ज़रूरी खुसपुस कर सकते थे.
''अमां किस दोज़ख में फंसा दिया तुमने पठान.`` दो हतों की पिसायी के बाद मैंने अपनी कोफ्त निकाली.
''दोज़ख नहीं साब, समझो रिवार्ड केस है...आपके हल्ले हो जाएंगे`` वह ठंडक से आश्वस्त करता.
''जान तो बच जाएगी ना.`` किसी निरंकुश के भीतर एक कोने में ठहरे डर की तरह मैं अपना पोस्ट-ऑपरेशन डर उस पर उगलता.
''आज तक कभी हुआ है क्या?``
''तुम यह बताओ कि इतनी सारी जानकारी तुमने कैसे हासिल कर ली?`` यह उसके राज़ की तहक़ीकात नहीं, टोहगिरी के जोखिम रास्तों मिले फफोलों की कसक थी.
''आपको जोखिम ज्य़ादा लगते हैं क्योंकि आप कौम से बाहर के हैं. कौम के भीतर कुछ न कुछ तो चलता ही रहता है...शादी-ब्याह के चर्चे, बिरादरी-रिश्तेदारी की बातें. फिर इसके एक लड़के के यहां मेरे साले की लड़की नौकरानी है...जिस आदमी की लाखों की ज़मीन इसने दहशत के दम पर कौड़ियों के मोल हड़प ली,वह मेरी खाला के यहां किसी का रिश्ता लेकर आया था...``
मुझे यक़ीन आने लगा था फिर भी पूछे बगैर नहीं रहा, ''कोई जाती मामला तो नहीं?``
दरअसल जाती समीकरण चीज़ों को इतना तोड़-मरोड़ डालते थे कि 'सही` टारगैट की शिनाख्त़ मुश्किल पेश करती थी...हर निष्कासित कर्मचारी, नाराज़ भागीदार और त्रस्त लेनदार हमारी मार्फत 'हिसाब` चुकता करने को बौराया रहता था (सिवाय उन चंद 'मित्रों` के जिनकी राष्ट्रीयता की भावना ज्य़ादा उदात्त क़िस्म की थी.).
''एकदम नहीं साब...आपके काम की तरह मेरे काम में जाती बात कुछ नहीं होती है. अल्लाह के फ़जल से किसी चीज़ की कमी नहीं है...आप जैसे मेहरबानों का साया है. मेरे मुसलमान होने के खय़ाल से आपके मन में यह शक आ रहा हो तो बता दूं कि मैं अपने क़ारोबार में ऐसी किसी तकसीम को पनाह नहीं देता...पैसे का कोई धर्म नहीं होता साब और वैसे समझो तो सभी धर्मों का धर्म ही पैसा है. छोटा आदमी हूं साब मगर एक बात जानता हूं कि ज्य़ादा पैसा गुनाह की बिना के बगैर नहीं जुड़ सकता और जुड़ भी जाए तो गुनाह की मोरी में ले जाए बगैर नहीं बख्श़ता...``
यह बात तूने खूब कही मेरे गफ्फार खान. पूछा जाए कुछ, मगर जवाब ऐसा तगड़ा-सा मार दो कि पूछने वाला ढें।
काम की बात पर आने के लिए बात बदलनी पड़ी.
''ऐसा है, एस आर पी पूरी मिल गई तो अगले महीने के पहले हते हिट करने का इरादा है. तुम किसी तरह पता लगाओ कि उन दिनों जावेद कहीं बाहर तो नहीं जाने वाला है`` मेरी अपेक्षानुसार उसने काम की गंभीरता पर कान दिए.
''समझो पता लग गया.``
''तो समझो प्रिंसिपल साहिबा आ गइंर् लपेट में...गो इस कार्रवाई का नाम 'ऑपरेशन प्रिंसिपल` कर देते हैं...``
मगर टोहगिरी की राह में कुछ हफ्तों की मेरी दिलतोड़ मेहनत और पठान की सूचनाएं धरी की धरी रह गईं. लायब्रेरी में की गई मुलाक़ात के तीसरे रोज़ शहर में लूटपाट, आगजनी, अपराध और हत्याओं का ऐसा एकतरफ़ा विस्फोट हुआ कि आंखों को यक़ीन न हो. दक्षिणपंथी हिंदुओं के नियोजित जत्थों ने राज्य संस्था की मदद और सांठ-गांठ से राज्य भर में नृशंसता का ऐसा तांडव रचा कि किताबों में पढ़े दूसरे विश्वऱ्युद्ध के वक्त़ के थर्रा देने वाले मनहूस फासी दिन भड़भड़ाकर ताज़ा हो गए. आदमी-औरत, बच्चे-बूढ़े, अमीर-गऱीब,सभी को हुल्लड़ दस्तों ने खरगोश-मेमनों की तरह लाचार हालत में हलाक़ करने में कोई भेदभाव नहीं बरता...किसी को बाहर से कमरा बंद करके फूंक दिया गया तो किसी को शिकारी कुत्तों की मानिंद दुरदुराकर जिबह कर दिया गया. परिवार के परिवार ही नहीं, बस्तियों की बस्तियां भट्टों की तरह कालिख उगलकर श्मशान बन रही थीं. तकनीकी और प्रबंधन की एक से एक नई जानकारी, अस्तित्व और पहचान के संकट से हिंदुत्व को उबारने में झोंक दी जा रही थी. ग्लोब्लाइजेशन के मजबूत दावों के तहत हो रही सूचना क्रांति,रातों-रात शहर को यातना शिविर बन जाने से नहीं रोक पाई. हैवानियत के इस वीभत्स जश्न में अधिसंख्य गैऱ-मुस्लिम आबादी दर्शक भर नहीं थी, बाक़ायदा या बेक़ायदा वह उसमें शरीक थी. अखब़ार वह उस बर्बरता की इन्तहां पर शर्मसार होने की गरज से नहीं, अपनी जीत का 'आंकड़ा` जानने की परपीड़न इच्छा से ज्य़ादा पढ़ती थी. खब़रों से भरे उस दुपहरिया अखब़ार में ही मैंने अजीब तरह से चुभती तकलीफ़ से पढ़ा कि जावेद को भी उसकी पैदाइश की सज़ा दे दी गई थी...तीन लड़कों समेत परिवार में आठ लोग मौत के घाट उतार दिए गए थे. उसके कारोबारी नुकसान की तो अटकल लगानी भी फिजूल थीं क्योंकि अभी जहां बेनामीदारों की फेहरिस्त बनाई जानी थी वहीं ज़रूरी नामदार ही गायब हो गए. फ़िलहाल तो उसके नौ ट्रक और चार निजी कारों के लावारिस कंकाल ही हिंदुओं की विजय-स्मृति बने पड़े थे. जंगली वहशत की तीन-चार रोज़ चली हुकूमत के बाद, यानी बहुसंख्यकों द्वारा मुसलमानों को 'सबक़` सिखा देने के तीन-चार रोज़ बाद मार-काट की सामूहिक दास्तानों में कमी तो हुई मगर इन्हीं तीन-चार दिनों ने सैकड़ों बरसों की सभ्यता खारिज कर दी थी. उसके कई महीनों तक राहत शिविरों के हज़ारों बेघर, बेज़ार और अभिशप्त, नारकीय ज़िंदगी बख्श़ दिए जाने (बख्श़ा किसने था, वे तो बस छूट गए थे) पर खुद को खुशक़िस्मत समझते रहे. तंगी और गंदगी में रहकर एकजुटता पनपती है इस फलसफे के तहत अल्पसंख्यकों द्वारा प्रति-आक्रमण कर दिए जाने के डर से हिंदू समाज के शेरों की नींद अलबत्ता फिर भी उड़ी हुई थी. यह कयास तो वाजिब भी था कि नेस्तनाबूद कर दिए जाने के डर और कौम से ली जा रही बेवजह कुरबानी ने मुसलमानों को ज़ाहिरन बिरादरेपन में बांध दिया था.
तीन-चार महीने से पठान की कोई खब़र नहीं थी. मेरे भीतर वक्त़-बेवक्त़ यह खय़ाल फिरककर चला जाता कि उन्मादियों ने कहीं उसे भी तो ठिकाने नहीं लगा दिया...आखिऱ हाईकोर्ट के जज, विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर और खुद पुलिस के अफ़सरान सत्ता-तंत्रा में अपनी उपस्थिति रखे जाने के बावजूद अपनी पैदाइश के खिल़ाफ़ कुछ भी न कर पाने को मजबूर हो गए थे. ऐसे सामाजिक झंझावात के दौर में अपना दतरी'फ़र्ज़` जैसा टुच्चा काम करने का सवाल ही नहीं था. जावेद अहमद सिद्दकी और उसके परिवार के साथ जो हुआ उससे मोटे तौर पर अफ़सोस हुआ था मगर ऐसे घाघ और कपटी व्यक्ति को अपना शिकार न बनाए जाने की अंदरुनी राहत भी थी.
मगर कोई छह महीने बाद, लाइब्रेरी के उसी हॉल में पठान की 'नमस्ते साब` ने एक शनिवार मुझे चौंका दिया. ''तुम यहां...अरे...कैसे हो...फ़ोन करके हालचाल तो बता देते...`` बेकाबू होकर मेरे मुंह से सवालों की झड़ी गिरने लगी. उसे ज़िंदा और साबुत हाल देखना पूरी तरह गले नहीं उतरा था.
''अल्ला के फजल से सलामत हूं साब, कोई नुकसान भी नहीं. मस्जिद पास ही है मेरे घर के...``
उसने मुझे बताया कि हर शनिवार इस लाइब्रेरी में आने की मेरी आदत के चलते वह कई शनिवारों से मुझे पकड़ना चाह रहा था मगर हो ही नहीं पाया. ''तो मोबाइल कर दिया होता`` मैंने आत्मीय नाराजगी जताई.''नहीं साब आजकल मोबाइल का भी कुछ ठिकाना नहीं...हमारी कौम तो वैसे भी शक के निशाने पर रहती है`` लाचारगी में उसकी आवाज़ निकली.
लाइब्रेरी के पिछवाड़े की गुमटी पर खड़े-खड़े ही चाय की सुड़की भरते वक्त़ मेरी आवाज़ बोझिल थी.
''बहुत बुरा हुआ पठान...नहीं होना चाहिए था.``
मैं जैसे कहीं न कहीं 'हत्यारी` कौम के अहसास से दबा था. ''अरे जाने दो साब...क्या अच्छा क्या बुरा...``
कहना होगा उसने काफ़ी नुनखुरेपन से मुझे क़तर दिया. उसकी कौम पर. ''ऑपरेशन प्रिंसिपल` तो खटाई में ही गया...बेचारे के साथ देखिए आतताइयों ने क्या नहीं कर डाला...``
''वो तो है मगर चारों तरफ़ से जो 'रिलीफ` आ रही है, उसे भी तो उसी के लोग हथिया रहे हैं...गऱीब तो इसमें भी मर रिया है...``
देश-विदेश की सरकारी, गैर-सरकारी संस्थाओं से आने वाली सहायता की खब़रें अखब़ारों में आती रहती थीं. किसी सरकारी योजना के तहत उसके आबंटन में जो भेदभाव या घपला होता है, उससे मैं वाकिफ़ था.
किसी भी तरह के प्रतिवाद का मौक़ा पठान ने नहीं दिया, ''और फिर साब जो प्रोपर्टीज़ बेनामीदारों के हाथ महफूज हैं, जो पैसा बैंकों के लॉकर्स और एफडीज़ में सेफ पड़ा है...जो इनकम बेहिसाबी खातों में दऱ्ज है उसके बरक्स इस्लामिक रिलीफ़ कमेटी या दूसरी किसी एजेंसी की मदद का क्या मोल है...'हमको` यह सब थोड़े ही देखने का होता है...कि दंगे-फसाद में क्या हुआ...यह तो बीमा कंपनी वाले देखेंगे...हमारे मुल्क में यह सब तो चलता ही रहता है. आपका अभी मूड नहीं हो तो कुछ दिन और रुक लेते हैं...``
पठान के 'धर्म` को मैंने मन ही मन सलाम किया और गिलास पटककर गहरी आश्वस्ति में उठ खड़ा हुआ.
ओमा शर्मा
सितम्बर 10, 2006
Top

Hindinest is a website for creative minds, who prefer to express their views to Hindi speaking masses of India.