Sunday, December 20, 2009

फिर-फिर लौटेगा

फिर-फिर लौटेगा
वह घर से दूर ठिठका खडा रह गया, कदमों में बेपनाह झिझक, आते वक्त सोचा था, कम-अज-कम अपने वस्त्र तो बदल ही लेगा वह, पर फिर लगा, इसकी कोई जरूरत नहीं, जो होने के लिए वह चला गया था, उसके लिए पुराने वस्त्र उसे छोडने ही थे, सो अब क्यूं? और फिर वस्त्र बदलने से ही क्या होगा?
उसने अपना अंतर टटोला - कोई दु:ख, कोई शोक, कोई लहर, कोई निराशा, कुछ नहीं, एक शब्द भी नहीं था अंदर - जिस मौन को साधने में उसने अपने जीवन के इतने बरस खर्च कर दिए, वह सध गया था और अब उसे साध रहा था। उसने आंखो के सामने मां की रोती-कलपती छवि लानी चाही, जो उसने आखिरी बार देखी थी और मन में बसा गली के उस मोड क़ी ओर मुड गया था, जहां कोई उसका इंतजार कर रहा था और फिर वह शहर छोडते वक्त न सिर्फ उसने अपने कपडे छोडे थे, बल्कि वह चोला, वह पहचान भी वहीं छोड दी, जिसके तहत वह जाना जाता था।
रोती-कलपती मां उस वक्त एकाएक ही उसके पैरों पर गिर गई थी -
''मुझे छोड क़े न जा तरून, कैसे रहूंगी मैं तेरे बगैर? आज वह तेरे लिए सब कुछ हो गया, जिसे तू दो साल से जानता है, मैं कुछ नहीं।''
उसका मन द्रवित हो आया था। उसने उन्हें उठाकर चारपाई पर बैठाया और खुद उनके पैरों के पास बैठ गया। वह उन्हे इस तरह समझाना चाहता था कि वे समझ जाएं और उसके जाने को इस तरह न ले, पर वह जानता था, ऐसा नहीं हो सकता।
'' मां, तू जानती है, मेरे लिए कोई रिश्ता, कोई नाता नहीं बचा, व्यर्थ है सब, मुझे मत रोक। अपनी आंखो से मुझे इस तरह देखेगी तो दु:ख पाएगी - मुझे जाने दे।''
'' दु:ख कितना छोटा शब्द है यह, पर कितना जबर्दस्त फैलाव है इसमें कि बडी-से-बडी ज़िंदगी और छोटे-से-छोटे लम्हे भी इसके भीतर समाकर झंझावत बन जाते है, कि जो जिंदगी वो रही होती है समतल नदी की शक्ल में, उसमें अचानक इस तरह बाढ आ जाती है कि फिर छोटी-बडी ख़ुशी, हसरतें, आशाए - सब कागज क़ी नावों-सी गीली होकर बहने लगती है। चाहे यह बाढ वक्ती होती है, पर जिंदगी की कई मीनारें इतनी कच्ची कर जाती है कि बस, फिर वे ढहने-ढहने को हो उठती है। ''
वह आखिरी पल तक बाहर नहीं आई थी।हालंकि वो मां के पैरों के पास बैठा उसके अंदर ध्वस्त होती मीनारों की आवाजे महसूस करवा रहा था और इंतजार करता रहा था कि शायद उसे आखिरी बार देखने न सही, अब प्रेम, मोह जैसा कुछ तो होगा ही - कोई कमजोरी, कोई लगाव, पर नहीं, वह आखिर तक नहीं जान पाया था कि उसके अंदर कितने गांव, कितने शहर जलकर राख हो गए, जो जिंदगी की दरिया के किनारें दोनो ने साथ मिलकर बनाए थे। कच्चे थे, पर थे। पका लेने की यकीन उन पलों में कितना पुख्ता लगता था। उसे उसकी वो आंखे याद हो आई, जिन्हे देखने मात्र से उसके बदन छोटी-छोटी में चिंगारियां फूटने लगती थीं - फिर कोई जरा सा स्पर्श या आलिंगन या होंठों की छुअन उन चिंगारियों को ज्वालामुखी में तब्दील कर देती, जिसकी आंच में उनके जिस्म सूखी लकडियों जैसे चटकने लगते थे, उस दुबली-पतली मामूली-सी दिखती काया में न जाने कितनी आग दबी होती कि देखेते-ही-देखते कितनी कामनाओं के जंगल राख हो जाते थे और वह हैरान-सा उसे देखता रह जाता।
उसी ने उसे इस आग से वाकिफ कराया था और वही उसे अपनी देह के समुंदर की उन अतल गहराइयों मे ले गई थी, जहां की अद्भुत विस्मयकारी, स्तब्ध कर देने वाली दुनिया को देखा था उसने और ठगा सा खडा रह गया था।
वह दुनिया, जहां शब्द फिर किसी काम के नहीं रहते थे और वे समुद्र की भीषण लहरों में एक-दूसरे से गुंथे अपने-आप को इनके हवाले कर देते, लहरें कब शांत हो, उन्हे किनारों पर पटक जाती, वे नींद के आगोश में जाने से पहले भी जान नहीं पाते थे।
पर न लहरें सच है, न समुंदर, न उन पर तैरते-गुंथे जिस्म। फिर? सच क्या है? कामनाओं के निरंतर दोहराव के पश्चात् वह सोचा करता - कहां है उस ऊर्जा का स्रोत? हर बार इतना तीव्र,इतना मारक, इतना आकर्षक कि देह ही पहला और अंतिम सच लगती -
'' मैं तुम्हारी धरती में बीज बोऊंगा और फिर तुम्हारी कोख से उसे फूटते देखूगां। मैं तुम्हारे जीवन की टहनी फूलों से भर दूंगामैं उन फूलों को पुकारूंगा, जो इस धरती पर खिलेंगेंमैं तुम्हारी रातों को मधुर स्वप्नों से सजाऊंगा। मैं छा जाऊंगा तुम्हारी सांसो पर, स्वप्नों पर, जीवन पर, ताकि मुझसे कभी एक क्षण के लिए भी अलग न हो सको।''
यहीं तो कहां करता था वह - बार-बार, लगातारपर नहीं लगा पाया था वह उसकी कोख में कोई पौधान वह उन फूलों को पुकार पाया, जो उसके स्वप्नों में महकते थे।
'' कहां जाओगे तुम मुझसे परे? मेरी बांहे अंतरिक्ष में घेरा डालेंगी और तुम्हे आबध्द कर लेंगी। मैं आकाशगंगा की तरह अपने में समो लूंगी।''
पर नहीं, वह तब तक कामनाओं के जंगल से भागने की तैयारी में था -
'' कौन है, जो मेरी नींद में स्वप्न बन कर उतरता है? कौन है, जो मेरी आशाओं के बीज बन कर फूटता है? वह अंकुरित होता है, फूलता है और पहचान नहीं पाता?''
प्रश्न? प्रश्न? प्रश्न?
क्या है, जो इस देह व मन से परे है? आत्मा क्या है? किस उद्देश्य के तहत जन्म हुआ है मेरा? किस लिए भेजा गया हूं मै? सुख क्या है? सत्य क्या है? कामना के परे किस तरह जाएं? मौन हो जाना किसे कहते है?
और वह धीरे धीरे उन लालसाओं के जंगल में से बाहर आने की राह ढूंढ़ता -
'' तुम एक नक्षत्र हो, स्वप्न लोक के नक्षत्र? जिसके जितना भी मैं पास आने की मैं कोशिश करती हूं, तुम उतना ही दूर जाते दिखते थे।'' वह हंस कर कहती और अपने से कस कर चिपका लेती।''
तब उसे लगता, आदमी और औरत के बीच एक जबर्दस्त खालीपन होता है, जिसे हम प्यार, मोह,कुछ जरूरी या गैरजरूरी शब्दों से भरने की कामयाब या नाकामयाब कोशिश करते हैं।
वह उसके सीने से लगा अपने ही सवालों के जंगल में भटकता रहता।
'' पच्चीस वर्षो तक मैने प्रेम किया, घृणा की, भूखों को भुलावे में रखा, आशाओं से संचालित हुआ,पर ज्यों-ज्यों इन्सानी दासता सम्बधी मेरा ज्ञान बढता गया, त्यों-त्यों मेरी आत्मा स्वतंत्रता के लिए अधिक तडपने लगी। कितनी बार मैने आनंद को खोजा, सुख को खोजा - कभी देह में, कभी मौन में,पर मैने सिर्फ उसकी झलक देखी, प्रतिध्वनि सुनी और मैं इसे पाने को लालायित हो उठा। जीवन के पच्चीस वर्ष मेरे तन से उसी तरह झर गए, जिस तरह वृक्षों के पत्ते झरते है, और मैने क्या पाया?मैं आत्माओं का मिलन, इच्छाओं का उद्वेग और उत्कंठाओं को देखता हूं और पाता हूं - यह सब आहों और दुखों की धुंध में से पैदा होते है। मैं अपनी निर्जनता से परे झांक कर देखता हूं, तो मुझे अंतरिक्ष, चांद-तारे, चमकदार नक्षत्र दिखाई पडते र्है कौन इन्हे संचालित करता है? मैं समुद्र की व्याकुल आवाज सुनता हूं - यह किसे पुकार रहा है? किस तरह यह सभी तत्व विश्व के सनातन नियमों से बंधे हैं? ''
तब मुझे अपना जीवन निहायत क्षुद्र और सिसकता हुआ-सा लगता, जो अनंत गहराइयों और ऊंचाइयों के बीच शून्य-सा कांपता। तब मैने अपने मैं , जो हर वक्त उपद्रव करता रहता, को खत्म करने की ठानी और मैने होठों को, तन को, मन को, कडवे घूंट पीने के लिए तैयार किया।
घर पास आ गया। अंदर से कुछ औरतों के रोने की आवाज आ रही है। क्या वह मां का रोना पहचान सकता है? क्या वह खुद रो सकता है? पर क्यों? वह तो अंश था एक, जो अंशी में विलीन हो गया-फिर-फिर जन्म लेने को फिर उसके लिए मातम क्यों?
वह तमाम दुनिया को इस तरह देखता, जिस तरह कोई पहाड क़ी सबसे ऊंची चोटी पर खडा होकर उसके नीचे बसे शहरों, घाटियों, जंगलों, नदियों और छोटे-छोटे क्षुद्र जीवों, उनके निरर्थक सुखों-दुखों को देखता और उनके नासमझेपन पर किसी बुजुर्ग की तरह मुस्कराता।
उसके पास आते ही घर के बाहर दरियों पर बैठे पुरूषों के जमावडे में खलबली मच गई। तकरीबन सारे उठ खडे हुए - कोई पैर छुने झुका, तो वह हडबडा गया और उसने मनाही की मुद्रा में दोनो हाथ उठा दिए। उसने नजर भर निहारा उन्हें - सब वहीं थे - चाचा, मौसा, मित्र, संबधीकम नहीं होता बारह वर्ष का समय। समय ने सबके उजले चेहरों पर धूल की परत चढा दी थी। ये थके-हारे, रोते-बिलखते, दौडते-भागते, घिसटते-रोते लोग। किस सुख की चाह में भागे जा रहे है? कहां है वह सुख?ये नहीं जानते, पर ये जानना भी नहीं चाहते।
वह स्वप्रेरणा से ताया के पैर छुने को झुका ही था कि उन्होने रोते हुए उसे बीच में रोक लिया - ''न-न पुत्तर, बडी देर कर दी तूने। आखिरी बार शायद वह तुझे ही देखना चाहता था। हालांकि कभी कहां नहीं मुंह सेमरा, तो आंखे जैसे किसी की तलाश में भटक रही थी वीरान खाली कोहरों सी।''
आखिरी वाक्य उनकी हिचकियों में डूब गया।वह असमंजस में खडा रह गया कि अब क्या? ताया ने ही उसकी समस्या हल कर दी। आंगन के बीचोबीच, जहां उनका शव रखा था बर्फ पर सफेद चादर से ढका, वहां ले जाकर मुंह से चादर हटा दी। उसने उन्हे देखा - अपने जनक को। क्षीण, कृश चेहरा और बदन। तमाम जीवन के जानलेवा संघर्ष का अंत।
'' देख, इस धरती पर लाखों लोग रहते है, जो हमसे भी बुरे हालात में जीते हैं, हंसते है। अदम्य जिंजीविषा है उनमे और एक तूतू क्यूं भाग रहा है, भगोडे? हमारी न सही, उसकी फिक्र कर, जिसे तू ब्याह कर लाया है।''
वह किसी तरह, किसी से भी नहीं माना था।
'' जा, भाग जा। एक शापित जिंदगी जिएगा तू - किसी पल तुझे चैन नहीं आएगा - जा बियावनों में घूम और अपने को तलाश - किसलिए लाया गया है तू इस धरती पर, यही कहता है न तेरा लफंगा गुरू।''
वह दनदनाते हुए घर से बाहर चले गए थे। वह उनके पैरो पर झुका और उनपर अपना सर रख दिया,
'' माफ कर दो मुझे, अगर मैने कुछ ऐसा किया, जो मुझे नहीं करना था। आज बारह बरस के बाद भी मैं तुम सब का अपराधी हूं।''
ताया ने चादर वापस उनके सर तक ओढा दी। आंगन की दूसरी तरफ बैठी औरतों के झुंड की ओर उसने देखा और सफेद कपडो मे लिपटी दुबली-पतली गठरी-सी मां की ओर बढा। औरतों का रुदन तेज हो गया। सबने सरक कर उसके लिए जगह बना दी और वह रोती हुई मां के करीब आ कर बैठ गया। मां ने हिचकियों के बीच सर उठा कर उसे देखा और तेज स्वर में रोने लगी,
'' क्यों आया तू? मैने जेठ जी से कहां भी, जिसने बारह बरस हमारी सुध नहीं ली, वह तो मर गया हमारे लिए।'' वे रोती जा रही थी और कहती जा रही थी ,'' न माने वे। एक ही बेटा हुआ। संस्कार कौन करेगा?'' और वह पछाडे ख़ाने लगी, '' कोई न हुआ रे हमारा। न बेटा, न पतिकिसके आसरे जिएंगी रे अब हम?''
वे बगल में बैठी युवती के कंधों पर ढह गई, जो स्वयं जार-जार रो रही थी। उसने झुकी नजरे उठाई और उसे देखते ही मानों हृदय की धडक़नें थम गइ -
'' तनु'' जिस्म की शिराओं, मन के समस्त भेदों ने एक साथ कहा - '' तनु''
'' मैं तुम्हारी नींद में ख्वाब बनकर उतरना चाहती हूं। तुम्हारे आकाश में बारिश-सी झरना चाहती हूं। तुम मुझे ले लो ओर भर जाओ। तुम मुझे दे दो और खाली हो जाओ।'' तनु ने मां को अपनी बांहो में भर लिया और रोती रही, बगैर सर उठाए या उसे देखे।

वह विचलित होने लगा - उसे लगा, अचानक ही वह उन सबके द्वारा खारिज कर दिया गया है, जो जाने-अनजाने उससे जुडे या जडे थे। उसने तनु के चेहरे की ओर देखा - एक असहाय सा वीरानापन उतर आया था - जैसा अक्सर बंजर जमीनों में देखा जा सकता है हल्की-हल्की दरारों से झांकता एक अजीब उथलापन
उसने दिलासे के लिए एक बार मां के सर पर हाथ रखा और उठ खडा हुआ। रात हो गई और एक अनावश्यक विस्तार का अंत हो चला - उसने वे सारे काम करवाए गए, जो एक हिंदू लडक़े को अपने बाप की मौत पर करने होते है। उसने बगैर किसी एतराज के सब किया। उस दिन की सब क्रियाएं खत्म हो चुकी, तो लोग धीरे-धीरे अपने घरों की ओर लौट चले। जो बच गए थे, दु:खों से हारे-टूटे अंदर कमरों में जाकर पड रहे। वह आंगन में लेट गया चारपाई पर। उसने अंदर जाने से इंकार कर दिया, तो किसी ने खास जोर नही दिया।
ताया ने सिर्फ इतना कहां, '' तू ही एक औलाद है उसकी। जाने क्या सोच छोड चला सब? कुछ न सोचा - क्या होगा तेरे पीछे? तनु ने तेरे जाते ही सफेद लिबास पहन चूडियां तोड ड़ाली और कहां,''मां वह मर गया। मैं हूं न तेरी बेटी या बेटा, जो तू समझ पहले तुम दोनो को खिलाऊंगी, फिर खुद खाऊंगी। तू उसके लिए न रो, जो रोने के काबिल न हो, फिर बाप लिवाने आया मायके से, इसने साफ जाने से इंकार कर दिया।'' वह अवाक्-सा सुनता रहा - '' फिर बेटा, उसने पढाई पूरी की। एक स्कूल में नौकरी की, फिर कॉलेज में आ गई। टयूशन भी की। बहुत सेवा की उसने। तेरे जाने के बाद भाभी छ: महीने को खटिया से लग गई। गू-मूत उठाया, पर आंख नही फेरी। उसे किस जन्म की सजा दे गया रे तू? यही कहता है तेरा ईश्वर? अब चला जाएगा दो विधवाओं को उनके भाग्य भरोसे छोडक़र?''
वह सर झुकाए बैठा रहा उनके सामने - कहा कुछ भी नहीं। क्या कहता? बेकार है सब।
उनके जाने के बाद वह लेट गया चारपाई पर और आसमान पर टंगे उन्ही सितारों को गिनने लगा,जिन्हे वह जाने कितनी बार गिन चुका था। कितने वर्ष उसने कोहरे में बिताए, जब उसकी आत्मा पर्वतों, जंगलो और गुफाओ में उस अज्ञात का पीछा करती - उस अज्ञात सत्य का पीछा करती,जिसकी झलक से वाकिफ था वह। समुद्र की अनजान परछाइयों में अपने प्रश्नों का पीछा करती।
'' जीवन दो आयामों में बंटता है। एक आयाम है संसार, जो है। दूसरा आयाम र्है मोक्ष, जो हो सकता है। वह तुम्हारे लिए अज्ञात है, पर तुम उसे पा सकते हो। असीम आंतरिक सुख मन संपूर्ण को खंडो मे तोड देता है। यहीं उसका काम है। मन एक प्रिज्म की भांति है। ज़ब प्रकाश की किरणें प्रिज्म से गुजरती है, तो वह सात रंगो में बंट जाती है। मन एक प्रिज्म है, जो सत्य को विभाजित कर देता है और हम उसे पूरा नहीं देख पाते।''
और भी कितनी-कितनी बातें कही थीं उन्होने, जब वह अपने प्रश्नों के जवाब पाने उनके पास गया था - एक विशाल मकान के निचले तल्ले की सीढियां उतर वह वहां पहुचां था। एक ऊंचे आसन पर वे जलती आग के सामने बैठे थे और कुछ तांत्रिक क्रियाएं कर रहे थे। वह उन्हे प्रणाम कर उनके सामने बैठ गया था -
'' कहां थे इतने दिन? मैं बरसो से तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा हूं। तुम नहीं जानते, तुम क्यों हो? मैं जानता हूं''
'' क्या जानते है आप?'' उसने धडक़ते दिल से पूछा।
उन्होने लाल-लाल आंखो से उसकी तरफ देखा था और मुस्कराए थे,'' यहीं कि तू क्यों बार-बार जन्म ले रहा हैभटक रहा हैतेरा अंतिम लक्ष्य क्या है इधर आ''
वह डरते-डरते उनके सम्मुख गया - '' आंखे बंद कर और अपने अंदर देख। चेतना को अपने अंदर ले जा और देख - कितनी नफरत, धुंध, धुंआ, कमीनगी, भय, युध्द, विरक्ति,लालसा, व्यभिचार, क्या-क्या नहीं है वहां? हम उन्ही अंधेरे तलो पर जीते हैं - उठो, ऊपर आओ। जानो, आगे की यात्रा क्या है?तुम ईश्वर हो स्वयं अपने ईश्वरत्व को पहचानो। इसे बाहर मत जानो।यह भीतर है। तुम्ही हो स्वयं - इसे महसूस करो।''
उन्होने उसके सर पर हाथ रख दिया। हाथ रखना था कि उसका समूचा जिस्म झनझना उठा। जिस्म के अज्ञात हिस्सों से लहरें उठी, अज्ञात हिस्सों में विलीन हो गई। आंखे बंद किए हुए ही उसे एक अद्भुत शांति महसूस हुई। और जब उसने आंखे खोली, वह, वह नहीं था, जो वहां चल कर आया था।बदल गया था अम्दर बहुत कुछ और जब उठा, तो उस शांति को फिर्रफिर पाने के दृढ निश्चय के साथ,पर कैसे?
घर में तनु है, जिसके सम्मुख देह की भूख कर वक्त उसका पीछा करती - मां अगरबत्तियों-मोमबत्तियों की छोटी सी दुकान चलाता बापछोटे-छोटे सपने, छोटी-छोटी आशाएं - कैसे छोड दे उनकोक्या करे? कौन चलाएगा उनको?
'' तुम नहीं चला रहे किसी को। कोई किसी को नहीं चला रहा। तुम तो निमित्त मात्र हो। हजारों-लाखों जन्मों से यही कर रहे हो, कोल्हू के बैल की तरह ऊब नहीं होती। छोड दो सब और देखो, तुम्हारे बगैर भी सब चलेगा।''
उन्होने उसे समझाया था, पर उसकी उलझन नहीं गई थी। महीनो वह परेशान रहा था। क्या कहे वह तनु से? कैसे? कि जिस जिस्म को मैं अब तक अपनी उंगलियों पर बिजली के लट्टूओं सा फिरता देखता था, उसके साथ कोई वास्ता नहीं मेरा? कि यह संसार एक दु:ख है - पराधीनता - अंधी दौड - ज़न्मों-जन्मों की। हर जन्म में वहीं चक्रवहीं दु:ख। किसी कामना का अंत नहीं होता। हर कामना दु:ख उपजाती है। मान लो, तुम्हे वह सब मिल गया, जो तुम चाहती हो, फिर? फिर आगे क्या? यह सुख नहीं है।यह अंतिम उपलब्धि नहीं है। तुम अपनी ऊर्जा गंवा रही हो। कोई चाहत कही नहीं ले जाती। चाह पागलपन का बीज है।
और वह एक लंबे अरसे तक नहीं कह पाया था। छिप-छिप कर जाता था स्वामी जी के कम्यून में - ध्यान करता, त्राटक, साधनाएं, विपस्सना ब्रह्मचर्य जो वे कहते, जो सब करते वह भी करता।
'' मन को शून्य बना दो, मौन हो जाओ और प्रकृति को सुनो'', वे कहते - पर ये सब इतना आसान नहीं था, पर इसके लिए अब वह अपनी जिंदगी के तमाम बरस खर्च करने को तैयार था। घर पर आधी रात को उठ जाता - ध्यान करता – मंत्र जाप साधनाएं-
तनु देखती सोचती महसूस करतीपूछती,'' तुम ये सब क्यों करते हो?''
'' शांति के लिए।''
'' तुम्हे मेरे पास शांति नहीं मिलती?''
'' स्थाई नहीं'' वह कहता।
'' पहले तो मिलती थी।''
'' तब मैं नहीं जानता था, शांति क्या होती है।''
'' अब? अब जानने के बाद क्या करोगे?''
'' मैं यहां से जाना चाहता हूं''
'' उससे क्या होगा?''
'' मैं जो पाना चाहता हूं, पा सकता हूं।''
'' तुम ऐसा क्या पाना चाहते हो, जो यहां रह कर नहीं पा सकते?''
''''
'' दरअसल तुम नहीं जानते, तुम क्या चाहते हो? तुम गुमराह हो रहे हो। तुम्हे अपना जीवन दु:ख लग रहा है, पर दरअसल यह एक संघर्ष है, इससे भागो मत, सामना करों। इस तरह सब संसार छोडने लगे, तो क्या होगा? सोचो जरा।''
तकरार-बहस-तकरार रोना... तनाव... मां... की हिचकियां बाप की गुस्साभरी चेतावनी, बहुत लंबा चला ये सब। बाबू जी दनदनाते गएस्वामी जी से झगडा कर के आ गए। तनु का समझाना-प्यार से,गुस्से से, नफरत से पर नहीं रुका था वह और उस कम्यून की मुख्य ब्रांच में आने के लिए उसने वह शहर आखिरकार छोड दि या
और फिर बारह बरस का अनवरत सफरकम्यून की अलग किस्म की जिंदगी, जहां देह और मन दो नहीं,एक है - और देह भी देह नहीं , कुछ और है....अद्भुत-अवर्णनीय
आज उसे बुध्द की वह कहानी याद आई - बुध्द जब बोधि प्राप्त करने के बाद यशोधरा के पास लौटे, तो उनके साथ उनका शिष्य आनंद था। बुध्द ने आनंद से कहा, '' आनंद, तुम यहीं रहो। यशोधरा मुझसे नाराज होगी। मुझे बुरा-भला कहेगी। तुम रहोगे, तो शायद वह अपने मन की बात नहीं कह पाए। उसका गुस्सा जायज है। उसे कहने दो। मै उसका अपराधी हूं। मुझे अकेले जाने दो,ताकि वह अपना गुस्सा उतार सके।''
क्या वह जाए? अकेला, उसके पास
वह कमरे में मां की बगल में लेटी हुई है - फर्श पर। मां को नींद का इंजेक्शन देकर सुला दिया गया हैवह जाग रही है। बारह बरसो से जाग रही है। नुकीले कांटे उग आए है उसकी पलकों परपर किसी से कुछ नहीं कहती। किस कसूर की सजा मिली उसे? औरत होने की? कितना स्वार्थी है पुरुष? मतलब से बंधता है, मतलब से अलग हो जाता है। आज आया है वह - बारह बरस बाद और मैने उसे देखा भी नहीं। सब कह रहे थे - बदल गया है...आंखो में तेज उतर आया है - चेहरे पर कांति...गेरुए कपडो में किसी देवपुरुष सा लगता है। देवपुरुष सा तो वह उसे तब भी लगता था, जब वह उसकी देह से खेल रहा होता था।उसकी तमाम-तमाम बातों के बावजूद उसे लगता था कि नहीं, देह ही अंतिम सच है।
भटक गया है वह, लौट आएगा। कहां जाएगा उसके बिना? नहींनहीं जा सकता! और जब उसने जाने की ठानी थी - वह दिनो रोती रही थीरातोंबात तक करनी बंद कर दी थी उसनेअलग कमरे में सोने लगा था वह। उसकी छाती गुस्से व नफरत से धू-धू कर जलने लगी थी - नहीं, वह कापुरुष हैउसके लिए क्या रोना? जो अपने बूढे मां-बाप और जवान बीवी को यूं छोड क़र जा सकता है, उसके लिए क्या रोना?
नहीं, फिर वह उसके लिए नहीं रोई। सारे आंसू सख्त बर्फ की सिल से उसकी छाती में जमा होते रहे। बारह बरस में सिल इतनी सख्त और वजनदार हो गई है कि अब उसे पिघलाया नहीं जा सकता। आइसबर्ग होता है न, एक हिस्सा ऊपर से दिखता और बाकी के हिस्से अंदर पानी में डुबे हुए
अब जाना औरत सिर्फ एक कहानी होती है, जिसे कहीं से भी शुरु किया जा सकता है,कही भी खत्म किया जा सकता है। किसी सेन्टेन्स पर ज्यादा दबाव डाला जा सकता है,किसी पर कम और कहानी की तरह वह हमेशा अधूरी रहती है। रेत के ऊंचे ढूंह सी बनती बिगडती-हवाओं के मिजाज परअसीम संभावनाओं के भरी वह सिर्फ एक रात का हिस्सा होती है - सुबह लोग भूल जाते है और अधूरी कहानियां आसमान में बादलों के टुकडों की तरह तैरती रहती हैं जिन पर बाद में बयानबाजी की जाती है या किसी वीरान बंजर जमीन की तरह किसी बीज की प्रतीक्षा में उधर तकती रहती है, जिस तरह किसी के आने की जरा सी भी उम्मीद है।
उस वक्त उसे लगा था, उसके अंदर जो चाहत थी उसके प्रति, वह उसी तरह झर गई है, जैसे पतझड में पेडों से पत्ते झर जाते है और फिर उसे खाली हो चुकने सी प्रतीति होने लगी - कैसा महसूस करती होगी खाली, वीरान टहनियां? जब उसकी नंगी बांहे खाली आसमान की ओर उठी हुई हो सिर्फकुछ मांगती सी दया या भीख जैसे कोई चीजनहीं, वह नहीं मांगेगी और उसने अपनी खाली बांहे वापस अपनी ओर समेट ली थी। वह फूली नही, फली नहीं, कुण्ठित नहीं हुई, तो यह उसका कसूर नहीं। वह क्यों इसके लिए शर्मिदा महसूस करे?
कदम नहीं उठे थे किसी के और वह सूनी रात सूनी आंखो से उसे तकती रह गई थी।
अगली सुबह उसने जाने की बात ताया से उठाई, तो वह चौंक पडे -
'' पागल हो गया है रे? साधू-संन्यासी तो सारी दुनिया को अपना समझते है, तू तो अपने घर के लिए गैर हो गया। अभी चिता की आग भी ठंडी नहीं हुई होगी और तू जाने की बात कर रहा है। अब कही नहीं जाएगा तू। इन दो औरतो को देख - क्या कसूर है इनका? क्यूं छोडेग़ा तू इन्हे? नहीं जाएगा तू कहीं। मैं कह रहा हूं।'' वे उत्तेजित से हो गए।
'' आपके कहने से रुकूंगा...ऐसी उम्मीद आप न करें। आपकी आज्ञा का उल्लंघन कर रहा हूं, पर मुझे माफ कर दे। मैं सबका अपराधी हूं, पर क्या करूं? मैं नहीं बना इन सबके लिए। अगर ये मेरा कसूर है, तो मुझे माफ कर दे। सबके बगैर दुनिया चलती है, चलती रहेगी, मेरे बगैर भी। मैं कौन होता हूं किसी का? हर इंसान अपना मालिक आप है। मैं तो मर ही गया था इन सबके लिए बारह बरस पहले - वो तो अचानक आपका तार आया औरलगा, जाऊं, पितृ-ॠण से मुक्त हो जाऊं। अब ये सब पिछले जन्म की सी बातें लगती हैं - हम सब अपनी-अपनी कब्रों पर खडे हुए लोग है''
वह शांत स्वर में कहता जा रहा था कि अचानक रुक गया। कहीं ताया यह न समझे कि प्रवचन कर रहा है। उसने उनकी आंखो में देखा - उनकी आंखे भरी हुई थी - फिर उठते हुए बोले '' जैसे ईश्वर की मर्जी। मैं क्या कर सकता हूं?'' और वे जाने लगे - फिर ठिठक गए और दूसरी ओर मुंह किए हुए ही बोले, '' अब आया है, तो बारहवां कर ले, फिर जाना। क्या पता फिर किसी की मौत पर आए या न आए। इतना भी नहीं कर सकता, तो तीन दिन ठहर जा। जरूरी रस्में हो जाए, तो चले जाना।फ्ूल चुन ले कम से कम।''
'' आज रुक जाता हूं, कल चला जाऊंगा'' उसने शांत स्वर में कहां।
सारे दिन मेहमानों का, रिश्तेदारों का, आने-जाने वालों का तांता लगा रहा। उसे लगा, लोग उसे कब्र का मरा समझ उसकी कब्र पर अपनी याद का दिया जला चुके। सिर्फ दो आत्माओं में वह जिंदा हैं जलते बुझते नन्हे से चिराग की तरह।
उन लोगो से ऊब कर वह एक खाली कमरे में चला गया और दरवाजा अंदर से बंद कर पड रहा।खाने के वक्त किसी ने दरवाजा खटखटाया - उसने उठकर खोला, तो दो हाथों ने थाली आगे बढा दी -
'' सुनो, '' उसने झिझकते हुए कहा।
उसकी झुकी निगाहें नहीं उठी। उसने झुक कर थाली जमीन पर रखी और वापस मुड ली।
'' तनु, सुनो'' उसने जल्दी से आगे बढक़र पीछे से उसका आंचल पकड लिया - '' रुक जाओ। नाराज हो तो बुरा-भला कह लो। मैं तुम्हारा अपराधी हूं, पर मुझे माफ कर दो।''
उसने आंचल अपनी ओर खींचा, तो वह आहिस्ता-आहिस्ता उसकी तरफ मुडी, पर चेहरा ऊपर नहीं उठाया, उसने आंचल छोड दिया -
'' यहां से जाने के बाद मैं बहुत भटका, जान नहीं पाता था - क्या सही, क्या गलत, हर वक्त तेरी आंखे पीछा करतीं - आंसूओ से, गुस्से से, नफरत से भरी। लगता, और किसी का हूं या नहीं, पर तेरा बहुत बडा अपराधी हूं।''
उसने सर उठाया, तो वह एकाएक खामोश हो गया - उसकी वीरान आंखो में अजीब सा भाव उतर आया, जिसे वह उस वक्त कोई शब्द न दे सका -
'' एक बात पूछूं''
'' पूछ''
'' तू जो चाहता था, पा लिया?''
'' नहीं, पर मैं रास्ते पर हूं और निराश नहीं हूं। आधा रास्ता तय कर चुका''
'' तू अकेला आधा रास्ता ही तय कर सकता है।'' उसने उसकी बात बीच में ही काट दी और बर्फ से ठंडे स्वर में बोली, '' तू बहुत बडा स्वामी हो गया है न। जिन प्रश्नों के उत्तर के लिए तू भटका करता था, उसके उत्तर मिल गए होगे। आज मेरे एक सवाल का जवाब भी देता जा। तुम लोग औरत को हमेशा रोडा क्यो समझते हो? संसार में उसे साथ लेकर चलने में सार्थकता पाते हो। जब संसार से विचलित हुए, तो सबसे पहले उसे छोडा। पूंछ सकती हूं - क्यों? औरत क्या सिर्फ सोने के काम आती है? तुम्हारे देवपुरुषों ने जब तक औरत चाही, रखी, फिर अनचाही समझ किनारे कर लिया। तुम रख सकते हो, छोड सकते हो, क्यों? हम नींव के पत्थर है तरुण, जिस पर तुम्हारे भवन खडे है। जिस कोख से पैर निकाल कर खडे होते हो तुम, उसी को उजाडते हो - यहीं कहता है तुम्हारा धर्म?''
वह स्तब्ध सुन रहा है। उसकी सांसो की गति तेज हो गई है।

'' तेरे जाने के बाद मैने तेरे धर्मगुरुओं को पढा। सोचा, अगर मोक्ष ही अंतिम सच है, तो जान ही लूं जरा। तुम्हे पता है न, बुध्द ने स्त्रियों को दीक्षा देने से इंकार कर दिया था और जब उन पर इस बात का जोर डाला गया, उन्होने समझौता करते हुए कहा,'' अब यह धर्म पांच सौ वर्षों से ज्यादा नहीं चलेगा। महावीर ने स्त्री के लिए मोक्ष की संभावना से इंकार कर दिया कि जब तक वह पुरुष-पर्याय के रूप में जन्म नहीं लेती, उसे मोक्ष नहीं मिल सकता।''
वह सांस लेने के लिए रुकी -
'' मुझे मोक्ष नहीं चाहिए। इस बात का जवाब चाहिए कि तुम्हारा धर्म इतना हेय क्यों समझता है स्त्री को?''
वह अपराधी सा खडा रह गया। इस बात के बहुत जवाब हो सकते है। उन जवाबो के बहुत सारे प्रर्श्न फिर उसके जवाबमानव-अस्तित्व स्वयं एक प्रश्नचिन्ह है
" घर तुम्हारे कंधों पर होता है। जब तक चाहा, उठाते रहे। नहीं, तो भार समझ छोड दिया कहीं भी, पर वही हमारे हृदय में होता है। हम उसके बिना नहीं हो सकती तरुण। जानती हूं, तू जाने के लिए आया है, जामैं तुझे शाप नही दूंगी, पर जिस तरह तूने मुझ पर जीवन का भार डाला है, तुझ पर कोई न कोई भार होगा ही। तू मुक्त नहीं हो सकता। कोई पुरुष औरत से मुक्त नहीं हो सकता। मैं तो फिर भी तुझसे कम निर्दयी हूं। जिस बोझ से घबरा कर भागा, उसे सहजता से उठाने चली - बोझ तो तेरा था न वह। तू नश्वर इंसान को अनश्वर बनाने चला और मेरे दु:खों को अनश्वर कर गया। नहीं, मैं तेरा पल्ला पकड क़र न्याय नहीं मांगूगी। जो अपने लिए, अपनी जन्मदात्री के लिए न्याय न कर सका, वह मेरे लिए क्या करेगा? जिस अनश्वरता को तलाश रहा है तू, क्या उसे पा लेगा? तू फिर-फिर लौटेगा और उसे फिर-फिर खोजेगा। यह एक जन्म में नहीं मिलता - जन्मों की दौड है यह - और इसके लिए घर छोड क़र भागने की भी जरूरत नहीं - लगन हो पक्की, तो कहीं भी, कुछ भी हासिल कर लो।''
उससे एकाएक कुछ बोलते नहीं बना। खुद को संभालकर उसने जैसे ही बोलना चाहा, पाया - वह जा रही है
अगली सुबह जाने की तैयारी में वह। अलस्सुबह उठ जरूरी संस्कार कर अंदर कहलवा दिया। मां ने सुना, वह जा रहा है। उन्होने न बुलाया, न पास बिठाया, न कंधे पर ढलक कर रोई, न मिन्नतें कीं - मत जा
वह मानों हाजिर होकर भी गैरहाजिर है। उनकी उम्मीदों, आशाओं, सुख-दुख, हंसी-रुदन के घेरों से बहुत दूर पराया सा....पराये संसार का वासी।
'' मां मैं जा रहा हूं।'' वह उनके पैर छुने झुका, तो वह पीछे हटर् गई '' न-न, मत छू मुझे। मेरा बेटा कहां रहा तू? स्वामी हो गया है। जा-जा तेरा ईश्वर तेरी प्रतीक्षा कर रहा होगा''
उन्होने अपनी हिचकी दबाने के लिए आंचल मुंह पर रख लिया। फिर रोते हुए बोली,'' उससे मिलकर आया है?''
वह सर झुकाए द्वार पर खडा रहा। मां ने मुंह अंदर करके आवाज दी,'' यह जा रहा है, तनु।''
'' जाने दे मां, यह फिर-फिर लौटेगाफिर-फिर जाने के लिए''
- जया जादवानी
सितम्बर 23, 2001

फितना

फितना
इधर नौरंगी कुछ रोज से बहुत परेशान था। आँखों में न जाने कैसी वीरानी उतर आई थी, जो सनीमा के प्रीत-प्यार के गाने सुन कर और गहरी हो जाती थी। बहुत दिन पहले कानपुर में दंगे हुए, तभी उस रेलमपेल में उस के हाथ एक टेपरेकॉर्डर लग गया था। पार साल बस में कहीं जाते हुए ड्राईवर की नजरों से खूब नजरें मिलाते हुए जो कैसेट उठाई थी, वही अब उसकी जान का अजाब हो गई थी।
'' इस ससुरे अताउल्लाह खाँ ने सारी गजलें मेरे ही लिये गाई हैं क्या? ''
अकसर रो-रो कर हलकान हो जाने के बाद वह अपने आप से पूछता। शौकिया हज्जाम से गुजारिश कर जो कानों के पीछे लम्बे बाल रखवाए थे, अब जैसे उसके जोगी हो जाने का सबूत थे। पूरी रात पूरा दिन खटिया पर गुडा-मुडा पडा रहता, घर भर की बातों का हाँ-हूँ में जवाब दे करवट बदल लेता। माँ की मिरचों की धूनी और चौराहे पे सतनाजे के टोटके भी जब यूँ ही होकर रह गए और नौरंगी की आँखों की वीरानी और-और बढती गई, तब दिन भर की प्लास्टिक की फैक्ट्री की मजदूरी और दमघोंटू धुँए से आजिज आया बाप दहाडा,
'' दुई लात लगा दे तो एकरा दिमाग ठिकाने पर माँ ने बाप की दुलत्ती को फिलहाल यह कहके पोस्टपोन करवा दिया कि, अबहीं तेल देखो तेल की धार देखो। जवान लडक़ा के कहीं अहसन? मुदा कहीं चलईं गए तो का करोगे? ''
और नौरंगी के चेहरे पे गीत-गजल सुन के कभी एक आध, बाज दफा पूरे नौ के नौ रस उतरते रहे। बेशक इनमें करूणा का रस प्रधान होता जब वह अताउल्लाह खाँ की गज़ल इसक में हम तुम्हें काबताएँ आवाज में आवाज मिला कर गाता। फिर बाईस नम्बर बीडी क़े कितने खाली बन्डल खटिया के पास से सुबह माँ बटोरती और मुहल्ले भर को कोसने भेजती, अईसन सुन्दर रहा हमार बिटुआ,कौन जाने किसके दीदे जले रहें।
यूँ सबको पता था कि ये इसक की चोट गली के नुक्कड पे परचूनी लाला की बिटिया ने दी थी नौरंगी को।
परचूनी लाला को जैसे बस्ती का हर बच्चा नाल काटने के वक्त से जानता है। किसी जेल की काल कोठरी जैसी बित्ते भर की दुकान में जैसे मालो असबाब की पूरी लंका बसा रखी थी लाला ने। बच्चों का पेट चल जाने पर दी जाने वाली हरड से लेकर सुखी विवाहित जीवन के भी सारे रामबाण अचूक उपाय थे वहाँ। दाल, चीनी, नमक , तेल, सूजी और गुड क़ी बोरियों के बीच लाला पटरे पर कहाँकैसे अटका था, बस ईश्वर का ही चमत्कार था। तेल से चीकट बनियान पहने लाला का घर से दुकान और दुकान से घर का कभी न टूटने वाला क्रम बाप के मरने पर भी नहीं टूटा था। सात बजे मरे बाप को आनन-फानन में बारह बजे तक निपटा कर एक बजे दुकान पर पहुँच गया। दबी-दबी जुबान में किसी ने लोक लाज की गुहार लगाई तो लाला का फलसफा जैसे मुँह सिल गया सबका,
'' देखा भैया, पिताजी ऐन मरे के वखत कहे रहे कि बिटुआ दुकान पर बैठे का फरज आज से तोहार है और ई टूटना ना चाही। तो आज का जो कल होता तो अभी-अभी जन्नतनशीं हुए बाप की ताजी रूह इस सदमे को कैसे झेलती। ''
किसी ने समझा, किसी ने नहीं, पर फिर लाला को टोकने की हिम्मत किसी की नहीं हुई। इसी परचूनी लाला की शोख मोटी-मोटी आँखों वाली बेशक मोटे-ताज़े जिस्म की मालिक बेटी ने बेचारे दुबले-पतले नौरंगी को कब आँखों के रास्ते से कलेजे तक घायल किया, मुहल्ले तो मुहल्ले खुद नौरंगी तक को पता न चला। उस गरीब को तो बस दिन याद है , मंगलवार था। दिन भी यूँ याद रह गया कि माँ ने जब परशाद नौरंगी के हाथ में रखा तो पतंग के पीछे पगलाए उस नामुराद ने हथेलियों की अंजुली न बना बेपरवाही से एक ही हाथ में परशाद झपट लिया था और जीने की तरफ पैर बढाया था कि माँ न उसे इस बेपरवाही पे हैजा, ताउन हो जाने के कतई जाने पहचाने शाप दे दिये थे जो कभी फले नहीं थे।
'' परशाद का अपमान करोगे तो बजरंग बली का कहर टूटेगा। ''
और उस दिन जो कहर छत पर नौरंगी पर टूटा वह खुदा का नाजिल किया हुआ ही था। वरना नौरंगी क्या ऐसा था कि किसी देसी साबुन से धोई जुल्फों के पेंच में फँस जाता और फँसता तो ऐसा कि जीना तो जीना मरना भी मुहाल हो जाता। पर छत में बाल सुखाने को खडी लाला की बेटी रसवंती में उस दिन नौरंगी के कमरे की पूरी ही तो दीवार हथियाए अधगीली साडी में लिपटी हीरोईन पोस्टर से उतर कर बस गई थी और बेचारा नौरंगी जब छत से गई शाम नीचे उतरा तो, पैर किसी लम्बी बीमारी के बाद उठे रोगी से काँप रहे थे। हलक सूखा था जो नीचे आकर छह सात गिलास पानी पीकर भी सूखा ही रहा।
फिर दिन गुजरे, हफ्ते गुजरे। नौरंगी पतंगे थाम सुबह से छत पर आ बैठता। पतंगें उडतीं, पेंच लडते और विरोधी खेमे के पंतगबाज भौंचाए से नौरंगी की कटी पतंगे सहेजते।

पेंच आसमान में होते और नौरंगी की आँखे छत पर कभी पापड क़भी धनिया तो कभी लाल मिर्च सुखाती रसवंती की बिना पतंग की डोर में ऐसी उलझतीं कि इसी डोर में गरीब का दिल उलझा उसकी छत पर जा गिरता और आसमान की पतंग दुश्मन लपक लेते। इस दुतरफा नुकसान को झेलता नौरंगी रोज सुबह शाम जीना चढता रहा। आसमान में बादल होने पर बीडी क़ी तलब लिये लाला की दुकान पर आता तो आँखे उस दरवाजे पर लगी रहतीं जो घर और दुकान को जोडता था। हाथ में चाय का लौटा और स्टील का गिलास थामे रसवंती आती भी और बाप को चाय थमा चट से चली भी जाती पर नौरंगी के बीडी क़े धुँए के छल्लों में उसके नक्श बनते और बनते ही रहते,बिगडते यूँ नहीं बस कि गम का मारा नौरंगी बीडी बुझने कहाँ देता था।
यह लुका-छिपी का खेल चलता ही रहता अगर ईश्क में रसवंती ने खतोकिताबत का सदियों पुराना सिलसिला शुरू न किया होता। नौरंगी हर्फों से उलझ कर रह गया और रसवंती ने घडे क़े ठीकरे में जो कागज लपेट कर उसकी पीठ पर दे मारा, उसने सारा मंजर ही बदल दिया। खत लिखती हूँ खून से स्याही न समझना का हौलनाक काम लडक़ी ने लिखा ही नहीं था, कमबख्त ने कर भी दिखाया था। याद आया नौरंगी को कि आज सुबह छत पर कपडे सुखाते में उसने उसके हाथ की तर्जनी पेबँधी पट्टी देखी जो थी, कलेजा मुँह को आ गया नौरंगी का। आँखों के आगे छाया अँधेरा खत की आखिरी लाईन पर आकर और भी गहरा गया। कल शाम घूरे बाबा के मसान पर मिलना।
बित्ते भर की छोकरी और ऐसी हिम्मत! घूरे बाबा के मसान की तरफ तो लोग दिन में जाते कतराते थे तो शाम को। भूत , चुडैल, डाकिनिया, पिशाच सभी तो बास करते हैं वहीं, अम्मा ने बताया था नौरंगी को। पूरी रात घिघ्घी बँधी रही नौरंगी की। सुबह हुई तो लगा साँस ठीक से आ-जा नहीं रही। क्या-क्या ना करके साँस को सिलसिलेवार किया नौरंगी ने दोपहर तक। पर शाम आते आते वही आलम। अलगरज उलझा-उलझा सा नौरंगी उन्हीं उखडी सांसों के साथ मसान पर पहुँच गया,जहाँ वह पहले से मौजूद ऊँचे चबूतरे पर बैठी पांव हिला रही थी। नजरें मिलीं और न जाने कौनसी बिजली लपकी कि बिचारे नौरंगी की आँखे जमीन में जा गडीं।
''देखो ना हमारी तरफ..'' की सीधी-सीधी फरमाईश पर भी लोक लाज के सताए नौरंगी ने अपनी आँखे न उठाईं तो कयामत ही टूट पडी। ऐसी बेजा हरकत उसके साथ आज तक न हुई। तब भी नहीं जब लुका-छिपी खेलते उसने नीम अँधेरे का फायदा उठा कर पडौस की धनपतिया को चूम लिया था। पत्ते सी काँप गई थी लडक़ी। छोडो कोई देख लेगा कह कर वह घर की तरफ लपक ली थी। फिर एक दो दफा ऐसे मौके आने पर कोई देख लेगा का मीठा डर नौरंगी के पूरे जिस्म में सनसनी फैला जाता था। उसके अन्दर का मर्द गहरा सुकून महसूस करता था कि वह डर किसी लडक़ी को उसका दिया हुआ है। प्यार के लम्हों में अपने पूरे वजूद को एक पूरे माहौल पर छाए देखने के आदी नौरंगी को यह गहरा झटका लगा जब उस शोख, बिंदास लडक़ी ने उसके होंठ चूम लिये और वह घबरा कर चिंहुक उठा, '' एए...कोई देख लेगा। ''
'' कोई नहीं देखेगा, और देखता हो तो देखे..'' का जंगी ऐलान करती वो उसके सीने पर पसर गई। नौरंगी हाय-हाय करता रह गया और वह उसके तमाम सीखे-सीखाए, किताबों से जहन में दर्ज हुए ईश्किया दरसों पे झाडू फ़ेर कर उसे आँधी के बाद तहस-नहस हुए शहर सा छोड क़पडे झाड यूँ चल दी मानो कुछ हुआ ही न हो। लुटा पिटा नौरंगी घर लौटा तो दरवाजे पर ही अम्मा ने माथे को छू के बहुत तेज ताप का अनुमान लगा लिया। लाला की दुकान से मँगाई आनंदकर की दवाई और रात भर अम्मा का पट्टी पे पट्टी बदलने का जतन भी इस बुखार को तोडने में नाकामयाब रहा। सुबह ही माँ ने बाप को किसी भूत पिशच का असर होने के खौफनाक अंदेशे से वाकिफ करवाया। चूँकि नौरंगी रात भर इस बुखार में कैसी-कैसी आवाजें निकाल रहा था।
'' छोडो देखो कोई देख लेगा.. '' कह के नौरंगी ने जब माँ का सीने पर रखा हाथ दबा दिया तो जानकार अम्मा को समझने में पल न लगा कि हो न हो, भूत कोई औरत का है। पर बुखार टूटा छत पर जाकर, जब अपनी छत की बरसाती की ओट में खडी रसवंती ने अपना निचला होंठ दाँतों में काट कर फिर वहीं मिलने का इशारा किया। अजब बुखार था। सुबह उतरता तो शाम होते होते उसका पूरा जिस्म तपने लगता। उस तूफानी बला के सामने पहुँचते ही उसका सारा वज़ूद जैसे भट्टी हो जाता था।
शुरू के दिनों में ऐसे मौकों पर नौरंगी हनुमान चालीसा का पाठ करता पर जब उस शैतान की खाला ने कतई बेहतियातन तरीके से उसे ईश्क के मजे देने शुरू किये तो नौरंगी ने बजरंगबली को इस मुआमले से हटा दिया। बिचारे ब्रह्मचारी की भी क्यों मिट्टी खराब करवाऊँ अपने साथ। सो बिना किसी देव या भगवान की ओट के सीधे-सीधे इस तूफान के हवाले खुद को करता रहा नौरंगी। रोज-रोज घूरे बाबा के मसान पर धूनी सा तपते उसके जिस्म का पोर-पोर रफ्ता-रफ्ता इस अघोरन के पास गिरवी हुआ जा रहा था। यूँ वो खास कुछ करती नहीं थी, पर कपडे निहायत गैरसलीकेदार पहनती थी। कुर्ते का गला ऐसी बेहूदगी से नीचे तक कटा रहता कि एकाध दफा नहीं बल्कि कई दफा नौरंगी मुँह के बल गहरे गङ्ढे में गिरता-गिरता बचा। पीठ पीछे से इतनी नंगी कि उसे गले से लगाए उसके हाथ जब भी उसकी पीठ के उस हिस्से को छूते तो जैसे हजारहां चींटियाँ उसके बदन पर रेंगती रहती। कभी साँस आती कभी जाती और वह एक टेमर की तरह अपनी आँख के इशारे से जरूरत के पिंजडे में कसे इस शेर को बस जिन्दा भर रहने के लिये दो बोटियाँ दे अपनी राह लेती।
भूख दहाडती रही - दहाडती रही। और इसी बीच कहर यह टूटा कि न जाने कैसे घूरे बाबा के मसान पर जलने वाली इस रोजमर्रा की धूनी का धुंआ लाला की नाक ने सूंघ लिया। सो इस किस्से की इब्तदा में दर्ज नौरंगी का यह बेहाल हाल उसी दौर की दास्तां है, जब रात होने पर बुखार चढा तो,पर घर में ताले में कैद रसवंती के न दिखने पर नहीं उतरा। बौराया नौरंगी रोज धूनी पर जाता,लौट आता। आँखे रात-रात भर जाग कर जेसे सुर्ख अनार हो गईं थीं। उसे किसी का होश न था,न खबर थी। यह खबर भी नहीं कि इसी मुद्दे पर लाला और उसके बाप में आज सुबह खूब जूतमपैजार हुई थी। एक दूसरे की माँ-बहन को चौक में इकट्ठी भीड क़े सामने जलील कर दोनों अपने-अपने धंधे पर लौट गए थे। नौरंगी छत से आँगन, आंगनसे गली और गली से फिर घर के चक्कर लगा-लगा कर पगला गया।
यूँ पडौस की धनपतिया भी थी, मुसद्दी चाचा की रधिया भी थी जिसके साथ बीते साल नौरंगी ने सनीमा देखा था। सनीमा क्या देखा था, बस अँधेरे में जरा हाथ आजमाये थे और पूरी फिल्म के दौरान सैकडों बार कोई देख लेगा छोडो ना का दिलनशीं जुमला सुना था। पर आज कोई भी, कोई भी तो नहीं चाहिये था उसे रसवन्ती के सिवा। कभी-कभी उसे लगता था कि बोटियों की दी हुई इस भूख को झेलने से क्या ही अच्छा होता अगर वो एक ही झटके में पूरी की पूरी रसवंती को निपटा देता पर दिल में जानता था कि कयामत कर देती वह। कौन जाने इन बोटियों से भी महरूम कर देती वह। यूँ शायद वो आम औरत है भी नहीं। आम औरतें तो उसकी अम्मा की तरह होती हैं, जो रात में कैसे भी इधर-उधर असामान-असबाब की तरह बिखरे बच्चों से पैरों को बचाती बाप के कमरे में जाती हैं और पन्द्रह मिनट बाद लौट भी आती हैं। ऐसे प्यार कैसे हो जाता है?
उस पर फाश हो गया था तमाम किस्सा कि कुछ भी पूरा पा जाने के बाद किसी अनछुए की प्यास मर्द के हाथों की लकीरों में दर्ज होती है। बेमुरव्वती से पटके पेट भर गोश्त से कहीं बेहतर लगती है रूह को तस्कीन देने वाली वो बोटियाँ जिनमें प्यार के वो मजे होते हैं जो अकसर इन्सान और खुदा का ताल्लुक आसान कर देते हैं। थोडे पर भी पूरा पा जाने की खुशी, फुरसत और तजुर्बों की चाशनी में पगी हुई।
दिन, हफ्ते। रसवन्ती नहीं दिखी तो नहीं दिखी। कहीं कोई मौका दिखता न था। यूँ महाराजिन से पता चलवा लिया था नौरंगी ने बख्शीश देके कि रसवन्ती के लम्बे-लम्बे बालों में खूब ढेर सारा तेल डाल के जब भी उसकी माँ चुटिया बनाती है तो यूँ ही ऐहतियातन बाल खींच के उसे सुबह शाम नाना किस्म के श्राप देती रहती है। इन दिनों रसवन्ती का घरेलू नाम रस्सो कम पुकारा जाता था। मुँहजली, करमजली, निगोडी क़े हाल ही में अता हुए नामों में बदस्तूर इजाफा हो रहा था। और लडक़ी ऐसी ढीठ कि मजाल है, मुँह से कुछ फूटे..।
'' कहाँ मिलती थी? कहीं मुँह तो नहीं काला करवा लिया? '' के तमाम सवालों पर वह पैर के उसी अँगूठे से जमीन कुरेदने लगती, जिस अँगूठे को नौरंगी के पैरों की अँगुलियों में फँसा कर उसे बजरबट्टू सा घुमाया था लडक़ी ने।
न जाने कब तक यह चलता रहता कि भगवान ने जैसे खुद आकर मोर्चा सम्हाल लिया इस असंभव काम का। हुआ यूँ कि एक दोपहर तमाम घरों के ताले धमाधम बन्द होने लगे। मुद्दतों तक हिन्दुस्तान में बहने वाली भूली-बिसरी दूध की नदियाँ आज फिर बहने लगी थीं। जिसे देखें दूध का लौटा लिये मंदिर की तरफ भागा जा रहा था। नौरंगी की माँ भी गई, भाई-बहन भी गए। गणेस जी की ' दूध की ललक आज कैसे भी बुझती न थी। धनपतिया की माँ, इसकी-उसकी चाची, ताई,बुआ, फूफी सब ही तो अपने-अपने हिस्से का पुण्य बटोरने में लगे थे। ऐसे में न जाने कैसे लाला की बुध्दि में भी बैकुण्ठ का मोह पसर कर बैठ गया। ललाईन को ले उसने भी मंदिर की राह ली पर जाते-जाते दरवाजे पर पिता जी के जमाने का अलीगढ से खरीदा वह ताला ठोंक दिया जिसका किस्सा मुहल्ले वाले यों बयान करते हैं, आज भी नुक्कड पर कि चोरों के तमाम औजार फेल कर दिये इस ताले ने। कोई लोकल मेड ताला होता तो दुअन्नी न बचती लाला के घर। बस इसी ताले के भरोसे रह गया लाला और जब दूध के कईयों चम्मच अपनी बेटी का नौरंगी से कैसे भी पीछा छुडाने के एवज में गणेश जी को पिला कर वह लौटे तो चिडिया उड चुकी थी। रोने पीटने के बाद लाला ने अनुमान लगाया कि शायद जल्दबाजी में वह चाभी को पूरा ताले में उमेठना भूल गया होगा।
उधर रसवंती न जाने कौन से गाँव में और किसके घर में कपडों की गठरी सी बँधी-बुँधी बैठी थी। सब कुछ ऐसी जल्दी में हुआ कि उसे तो याद है बस रिक्शा में नौरंगी के दोस्त सदाकत अली की बहन का बुरका पहन के स्टेशन तक आना, वहाँ नौरंगी का मिलना, फिर रेल की धुक-धुक। किसी स्टेशन पर उतर कर सूने प्लेटफार्म और बाहर आने पर ढोरों-डंगरों की आवाजों से, खेतों से अन्दाजा लगाया कि कोई गाँव है। वहाँ से सीधे गाँव की सीमा पर बसे एक छोटे मन्दिर में नौरंगी ने जब उसे गणेश जी की मूर्ति के आगे न जाने कब का खरीद कर रखा चाँदी का मंगलसूत्र पहनाया तो रसवन्ती की आँखों में प्यार के ढेरों-ढेर दरिया उमड आए वरना अब तक तो बराबर उसे उन तमाम लडक़ियों की याद आती रही जो घर से भागने के बाद मुंबई के फारस रोड पर अपने शहर के लोगों ने ही देखी थीं। सुकून और इत्मीनान के चनाब में उसने अपने आपको फिर ढीला छोड दिया था। जहन अब किसी डर से आजाद था, रूह किसी दोशीजा का पाक साफ दामन थी। किसी दोस्त के घर लाया था उसे नौरंगी। घर की औरतों ने उसे अपनी किसी अज़ीज़ा सा पहलू में लपक लिया। दोस्त की अम्मा ने दरवाजे पर उससे पानी में सिक्का डलवा कर उसे बकायदा एक बहू का दरजा दे दिया था। तमाम दिन किसी रौनकखेज सिलसिले के मानिंद गुजरा। फिर जब उसे घर की सबसे अलग कोठरी नुमा लेकिन साफ सुथरे कमरे में बिठा घर की औरतें चली गईं तो रसवंती को पहली बार अम्मा पिताजी की याद आई। आँसू छलके तो पल्लू में जज्ब हो गए। माँ-पिताजी के साथ ही याद आगई थी घूरे बाबा के मसान की। एक बिजली सी लपक गई उसके पूरे बदन में। न जाने कब तक अपने ही माजी क़ी यादों में मुब्तिला गुलनार होती रही कि कमरे में आकर नौरंगी उसके पास बैठ गया। गठरी और सिकुड ग़ई भीगी हुई, जैसे किसी ने अभी-अभी घाट पर धुले कपडों की बिना सुखाए पुटलिया बाँध दी हो।
अजीब चुप्पी थी, नौरंगी हैरत में था। भला इतनी देर उससे ऐसे दूर कहाँ बैठती थी वह। इत्ती सी देर में तो वह घूरे बाबा के मसान पर जाने कै दफा इसी रसवंती ने लगभग उसकी इज्जत पर हमला ही बोल दिया था। पलंग की पाटी पर जैसे-तैसे टिका नौरंगी धडक़ता दिल और उखडती सांसोंवाला वही नौरंगी था, जो मसान पर अपने साथ हुए कतई गैरशरीफाना हादसों का जिक़्र अपने करीबी दोस्तों से भी यूँ नहीं करता था कि कौन यकीन करेगा। फिर आज क्या हो गया है? हैरान परेशान नौरंगी ने जैसे-तैसे थूक गटकते हुए पूछा था, कोई खता हो गई का हमसे? गठरी थोडी हिली, फिर सिमट गई। अब चौरंगी का कलेजा हिल गया। जैसे-तैसे हौसला करके उसने चादर के भीतर हाथ डाल कर उसके मुँह को उपर उठाया तो चौंक गया। दूर-दूर तक भी उन मोटी-मोटी आँखों में कहीं कोई अध्दा या पव्वा नहीं था जिसे पीकर वह हमेशा से होश खोता आया था। पलकों की कोरों पर दो सितारे टिमटिमा रहे थे, जो यकीनन आँसू थे, यह नौरंगी ने अपने होंठों में उन्हें छुपाने पर जाना। फिर आहिस्ता से दो होंठ हिले,
'' हम वैसी नहीं हैं जइसन तुम समझते हो। हम जानती हैं तुम क्या सोच रहे हो, पर हम और का करते? लखपतिया थी, धनपतिया, सरोज थी, ऊषा थी और भी न जाने कौन-कौन रहीं। सबने ही बताया था हमें कि तुम बोले थे उन्हें कि यह कोई देख लेगा क्या होता है? प्रेम में कैसा डर? हम भी जो यह कहते तो उनकी तरह हमें भी न छोड देते तुम? तुमसे प्रेम करते थे सो अपनी लाज सरम सब आज तक के बख्त के लिये भूल बैठी थीं। पर अब हमसे न होगा। हम वैसी नहीं हैं। ''
जाने कितने रोज, कितने हफ्तों, कितने महीनों से भूखा शेर अपनी भूख बिसरा पूँछ दबा कर बैठ गया था। आसमान के चाँद ने उस रात एक जानवर का इन्सान में तब्दील हो जाना खूब देखा था। उस रात बिस्तर पर रात भर जो एक दूसरे से दीवानावार लिपटे पडे रहे, वे आदम और हव्वा अपने-अपने जिस्मों के साथ ही नहीं रूह से भी एक थे। सुबह लडक़ी की पलकें चूमते मर्द ने नींद में खो जाने से पहले डूब कर कहा था, मैं तो शुरू से जानता था, तुम वैसी नहीं हो।
- सीमा शफक़
अप्रेल 1, 2001
प्रेम से पहले
पार्टी की भीड पर उसकी नजरें फिसल रही थीं। उन्हें खोजना मुश्किल मालूम हुआ। जहां आंखों को अटना था। वहीं चेहरा ओझल था। फुरफुरी की तरह निराशा व्यापने लगी। तो तो वे आए नहीं! ऐसा कैसे हो सकता है?
हो तो सकता है। जिस पद पर वे कार्य कर रहे हैं, अर्जेन्ट कॉल के झमेले पडे ही रहते हैं। लेकिन सूचित तो कर ही सकते थे। करना चाहिये था।
हताशा से सिर फटता - सा लगा। उन तक पहुंच पाना उसके लिये हमेशा ही मुश्किल रहा है। शुरुआत से ही। सबकुछ अनिश्चित, संदिग्ध सन्देहपूर्ण। सन्देह के रहस्य में मिलने पर कभी उल्लासपूर्ण ताप चढ ज़ाता तो कभी उचाट ठण्डापन। निष्कर्ष तक न पहुंच पाना उसे बहुत क्षुद्र और कातर कर जाता। उनके व्यवहार में कुछ ऐसा अनिश्चय था कि वे उसे कभी बहुत करीब और कभी दूर खडे अजनबी की तरह लगते थे। कभी झलझलाती रंगीनी भरी तबियत तो कभी खाली मटके सा भाखता रीतापन। अपने मूड का उनके रिस्पॉन्स पर आश्रित होना उसे बहुत अपमानजनक लगता। कई बार गुस्से में बडबडाई है ऐरोगेन्टसेल्फिश, टाइमकेलकुलेटिंग मेन!
क्यों आलतू - फालतू सोच कर मन मलिन कर रही है? उसने सख्ती से बिखरते हुए मूड को कसा और एकाग्र हो दुबारा छितरी भीड क़ो आंखों में समेटने लगी।
'' हैलो! क्या देख रही हैं, लंच लीजिये ! प्लीज'' मिस्टर सिंह थे।
'' कुछ नहीं।'' हकबकायी सी वह अपने फीके चेहरे को मुस्कान से सायास सहज करती हुई उनके साथ घिसटते हुए तकल्लुफी बातों में अपने आप को खपाने लगी।
'' गुड गॉड।'' वह दूर - दूर तक देख रही थी। वे अब करीब ही थे। उसकी दाहिनी ओर की सर्विस टेबल के पास प्लेट पकडे हुए किसी से बतिया रहे थे। वह मिस्टर सिंह को दरकिनार करते हुए आतुर कदमों की डगमग चाल से उन तक पहुंची।
'' कब आयीं?''
'' कुछ देर पहले।'' कहकर वह अभिमुख थी। उनके आस - पास की भीड से चेतस जबरन सादा मुस्कुराहट में भी उसे व्यंजना भरे अर्थ की कौंध लपकती - सी लगी। वह गुस्सा भूल सहज हो गयी। स्तब्ध आंखों की टकटकी जब झेली नहीं गई तो झंपायी - सी सामने दहकी धूप में चटकीले फूलों की सघन क्यारी को निरखने लगी। वे लोग पहले भी मिलते रहे हैं। औपचारिकता से बंधे विभागीय बैठकों में। परसों ही उनका फोन आया था।
'' तुम आओगी? पार्टी में वहां से कहीं चलेंगे हमें बात करनी चाहिये। वी मस्ट''
'' आर यू सीरियस?'' बात काटते हुए वह अपना सन्देह जुबान पर लाने से रोक न पाई थी।
'' तुम आओगी तो बात करेंगे, प्रॉमिस।'' और फोन चुप पड ग़या था। उसका जवाब श्योर ' उसके कण्ठ में ही अटका रहा गया था।
'' लन्च नहीं लोगी?''
'' लन्च लेकर ही चली थी।'' बिना सोचे - समझे मुंह से निकल गया। लंच पार्टी का निमन्त्रण हो तो कोई ऑफिस से लंच लेकर निकलता है? अपनी गडबडाहट पर वह स्वयं विस्मित थी।
'' कुछ स्वीट ही ले लो।
अधीनस्थ की तरह आदेश की अनुपालना में यंत्रचालित सी उसने प्लेट उठायी और टेबल की ओर बढ चली। अब वह उनके सामने लॉन में कुर्सी पर बैठी हुई चम्मच से छोटे - छोटे कौर निगल रही थी।
कुछ दिनों से वह परेशान थी। असमंजस में थी। भीतर से उठती चेतावनियां। तुम फिर खतरा उठा रही हो। दांव पर लगा रही हो अपनी स्वतन्त्रता निजता। वह बहरी बनी हुई थी और प्रतीक्षा के आकुल तनाव में थी। कभी - कभी हम बेसबरे होकर प्रतीक्षा भी करते हैं और सद्य: जन्मे बच्चों की तरह घटित नये संसार में प्रवेश के डर से मुट्ठियां कसे रहते हैं। दो आसक्त व्यक्तियों का अपनी अपनी खूंटियों से छिटक कर मुठभेड क़ी आत्मविध्वंसक घटना। संघर्षण की चकाचौंध चिनगारियों से नजर चुरा लेना मुश्किल है। इस दुर्घटना के बाद ही सम्बन्ध की नींव पडेग़ी। असहनीय जान पडता है सब कुछ, कल्पना का सच ज्यादा विकराल होता है। घटित न होते हुए भी मानसिक आवर्तन के कारण हमेशा ग्रसित किये रहता है वह हैरान और आकुल थी। रसज्ञता के मुहाने पर विगत जीवन के विषाक्त अनुभवों के पत्थर क्या पिघल गये हैं? मरणासन्न कर देने वाली घुटन से वह तलाक द्वारा निजात पा चुकी है।
जीवनयापन की आत्मअन्वेषित शैली में नियोजित - व्यवस्थित हो गयी है। दुबारा भावुकता के दलदल में खुद को लथेडना फिर खुद ही अपनी आशंकाओं का प्रतिवाद करने लगी। पत्थर की लकीर से ढले व्यक्तित्व का क्षरण कहीं संभव है? यह तो जीवन में सरसता की छोटी सी मांग है। जिसे स्वीकार कर वह आज यहां उनके बुलाने पर आ गई है।
सोच के बोझिल अन्धड से अकुलाई आंखें उनके चेहरे पर केन्द्रित हो गयीं। जैसे सारी उहापोह और शंकाओं का समाधान उनके चेहरे पर लिखा हो। क्या ये ही हैं सचमुच मैं आकर्षित हूं, चाहत में हूं?
उनका प्लेट पर झुका चेहरा ऊपर उठा। अब उसकी प्लेट पर सिर झुकाने की बारी थी। क्या अब सोचने और निर्णय लेने को कुछ नहीं बचा है? संशय के ये कैसे फनफनाते पल हैं जो प्रेम से पहले घुमडते हुए सिर उठा लेते हैं।
एक सज्जन उनसे बात करने के लिये आये। वह भी कुर्सी से उठ गयी। उसका परिचय देते हुए वे दृढता से
माय फ्रेण्ड कह गये। तो उन्हें वह स्वीकार्य है। और उसे ? बेचैनी भरी ऐंठन उठी और वह घबरा कर इधर - उधर देखने लगी।घास शारदीया धूप में गीले पुते रंग सी तरल - चटख थी। कच्ची फुलवारी की कतारें शोख रंगों का झमाझम आलोक बिखेरती हुई इठला रही थीं। हठात् वह चौंकी। उन दोनों की बातचीत तीखी हो गयी थी। बातचीत में से चाकू पर धार चढाते समय जैसे स्फुलिंग छूट रहे थे।
वे सज्जन क्रोध में पांव पटकते हुए चल दिये। वे दोनों वापस अपनी - अपनी कुर्सियों पर थे। वे खासे विचलित नजर आ रहे थे।धीमी लय के साथ नकारात्मक ढंग से सिर को दायें - बाएं घुमाते स्वयं से उलझे हुए थे। ऐसी देह मुद्रा - जब आप जो कहना चाहते हैं, माकूल समय पर कह नहीं पाते हैं। बाद में पछताते हैं।
प्रशस्त पेशानी पर मध्यम वयस की रेखाएं। निखरी आंखों की कोरों पर उम्र की चुगली महीन झुरियां । तीखी नाक। पार्श्व से देखने पर यह तीखापन चुभता सा लगता है। सजग गाम्भीर्य की तनी भावमुद्रा! प्राय: उन पुरुषों में देखने को मिलती है जो अपने ध्येय और उसके कौशलपूर्ण निवाह की सतत चेताना से आदीप्त रहते हैं
अन्तरंग पुरुष द्वैतियक हो ओझल हो जाता है। देखने - जानने वाले को इस आयास सजगता से ही संतोष करना पडता है। लेकिन आज इस मुद्रा में वे उघड ग़ये थे। बेहद साधारण और निरुपाय नजर आ रहे थे।
उन्हें इस मालिन्यपूर्ण मन:स्थिति से बाहर निकालने के उद्देश्य से ही वह हस्तक्षेप कर उठी।
'' क्या बात है? वे कौन थे? ''
'' कुछ नहीं '' कहकर उन्होंने फिर सिर को पछतावे वाले अन्दाज में झटक दिया।
वह उन्हें - बताओ न, बताते क्यों नहीं वाली मुद्रा से कुरेदती रही। वे अनिच्छापूद्र्याक बताने लगे। स्वार्थों के टकराव और पदोन्नति का विभागीय किस्सा। बहस का अन्त ट्रिब्यूनल में केस चलाने की धमकी से हुआ था। फिर स्वयं ही अप्रीतिकर घटना की तात्कालिकता से उबरते हुए बोल उठे, '' चलो ! कहीं चलते हैं।''
बाहर निकलने में ही दस - पन्द्रह मिनट लग गये। एन पार्टी के बीच में से उन्हें जाता हुआ देखकर सभी को उनसे महत्वपूर्ण बात निपटाने की जरूरत महसूस हो उठी थी। बे खीज दबाते हुए लोगों से निपट रहे थे।
उन्हें कोफ्त महसूस होने लगी। इस तरह पार्टी के बीच से उठ कर जाना नोट कर लिया जायेगा। सत्रह - अठारह साल की होती तो दुनिया मेरी जूती की नोक पर की आलम फरेब मुद्रा में कन्धे उचका कर पीछे - पीछे चल सकती थी। मध्यम वयस के पक्केपन में अंजाम की सजगता पांव बांध देती है। भावात्मक आवेग से जुडने में परिपक्वता उतनी ही बडी बाधा है जितना अबोध वय का जोश।सोचते हुए वह उनके खाली होने का इंतजार करने लगी।
कार में बैठते हुए वे मुक्त ढंग से मुस्कुराते हुए बोले, '' सॉरी! बोर किया न तुम्हें।''
'' इम्पोर्टेंट आइडैन्टिटि - आपको तो अच्छा लगता होगा।''
'' लगता है - पर हमेशा नहीं, खासकर जब आप अकेले हो जाना चाहें।''
दोनों मुक्त हास से हल्के हो गये। सामान्य वार्तालाप में अन्तरंगता के सूत्र जुडने लगे। हवा में डोलती अकेली घास की तन्वंगी तने - सी सरसराहट उसे अपने में व्यापती लगी कुछ अचाक्षुष सा घटित होता हुआ छाता चला जा रहा था और वह गहरी सांस लेते हुए बेसुध सी सब समेटते हुए पोसरी होती चली जा रही थी।
अजीब बात थी, अन्त:चेतना का एक अंश उमडता हुआ इस नशे का विरोध करता हुआ चेतावनियां ठोक रहा था। उसे ध्यान आया।अभी जिस व्यक्तित्व के आकर्षण से वह अपने आपको विवश पा रही है, थोडी देर पहले वह कितने साधारण निरुपाय नजर आ रहे थे। और अब जिसे हम जुडना कहते हैं वह आदर्श छवि तोडक़र प्राप्ति का सहज वरण है या उस स्वप्न - छवि की टूटी प्रतिमा का पुनर्निर्माण? वह सचमुच असमंजस का शिकार हो चली थी। क्या वह इस रिजिडनेस को विर्दीण कर भीतरी परत को देखना - भोगना चाहती है?
लेकिन वह उत्फुल्ल - प्रसन्न थी, उनके साथ। यकीनन थी। क्या यही काफी नहीं?
बडे होटलों की चमाचम सजावट उसे हमेशा पटाखों - सी फूटती दु:सह जान पडती है। लप - झप में आंखें बार - बार जा अटकती हैं।सोचने - महसूसने की एकाग्रता भंग हो जाती है।
वे दोनों कॉफी पी रहे थे।
अपनी तरफ एकटक नजरों की बौछार से वह सकुचा गई। गालों पर सुर्ख आंच थिरकने लगी। आक्षेप भरी नजरों से उलाहने लगी। ''क्या देख रहे हो? देखना अब भी बाकि है? '' कुछ कहने की तत्परता क्षणांश भर के लिये उठी। फिर लुप्त हो गयी। आरक्त आंखों में गुलाब के फूलों का रंग था।
'' क्या प्रोग्राम है? ''
'' आप बताइये।'' वह इतना ही कह पाई। आपने बुलाया है, कहने की इच्छा घोंट गयी।
'' नथिंग स्पेशल।'' वे उकसाते हुए शरारतन मुस्कुरा रहे थे।
मुस्कुराहट तो ठीक है - लेकिन वे एक हाथ से दूसरे हाथ का नाखून छील रहे थे। उसने गौर किया। हाथ असामान्य थे - सफल व्यक्तियों की तरह मध्यमा की उंचाई को छूती अन्य उंगलियां। नाखून छीलने की मुद्रा खासी अभद्र थी। उसकी इच्छा हुई उन्हें टोक दे।नाखून इस तरह मत छीलो- इसका मतलब होता है
प्रेम उपजे या न उपजे। अधिकार का अंकुश भाव उससे पहले आ जाता है। उसने पर्स से इलायची निकाल कर आगे बढा दी।
'' यह पान - सुपारी, इलायची - छोटे छोटे अपराध मैं नहीं करता।''
'' बडे अपराध करने का शौक फरमाते हैं?'' शब्दों की सादी बिसात के पीछे रसिकता का पुट चकचका गया।
'' हां करता हूं, कर रहा हूं। '' कह कर उन्होंने धीरे से आंख दबायी।
वह अजीब उत्सुकता की उठान से उध्दत हो गयी। उनकी जिन्दगी के छिपे कोने में दबे पांव नि:शंक घूमने - खंगालने की इच्छा में वह सुलगने लगी। उससे पहले कौन थी? कोई थी या नहीं? अपने - अपने पद, विवाहित जीवन और दुनियादारी से अलग नितान्त निजी परछाइयों के महीन साये, आवेग का आच्छादन - एक समानान्तर दुनिया।
वे दोनों भी तो शुरुआत कर रहे थे। अपराध के सृजन की आरंभिक लीला। ईश्वर जानता है। जिन्दगी गुनाहों पर ही टिकी है। वे चोर नजरों से घडी देख रहे थे।
'' कहीं जाना है? ''
'' नहीं! आदत पड ग़यी है बार बार घडी देखने की। यू नो चाह कर भी इस्केप नहीं कर सकता। सब सेक्रेट्री की नोटबुक में दर्ज रहता है।अक्सर घर से फोन पर पूछताछ होती रहती है। नोटलैस खोया हुआ समय यही तो मैं चाहता हूं ।'' बुदबुदाते हुए उनकी आंखों में किसी अज्ञात स्वप्न के कतरे तैर रहे थे। आर्द्र आकुलता से भरे हुए शब्द फूटे।
'' खैर! तुम तो आजाद हो - फ्री बर्ड।''
'' क्यों कैसे हूं?''
'' मतलब तलाकशुदा हो।'' आधी बात कह कर वे सुनने की प्रत्याशा में उसे देखने लगे।
'' यूं तो आजाद हूं। पर इस आजादी की अपनी गुलामी है। पुराने अनुभव और फिर अन्तरंग सम्बन्धों में जो जकडन होती है। एक बार भुगत कर आजाद होने के बाद'' कह कर वह बात पी गई।
सचमुच। उसने कल्पना भी नहीं की थी। बहुत सी चीजें कल्पना के बाहर छूट जाया करती हैं। वे फिर भी बची रहती हैं। कल्पना की मुंडेर पार कर कब वास्तव के धरातल पर आ उतरती हैं - कोई नहीं जानता। कितनी कसमें खायीं थीं तलाक के बाद। कांच की किरचों सी चुभन भरी जलन से इन रिश्तों को नहीं, आपके कार्य को ही जीवन का ध्येय होना चाहिये। उडती बदलियों से नश्वर सुख कहीं नहीं पहुंचाते। लेकिन आज न केवल वह उनके निमन्त्रण पर आई है, अपितु बुलाये जाने की प्रतीक्षा भी करती रही है।
फिर अन्तर्निहित सोच को तोडते हुए बरबस बोल उठी, '' इमोशनली डिपेन्डेन्स अब लगता है बरदाश्त नहीं कर पाऊंगी मैंनामुमकिन लगता है।''
'' तुम्हारी बात मैं समझा नहीं।''
'' मेरा मतलब। पजेसिवनेस से उपजा, दूसरे को नियन्त्रित और शासित करने का जो मेनहुड ओरियेन्टेशन है। वह बहुत।''
'' दैट्स आल! जो तुम्हें हर्ट करता है। पजेसिव होना तो सम्बन्ध की स्वीकृति है। तुम खुद पजेसिव नहीं हो जातीं?''
'' अभी तक तो। जो सही मानती हूं उसके पालन करने का अभ्यास है मुझे।''
'' यहां से चलें।'' कहते हुए उनका चेहरा म्लान हो गया। वे शायद बुरा मान गये।
ये तो बहुत टची हैं। जरा सी बात पर मुंह फुलाने वाले। ऐसा कैसे चलेगा? यह क्या झमेला पाल लिया। कार में बैठते ही उन्होंने फिर घडी देखी, '' ओह! चार बजे सिटिंग है, अभी तो हमारे पास काफी समय है।'' ड्रायवर आदेश की प्रतीक्षा कर रहा था।
'' तुम बताओ कहां चलें?''
'' होटल में टॉप फ्लोर रेस्ट्रां है।''
रास्ते में वे दोनों चुप थे। बतियाई हुई एक - एक बात उसके दिमाग में घूम रही थी। आवृत्तियों में घूमते हुए अनुगूंजित होकर दोहरे - तिहरे अर्थ खुल रहे कर उसे आक्रान्त कर रहे थे। उद्विग्न होकर वह कार की खिडक़ी से बाहर देखने लगी।
उन्होंने इकॉनामिक टाइम्स उठा कर पढना शुरु कर दिया।
लिफ्ट में दोनों अकेले थे। पहली बार इतने नजदीक और घनीभूत आयत में आबध्द। उसे धुकधुकी सी महसूस होने लगी। कामनाओं की मूर्तिमान कल्पनाएं उसकी आंखों में तिरने लगीं।
होटल की छत पर कृत्रिम उद्यान था। घास नरम धूप में मखमली हरेपन में उजलाई हुई थी। सूरज पर बदलियों का पहरा था। धूप सिर्फ रोशनी थी जिसमें गमलों में लगे पौधे खोये - खोये से आत्मलिप्त खडे थे। हर चीज ठहरी और ठिठकी हुई।
'' तुम्हें खुले में बैठना अच्छा लगता है? ''
'' हां। बहुत।'' चौंककर उसने जवाब दिया। इतनी देर की चुप्पी वे साधारण सी बात से तोड रहे थे।
'' मैं अभी भी पूरा दिन बाग - बगीचों में बैठे हुए गुजार सकती हूं। कॉलेज के दिनों में तो।'' बोलते - बोलते वह रुक गयी। उसे लगा इतने पीछे जाना अनावश्यक है।
'' इस तरह घूमनायाद नहीं। इस तरह समय गुजारा हो। बहुत ओवर पैक्ड रहता हूं। टाइम ही नहीं मिलता। यू नो! हर चीज क़ी उम्र होती है।'' स्वर निर्णायक और निर्मम था।
वे खुद को चेता रहे हैं या उसे? क्या वे भी अनिश्चय में हैं? किनारे पर खडे ज़ल में हाथ डाल कर जायजा भर ले रहे हैं? यह उनकी बात का साइकिक प्रोजेक्शन है या उसके भीतर तक धंसा प्रेम के प्रति भय। वह अपने मनोभावों का प्रक्षेपण उनकी बातों में ढूंढ रही है?
'' हां, होती है। हर चीज क़ी उम्र होती है।'' कहते हुए कुछ धप से उसके अन्दर मुरझा गया। सचमुच प्रेम करने की भी उम्र होती है। इतने दिनों तक वह मरीचिका में आंखें उलझाए बैठी रही? सूरज पर से बदलियों का पहरा हट चुका था। अस्ताचलगामी होने से पहले अपनी अन्तिम आग धरती पर बेरहमी से बरसा रहा था। दूर इमारतों की छतें, पेड - पौधे सब चमकते हुए आंखों में चिलक भरते चुभ रहे थे। वह लय तिरोहित हो चुकी थी जो दो आसक्ति भरे प्राणियों की बेमतलब बातों के बीच में से झरती रहती है।
वह अपनी ही लालसा के बूंद - बूंद सूखते चले जाने की कडवाहट में डूब गयी।
सिर्फ प्लेट से छुरी कांटे टकराते हुए खनखना रहे थे। वे दोनों ही कामना की बुझती आग के कसैले धुंआरे से घिरे बैठे थे।
प्राय: दृढता के अतिआग्रही व्यक्तित्व जब कमजोर पडकर भुरभुराने लगते हैं, अन्तश्चेतना उन्हें अपने ही बनाये कन्ट्रोलरूम में ले जाकर सताने लगती है। निर्मम पूछताछ शुरु हो जाती है। कोडे बरसते हैं और आत्मपीडन में पश्चाताप कर मुक्ति की राह खोजी जाती है।
वे पत्थर के बुत की तरह निश्चल थे। चेहरा हताशा में उघडा हुआ था। वह चाहती थी कि उन्हें किसी तरह आह्लाद नहीं तो सहजता की परिधि में खींच लाये। उसे यह असंभव लगा। क्या बात है? किस उधेडबुन में हैं? पूछने का हौसला तक नहीं जुटा पा रही थी,बस यहीं दूसरे के मूड पर अपनी मन:स्थिति का पराश्रित हो जाना उसे खलता है। सामने वाला चेहरा लटका कर बैठा है इसलिये आप भी कसमसाते फिरें। वेटर आकर ट्रे वापस ले गया।
वे दोनों टॉप फ्लोर से नीचे पहुंचने के लिये वापस लिफ्ट में थे। एक दूसरे के आमने - सामने। एकटक नजर मिली।
आशा की तेज लहर उदासीनता को रौंदते हुए हुलस कर उठी। भीतर चेतावनी जगी। इट्स नाऊ ऑर नेवर! उसका हाथ भर छू लेने की तडप लिये आगे बढा उन तक गयाऔर बजाय उन तक पहुंचने के बोर्ड के जी स्विच को दबा गया। लिफ्ट ग्राउण्ड फ्लोर की और दौड चली।
अफसोस भरे गहरे निश्वास के साथ उसे अपने प्राण फडफ़डा कर बाहर निकलते से लगे।
वे खोये - खोये से निश्चल खडे थे।
लिफ्ट रुकी और तीसरी मंजिल से लोग भीतर आ गये।
यह वास्तव में हुआ था या विभ्रम था? खामोशी में सनसनाता प्रश्नचिह्न उसकी आंखों में खुबा हुआ - उनकी ओर ताका किया।
लिफ्ट से बाहर आते ही उसे लगा कि वह सूना चौखाना ही बेहतर था। वहां संभावना थी। जिसे दोनों के संशय ने नष्ट कर दिया था।यह संकोच था या आशंका, जिसकी वजह से प्रेम की दुर्घटना खण्डित हो गयी। या स्थगित हो गयी?
वह सोच - सोच कर उदासी में कलपने लगी। निर्णय की प्रतीक्षा का लम्बा रास्ता उसके पांवों के नीचे अगोरता खडा था।
लवलीन
1 जुलाई 2004
प्रेम से पहले
पार्टी की भीड पर उसकी नजरें फिसल रही थीं। उन्हें खोजना मुश्किल मालूम हुआ। जहां आंखों को अटना था। वहीं चेहरा ओझल था। फुरफुरी की तरह निराशा व्यापने लगी। तो तो वे आए नहीं! ऐसा कैसे हो सकता है?
हो तो सकता है। जिस पद पर वे कार्य कर रहे हैं, अर्जेन्ट कॉल के झमेले पडे ही रहते हैं। लेकिन सूचित तो कर ही सकते थे। करना चाहिये था।
हताशा से सिर फटता - सा लगा। उन तक पहुंच पाना उसके लिये हमेशा ही मुश्किल रहा है। शुरुआत से ही। सबकुछ अनिश्चित, संदिग्ध सन्देहपूर्ण। सन्देह के रहस्य में मिलने पर कभी उल्लासपूर्ण ताप चढ ज़ाता तो कभी उचाट ठण्डापन। निष्कर्ष तक न पहुंच पाना उसे बहुत क्षुद्र और कातर कर जाता। उनके व्यवहार में कुछ ऐसा अनिश्चय था कि वे उसे कभी बहुत करीब और कभी दूर खडे अजनबी की तरह लगते थे। कभी झलझलाती रंगीनी भरी तबियत तो कभी खाली मटके सा भाखता रीतापन। अपने मूड का उनके रिस्पॉन्स पर आश्रित होना उसे बहुत अपमानजनक लगता। कई बार गुस्से में बडबडाई है ऐरोगेन्टसेल्फिश, टाइमकेलकुलेटिंग मेन!
क्यों आलतू - फालतू सोच कर मन मलिन कर रही है? उसने सख्ती से बिखरते हुए मूड को कसा और एकाग्र हो दुबारा छितरी भीड क़ो आंखों में समेटने लगी।
'' हैलो! क्या देख रही हैं, लंच लीजिये ! प्लीज'' मिस्टर सिंह थे।
'' कुछ नहीं।'' हकबकायी सी वह अपने फीके चेहरे को मुस्कान से सायास सहज करती हुई उनके साथ घिसटते हुए तकल्लुफी बातों में अपने आप को खपाने लगी।
'' गुड गॉड।'' वह दूर - दूर तक देख रही थी। वे अब करीब ही थे। उसकी दाहिनी ओर की सर्विस टेबल के पास प्लेट पकडे हुए किसी से बतिया रहे थे। वह मिस्टर सिंह को दरकिनार करते हुए आतुर कदमों की डगमग चाल से उन तक पहुंची।
'' कब आयीं?''
'' कुछ देर पहले।'' कहकर वह अभिमुख थी। उनके आस - पास की भीड से चेतस जबरन सादा मुस्कुराहट में भी उसे व्यंजना भरे अर्थ की कौंध लपकती - सी लगी। वह गुस्सा भूल सहज हो गयी। स्तब्ध आंखों की टकटकी जब झेली नहीं गई तो झंपायी - सी सामने दहकी धूप में चटकीले फूलों की सघन क्यारी को निरखने लगी। वे लोग पहले भी मिलते रहे हैं। औपचारिकता से बंधे विभागीय बैठकों में। परसों ही उनका फोन आया था।
'' तुम आओगी? पार्टी में वहां से कहीं चलेंगे हमें बात करनी चाहिये। वी मस्ट''
'' आर यू सीरियस?'' बात काटते हुए वह अपना सन्देह जुबान पर लाने से रोक न पाई थी।
'' तुम आओगी तो बात करेंगे, प्रॉमिस।'' और फोन चुप पड ग़या था। उसका जवाब श्योर ' उसके कण्ठ में ही अटका रहा गया था।
'' लन्च नहीं लोगी?''
'' लन्च लेकर ही चली थी।'' बिना सोचे - समझे मुंह से निकल गया। लंच पार्टी का निमन्त्रण हो तो कोई ऑफिस से लंच लेकर निकलता है? अपनी गडबडाहट पर वह स्वयं विस्मित थी।
'' कुछ स्वीट ही ले लो।
अधीनस्थ की तरह आदेश की अनुपालना में यंत्रचालित सी उसने प्लेट उठायी और टेबल की ओर बढ चली। अब वह उनके सामने लॉन में कुर्सी पर बैठी हुई चम्मच से छोटे - छोटे कौर निगल रही थी।
कुछ दिनों से वह परेशान थी। असमंजस में थी। भीतर से उठती चेतावनियां। तुम फिर खतरा उठा रही हो। दांव पर लगा रही हो अपनी स्वतन्त्रता निजता। वह बहरी बनी हुई थी और प्रतीक्षा के आकुल तनाव में थी। कभी - कभी हम बेसबरे होकर प्रतीक्षा भी करते हैं और सद्य: जन्मे बच्चों की तरह घटित नये संसार में प्रवेश के डर से मुट्ठियां कसे रहते हैं। दो आसक्त व्यक्तियों का अपनी अपनी खूंटियों से छिटक कर मुठभेड क़ी आत्मविध्वंसक घटना। संघर्षण की चकाचौंध चिनगारियों से नजर चुरा लेना मुश्किल है। इस दुर्घटना के बाद ही सम्बन्ध की नींव पडेग़ी। असहनीय जान पडता है सब कुछ, कल्पना का सच ज्यादा विकराल होता है। घटित न होते हुए भी मानसिक आवर्तन के कारण हमेशा ग्रसित किये रहता है वह हैरान और आकुल थी। रसज्ञता के मुहाने पर विगत जीवन के विषाक्त अनुभवों के पत्थर क्या पिघल गये हैं? मरणासन्न कर देने वाली घुटन से वह तलाक द्वारा निजात पा चुकी है।
जीवनयापन की आत्मअन्वेषित शैली में नियोजित - व्यवस्थित हो गयी है। दुबारा भावुकता के दलदल में खुद को लथेडना फिर खुद ही अपनी आशंकाओं का प्रतिवाद करने लगी। पत्थर की लकीर से ढले व्यक्तित्व का क्षरण कहीं संभव है? यह तो जीवन में सरसता की छोटी सी मांग है। जिसे स्वीकार कर वह आज यहां उनके बुलाने पर आ गई है।
सोच के बोझिल अन्धड से अकुलाई आंखें उनके चेहरे पर केन्द्रित हो गयीं। जैसे सारी उहापोह और शंकाओं का समाधान उनके चेहरे पर लिखा हो। क्या ये ही हैं सचमुच मैं आकर्षित हूं, चाहत में हूं?
उनका प्लेट पर झुका चेहरा ऊपर उठा। अब उसकी प्लेट पर सिर झुकाने की बारी थी। क्या अब सोचने और निर्णय लेने को कुछ नहीं बचा है? संशय के ये कैसे फनफनाते पल हैं जो प्रेम से पहले घुमडते हुए सिर उठा लेते हैं।
एक सज्जन उनसे बात करने के लिये आये। वह भी कुर्सी से उठ गयी। उसका परिचय देते हुए वे दृढता से
माय फ्रेण्ड कह गये। तो उन्हें वह स्वीकार्य है। और उसे ? बेचैनी भरी ऐंठन उठी और वह घबरा कर इधर - उधर देखने लगी।घास शारदीया धूप में गीले पुते रंग सी तरल - चटख थी। कच्ची फुलवारी की कतारें शोख रंगों का झमाझम आलोक बिखेरती हुई इठला रही थीं। हठात् वह चौंकी। उन दोनों की बातचीत तीखी हो गयी थी। बातचीत में से चाकू पर धार चढाते समय जैसे स्फुलिंग छूट रहे थे।
वे सज्जन क्रोध में पांव पटकते हुए चल दिये। वे दोनों वापस अपनी - अपनी कुर्सियों पर थे। वे खासे विचलित नजर आ रहे थे।धीमी लय के साथ नकारात्मक ढंग से सिर को दायें - बाएं घुमाते स्वयं से उलझे हुए थे। ऐसी देह मुद्रा - जब आप जो कहना चाहते हैं, माकूल समय पर कह नहीं पाते हैं। बाद में पछताते हैं।
प्रशस्त पेशानी पर मध्यम वयस की रेखाएं। निखरी आंखों की कोरों पर उम्र की चुगली महीन झुरियां । तीखी नाक। पार्श्व से देखने पर यह तीखापन चुभता सा लगता है। सजग गाम्भीर्य की तनी भावमुद्रा! प्राय: उन पुरुषों में देखने को मिलती है जो अपने ध्येय और उसके कौशलपूर्ण निवाह की सतत चेताना से आदीप्त रहते हैं
अन्तरंग पुरुष द्वैतियक हो ओझल हो जाता है। देखने - जानने वाले को इस आयास सजगता से ही संतोष करना पडता है। लेकिन आज इस मुद्रा में वे उघड ग़ये थे। बेहद साधारण और निरुपाय नजर आ रहे थे।
उन्हें इस मालिन्यपूर्ण मन:स्थिति से बाहर निकालने के उद्देश्य से ही वह हस्तक्षेप कर उठी।
'' क्या बात है? वे कौन थे? ''
'' कुछ नहीं '' कहकर उन्होंने फिर सिर को पछतावे वाले अन्दाज में झटक दिया।
वह उन्हें - बताओ न, बताते क्यों नहीं वाली मुद्रा से कुरेदती रही। वे अनिच्छापूद्र्याक बताने लगे। स्वार्थों के टकराव और पदोन्नति का विभागीय किस्सा। बहस का अन्त ट्रिब्यूनल में केस चलाने की धमकी से हुआ था। फिर स्वयं ही अप्रीतिकर घटना की तात्कालिकता से उबरते हुए बोल उठे, '' चलो ! कहीं चलते हैं।''
बाहर निकलने में ही दस - पन्द्रह मिनट लग गये। एन पार्टी के बीच में से उन्हें जाता हुआ देखकर सभी को उनसे महत्वपूर्ण बात निपटाने की जरूरत महसूस हो उठी थी। बे खीज दबाते हुए लोगों से निपट रहे थे।
उन्हें कोफ्त महसूस होने लगी। इस तरह पार्टी के बीच से उठ कर जाना नोट कर लिया जायेगा। सत्रह - अठारह साल की होती तो दुनिया मेरी जूती की नोक पर की आलम फरेब मुद्रा में कन्धे उचका कर पीछे - पीछे चल सकती थी। मध्यम वयस के पक्केपन में अंजाम की सजगता पांव बांध देती है। भावात्मक आवेग से जुडने में परिपक्वता उतनी ही बडी बाधा है जितना अबोध वय का जोश।सोचते हुए वह उनके खाली होने का इंतजार करने लगी।
कार में बैठते हुए वे मुक्त ढंग से मुस्कुराते हुए बोले, '' सॉरी! बोर किया न तुम्हें।''
'' इम्पोर्टेंट आइडैन्टिटि - आपको तो अच्छा लगता होगा।''
'' लगता है - पर हमेशा नहीं, खासकर जब आप अकेले हो जाना चाहें।''
दोनों मुक्त हास से हल्के हो गये। सामान्य वार्तालाप में अन्तरंगता के सूत्र जुडने लगे। हवा में डोलती अकेली घास की तन्वंगी तने - सी सरसराहट उसे अपने में व्यापती लगी कुछ अचाक्षुष सा घटित होता हुआ छाता चला जा रहा था और वह गहरी सांस लेते हुए बेसुध सी सब समेटते हुए पोसरी होती चली जा रही थी।
अजीब बात थी, अन्त:चेतना का एक अंश उमडता हुआ इस नशे का विरोध करता हुआ चेतावनियां ठोक रहा था। उसे ध्यान आया।अभी जिस व्यक्तित्व के आकर्षण से वह अपने आपको विवश पा रही है, थोडी देर पहले वह कितने साधारण निरुपाय नजर आ रहे थे। और अब जिसे हम जुडना कहते हैं वह आदर्श छवि तोडक़र प्राप्ति का सहज वरण है या उस स्वप्न - छवि की टूटी प्रतिमा का पुनर्निर्माण? वह सचमुच असमंजस का शिकार हो चली थी। क्या वह इस रिजिडनेस को विर्दीण कर भीतरी परत को देखना - भोगना चाहती है?
लेकिन वह उत्फुल्ल - प्रसन्न थी, उनके साथ। यकीनन थी। क्या यही काफी नहीं?
बडे होटलों की चमाचम सजावट उसे हमेशा पटाखों - सी फूटती दु:सह जान पडती है। लप - झप में आंखें बार - बार जा अटकती हैं।सोचने - महसूसने की एकाग्रता भंग हो जाती है।
वे दोनों कॉफी पी रहे थे।
अपनी तरफ एकटक नजरों की बौछार से वह सकुचा गई। गालों पर सुर्ख आंच थिरकने लगी। आक्षेप भरी नजरों से उलाहने लगी। ''क्या देख रहे हो? देखना अब भी बाकि है? '' कुछ कहने की तत्परता क्षणांश भर के लिये उठी। फिर लुप्त हो गयी। आरक्त आंखों में गुलाब के फूलों का रंग था।
'' क्या प्रोग्राम है? ''
'' आप बताइये।'' वह इतना ही कह पाई। आपने बुलाया है, कहने की इच्छा घोंट गयी।
'' नथिंग स्पेशल।'' वे उकसाते हुए शरारतन मुस्कुरा रहे थे।
मुस्कुराहट तो ठीक है - लेकिन वे एक हाथ से दूसरे हाथ का नाखून छील रहे थे। उसने गौर किया। हाथ असामान्य थे - सफल व्यक्तियों की तरह मध्यमा की उंचाई को छूती अन्य उंगलियां। नाखून छीलने की मुद्रा खासी अभद्र थी। उसकी इच्छा हुई उन्हें टोक दे।नाखून इस तरह मत छीलो- इसका मतलब होता है
प्रेम उपजे या न उपजे। अधिकार का अंकुश भाव उससे पहले आ जाता है। उसने पर्स से इलायची निकाल कर आगे बढा दी।
'' यह पान - सुपारी, इलायची - छोटे छोटे अपराध मैं नहीं करता।''
'' बडे अपराध करने का शौक फरमाते हैं?'' शब्दों की सादी बिसात के पीछे रसिकता का पुट चकचका गया।
'' हां करता हूं, कर रहा हूं। '' कह कर उन्होंने धीरे से आंख दबायी।
वह अजीब उत्सुकता की उठान से उध्दत हो गयी। उनकी जिन्दगी के छिपे कोने में दबे पांव नि:शंक घूमने - खंगालने की इच्छा में वह सुलगने लगी। उससे पहले कौन थी? कोई थी या नहीं? अपने - अपने पद, विवाहित जीवन और दुनियादारी से अलग नितान्त निजी परछाइयों के महीन साये, आवेग का आच्छादन - एक समानान्तर दुनिया।
वे दोनों भी तो शुरुआत कर रहे थे। अपराध के सृजन की आरंभिक लीला। ईश्वर जानता है। जिन्दगी गुनाहों पर ही टिकी है। वे चोर नजरों से घडी देख रहे थे।
'' कहीं जाना है? ''
'' नहीं! आदत पड ग़यी है बार बार घडी देखने की। यू नो चाह कर भी इस्केप नहीं कर सकता। सब सेक्रेट्री की नोटबुक में दर्ज रहता है।अक्सर घर से फोन पर पूछताछ होती रहती है। नोटलैस खोया हुआ समय यही तो मैं चाहता हूं ।'' बुदबुदाते हुए उनकी आंखों में किसी अज्ञात स्वप्न के कतरे तैर रहे थे। आर्द्र आकुलता से भरे हुए शब्द फूटे।
'' खैर! तुम तो आजाद हो - फ्री बर्ड।''
'' क्यों कैसे हूं?''
'' मतलब तलाकशुदा हो।'' आधी बात कह कर वे सुनने की प्रत्याशा में उसे देखने लगे।
'' यूं तो आजाद हूं। पर इस आजादी की अपनी गुलामी है। पुराने अनुभव और फिर अन्तरंग सम्बन्धों में जो जकडन होती है। एक बार भुगत कर आजाद होने के बाद'' कह कर वह बात पी गई।
सचमुच। उसने कल्पना भी नहीं की थी। बहुत सी चीजें कल्पना के बाहर छूट जाया करती हैं। वे फिर भी बची रहती हैं। कल्पना की मुंडेर पार कर कब वास्तव के धरातल पर आ उतरती हैं - कोई नहीं जानता। कितनी कसमें खायीं थीं तलाक के बाद। कांच की किरचों सी चुभन भरी जलन से इन रिश्तों को नहीं, आपके कार्य को ही जीवन का ध्येय होना चाहिये। उडती बदलियों से नश्वर सुख कहीं नहीं पहुंचाते। लेकिन आज न केवल वह उनके निमन्त्रण पर आई है, अपितु बुलाये जाने की प्रतीक्षा भी करती रही है।
फिर अन्तर्निहित सोच को तोडते हुए बरबस बोल उठी, '' इमोशनली डिपेन्डेन्स अब लगता है बरदाश्त नहीं कर पाऊंगी मैंनामुमकिन लगता है।''
'' तुम्हारी बात मैं समझा नहीं।''
'' मेरा मतलब। पजेसिवनेस से उपजा, दूसरे को नियन्त्रित और शासित करने का जो मेनहुड ओरियेन्टेशन है। वह बहुत।''
'' दैट्स आल! जो तुम्हें हर्ट करता है। पजेसिव होना तो सम्बन्ध की स्वीकृति है। तुम खुद पजेसिव नहीं हो जातीं?''
'' अभी तक तो। जो सही मानती हूं उसके पालन करने का अभ्यास है मुझे।''
'' यहां से चलें।'' कहते हुए उनका चेहरा म्लान हो गया। वे शायद बुरा मान गये।
ये तो बहुत टची हैं। जरा सी बात पर मुंह फुलाने वाले। ऐसा कैसे चलेगा? यह क्या झमेला पाल लिया। कार में बैठते ही उन्होंने फिर घडी देखी, '' ओह! चार बजे सिटिंग है, अभी तो हमारे पास काफी समय है।'' ड्रायवर आदेश की प्रतीक्षा कर रहा था।
'' तुम बताओ कहां चलें?''
'' होटल में टॉप फ्लोर रेस्ट्रां है।''
रास्ते में वे दोनों चुप थे। बतियाई हुई एक - एक बात उसके दिमाग में घूम रही थी। आवृत्तियों में घूमते हुए अनुगूंजित होकर दोहरे - तिहरे अर्थ खुल रहे कर उसे आक्रान्त कर रहे थे। उद्विग्न होकर वह कार की खिडक़ी से बाहर देखने लगी।
उन्होंने इकॉनामिक टाइम्स उठा कर पढना शुरु कर दिया।
लिफ्ट में दोनों अकेले थे। पहली बार इतने नजदीक और घनीभूत आयत में आबध्द। उसे धुकधुकी सी महसूस होने लगी। कामनाओं की मूर्तिमान कल्पनाएं उसकी आंखों में तिरने लगीं।
होटल की छत पर कृत्रिम उद्यान था। घास नरम धूप में मखमली हरेपन में उजलाई हुई थी। सूरज पर बदलियों का पहरा था। धूप सिर्फ रोशनी थी जिसमें गमलों में लगे पौधे खोये - खोये से आत्मलिप्त खडे थे। हर चीज ठहरी और ठिठकी हुई।
'' तुम्हें खुले में बैठना अच्छा लगता है? ''
'' हां। बहुत।'' चौंककर उसने जवाब दिया। इतनी देर की चुप्पी वे साधारण सी बात से तोड रहे थे।
'' मैं अभी भी पूरा दिन बाग - बगीचों में बैठे हुए गुजार सकती हूं। कॉलेज के दिनों में तो।'' बोलते - बोलते वह रुक गयी। उसे लगा इतने पीछे जाना अनावश्यक है।
'' इस तरह घूमनायाद नहीं। इस तरह समय गुजारा हो। बहुत ओवर पैक्ड रहता हूं। टाइम ही नहीं मिलता। यू नो! हर चीज क़ी उम्र होती है।'' स्वर निर्णायक और निर्मम था।
वे खुद को चेता रहे हैं या उसे? क्या वे भी अनिश्चय में हैं? किनारे पर खडे ज़ल में हाथ डाल कर जायजा भर ले रहे हैं? यह उनकी बात का साइकिक प्रोजेक्शन है या उसके भीतर तक धंसा प्रेम के प्रति भय। वह अपने मनोभावों का प्रक्षेपण उनकी बातों में ढूंढ रही है?
'' हां, होती है। हर चीज क़ी उम्र होती है।'' कहते हुए कुछ धप से उसके अन्दर मुरझा गया। सचमुच प्रेम करने की भी उम्र होती है। इतने दिनों तक वह मरीचिका में आंखें उलझाए बैठी रही? सूरज पर से बदलियों का पहरा हट चुका था। अस्ताचलगामी होने से पहले अपनी अन्तिम आग धरती पर बेरहमी से बरसा रहा था। दूर इमारतों की छतें, पेड - पौधे सब चमकते हुए आंखों में चिलक भरते चुभ रहे थे। वह लय तिरोहित हो चुकी थी जो दो आसक्ति भरे प्राणियों की बेमतलब बातों के बीच में से झरती रहती है।
वह अपनी ही लालसा के बूंद - बूंद सूखते चले जाने की कडवाहट में डूब गयी।
सिर्फ प्लेट से छुरी कांटे टकराते हुए खनखना रहे थे। वे दोनों ही कामना की बुझती आग के कसैले धुंआरे से घिरे बैठे थे।
प्राय: दृढता के अतिआग्रही व्यक्तित्व जब कमजोर पडकर भुरभुराने लगते हैं, अन्तश्चेतना उन्हें अपने ही बनाये कन्ट्रोलरूम में ले जाकर सताने लगती है। निर्मम पूछताछ शुरु हो जाती है। कोडे बरसते हैं और आत्मपीडन में पश्चाताप कर मुक्ति की राह खोजी जाती है।
वे पत्थर के बुत की तरह निश्चल थे। चेहरा हताशा में उघडा हुआ था। वह चाहती थी कि उन्हें किसी तरह आह्लाद नहीं तो सहजता की परिधि में खींच लाये। उसे यह असंभव लगा। क्या बात है? किस उधेडबुन में हैं? पूछने का हौसला तक नहीं जुटा पा रही थी,बस यहीं दूसरे के मूड पर अपनी मन:स्थिति का पराश्रित हो जाना उसे खलता है। सामने वाला चेहरा लटका कर बैठा है इसलिये आप भी कसमसाते फिरें। वेटर आकर ट्रे वापस ले गया।
वे दोनों टॉप फ्लोर से नीचे पहुंचने के लिये वापस लिफ्ट में थे। एक दूसरे के आमने - सामने। एकटक नजर मिली।
आशा की तेज लहर उदासीनता को रौंदते हुए हुलस कर उठी। भीतर चेतावनी जगी। इट्स नाऊ ऑर नेवर! उसका हाथ भर छू लेने की तडप लिये आगे बढा उन तक गयाऔर बजाय उन तक पहुंचने के बोर्ड के जी स्विच को दबा गया। लिफ्ट ग्राउण्ड फ्लोर की और दौड चली।
अफसोस भरे गहरे निश्वास के साथ उसे अपने प्राण फडफ़डा कर बाहर निकलते से लगे।
वे खोये - खोये से निश्चल खडे थे।
लिफ्ट रुकी और तीसरी मंजिल से लोग भीतर आ गये।
यह वास्तव में हुआ था या विभ्रम था? खामोशी में सनसनाता प्रश्नचिह्न उसकी आंखों में खुबा हुआ - उनकी ओर ताका किया।
लिफ्ट से बाहर आते ही उसे लगा कि वह सूना चौखाना ही बेहतर था। वहां संभावना थी। जिसे दोनों के संशय ने नष्ट कर दिया था।यह संकोच था या आशंका, जिसकी वजह से प्रेम की दुर्घटना खण्डित हो गयी। या स्थगित हो गयी?
वह सोच - सोच कर उदासी में कलपने लगी। निर्णय की प्रतीक्षा का लम्बा रास्ता उसके पांवों के नीचे अगोरता खडा था।
लवलीन
1 जुलाई 2004

प्रेत कामना

प्रेत कामना
यह वह एक पल था, जिसे यूं तो सभी लोग एक साथ अपने - अपने तरीके से जी रहे थे पर यह वह पल था, जिसे तीन लोगों ने गहनता से महसूस कर जिया, यूं यह वह पल भी था जो बीत रहा था रेंगता हुआ। यही वह पल था तेज रफ्तार गाडियों के बीच बचता - बचाता जिया जा रहा था।कहीं यह पल चौथाई चांद की पीली मटमैली रात में पेड क़ी फुनगी पर अटका बस टपकने को था।यह पल थाजो रेगिस्तान के कैक्टस में पानी की एक लसलसी बूंद बन कर एकत्र हो रहा था आने वाले सूखे मौसमों की प्यास बुझाने को।
दरअसल सलिल के लिये इस अवाक् पल की भूमिका तब बनी, जब वह अपने मल्टीनेशनल कंपनी के दफ्तर से, लिफ्ट से उतर रहा था और उसने लिफ्ट में एक खांसते परेशान अस्थमैटिक बूढे क़ो देखा था। अनायास उसे अपना जनक याद आ गया था। एक बडे फ्लैट में तन्हा।
व्यस्तता की घनेरी परतों और नई जिम्मेदारियों के भुलावों के बीच खोया हुआ, उसका कर्तव्यबोध किसी पुरानी पोस्टकार्ड पर लिखी चिट्ठी सा निकल पडा था और उसे पापा बेतहाशा याद आये थे।हालांकि वे इसी शहर में रहते थे। पर उनसे मिले हुए उसे आधा साल गुजर गया था। पिछली बार जब वह उनसे मिला था, तब तो वे स्वस्थ ही थे पर उदास थे। यूं अभी एक साल ही हुआ है उन्हें रिटायर हुए। अब वे स्वतन्त्र लेखन करते हैं। आज उसे मम्मी भी याद आ रही हैं कि वे होतीं, तो शायद वह आज इतना परेशान नहीं हुआ होता। पर वे तो
उनके रिटायरमेन्ट से करीब चार साल पहले ही नहीं रहीं। बडे चाव से उन्होंने बडा सा फ्लैट लिया था कि दिव्या की शादी इस फ्लैट से होगी, सलिल यहां बहू ब्याह कर लायेगा। दोनों चाव अधूरे छूट गये।दिव्या की शादी हांगकाँग जाकर हुई वह एयरहोस्टेस थी और उसने वहीं अपना दूल्हा ढूंढ लिया था मम्मी पापा बस रिशेप्शन अटैण्ड कर वापस लौट आये थे। सलिल की शादी तो इसी फ्लैट में हुई पर बहू को अपने दफ्तर से दूर मुम्बई के इस पुराने सबर्ब में रहना पसन्द नहीं आया सो वह मम्मी की डेथ से पहले ही उसे लेकर अलग हो गई। तब पापा ने कहा था मम्मी से - जाने दो, कुछ कहने की जरूरत नहीं है। बनाने दो उन्हें अपना नीड। हम दोनों हैं ना, फिर से अपनी प्राईवेसी एन्जॉय करेंगे।उसके चले आने के तीसरे सप्ताह ही, मम्मी की यूं अचानकहुई मृत्यु का अपराधबोध ही सलिल से नहीं छूटता अब बार - बार मन पापा की ओर भागता है।
पिछली बार ही फोन पर कह रहे थे - '' आते जाते रहा करो। पता नहीं कब तक हूं मैं।''
वह कांप ही गया था, अभी कल परसों ही तो एक मैगजीन में पढा था कि एकाकी विधुर पुरुष कम ही जी पातें हैं। उनकी बनिस्पत जो अपने जीवनसाथी के साथ होते हैं या फिर अपने परिवार के साथ।
इतनी लम्बी सोच के ब्रेक भी कार के साथ ही लगे अभी तो बहुत दूर जाना है। वहां से अपने घर भी लौटना है। पैंतीस से ज्यादा किलोमीटर का चक्कर हो जायेगा। फिर कुछ देर तो ठहरेगा ही। क्यों न पापा के लिये और अपने लिये खाना पैक करा ले। विम्मी को सैलफोन पर कह दिया कि इंतजार न करे।
पापा के फ्लैट में लिफ्ट नहीं थी। समुद्र की ओर मुख किये इन चार माले के पुराने फ्लैट्स में किसी में भी शुरु ही से लिफ्ट नहीं थी। पापा तीसरी मंजिल पर रहते हैं। सलिल ने महसूस किया यहां पीछे छूट आये समय के टुकडे क़े साथ भी कुछ खास नहीं बदला। वैसी ही उमस से भरी नमकीन हवा,वही सोया सा मोहल्ला। सीले से मकानउन मकानों की चौडी - चौडी बॉलकनी जिनमें बैठ कर उन मकानों के बूढे मालिकों को अपने स्वर्णिम अतीत की यादों की टीस को सहलाना अच्छा लगता है।पापा भी तो उसे वहीं बैठे मिलते हैं, वह जब भी आता हैदूर से उसकी कार पहचान जाते हैं और बच्चे की तरह उत्साहित हो नीचे उतर आते हैं।
सामने वही खेल का मैदान ह्न जिसमें आजकल कम बच्चे खेला करते हैं। उनका कितना बडा झुण्ड था अब सब खो गये हैं अपने आशियाने छोड उड ग़ये हैं। उसने ऊपर देखा पापा के फ्लैट की बत्तियां कुछ जल रही थीं कुछ बुझी थीं। टेरेस पर लगा झूला हल्के से हिल रहा था जैसे अभी ही कोई उठ कर गया हो।
तेजी से खाने का पैकेट संभाले वह सीढियां चढा। पापा की चिन्ता, पापा की अच्छी बातें जो आज भी उसे कठिनाई में उंगली पकड रास्ता दिखाती हैं, पापा की खामोश मगर बोलती सुन्दर आंखें, पापा की साफगोई, पापा के प्रति एक श्रध्दा व प्यार भरा मोह लिये वह घर के सामने रुका। घर चुप था। न जाने क्यों उसे लगा कि अभी ही एक कोलाहल हो होकर ठहरा है। और बहुत बहुत सारी बातें करके चुका यह घर अचानक तन्द्रिल हो उठा है। उसने घण्टी न बजा कर, अपनी चाभी से दरवाज़ा खोला,पापा सो रहे होंगे उसने खाना किचन में रखा वहां चाय के दो प्याले रखे थे। पापा मम्मी को अब भी बहुत याद करते हैं करके मन भीग गया। पापा अब वह पुराना कोने वाला, समुद्र के सामने लम्बी सी खिडक़ी वाला बेडरूम कम इस्तेमाल करते हैं। वह स्टडी की तरफ बढा जहां पापा पढते लिखते वहीं सो जाया करते हैं। तीसरा बेडरूम दिव्या के लिये है वह जब भी भारत आती है पापा के पास रुकना पसन्द करती है। स्टडी में पापा का ट्रेकसूट कुर्सी पर टंगा था पर पापा नहीं थे। बाथरूम भी बाहर से लैच्ड था। वह पापा मम्मी के पुराने बेडरूम की तरफ बढा, जिसका दरवाजा आधा भिडा था उसने झांका और वह पल अब सामने था जीना ही था, इस पल को उसके लम्बे तने खिंचाव के साथ रबर की तरह खिंचा वह पल टूटने की हद तक पापा!
ह्नपापा की चौडी ग़ोरी पीठ पर लिपटी दो नर्म - नाजुक़ बाँहे! उसने तो कभी मम्मी के साथ भी पापा को यूं नहीं कनपटियां गर्म हो गई थीं। अचानक सारा कमरा आउट ऑफ फोकस हो गया। गहरे सन्नाटे में बेसुध सांसे ही इतना शोर कर रही थीं, कि उन दोंनों में से किसी को उसकी उपस्थिति का भान तक नहीं हुआ। वह पल टूटने को ही था - कि करवटें मुखर हुईं, एक सानुपातिक सांवली अर्धनग्न देह दिखने लगी, जो वल्लरी सी पापा से लिपटी थी दो जोडी पैर आपस में उलझे थे। दो जोडी आंखें एक नशे में अधखुली सी उसको देख कर भी नहीं देख पा रही थीं। पापा के चौडे वक्ष के फैलाव में दो सलेटी मांसल उभार पापा के होंठ जिन्हें घनेरी प्यास के साथ सहला रहे थे। जुगुप्सा से उसका जी मितलाया और पापा के उस उदार महान रूप के भ्रम को तोडक़र ही यह पल टूटा। यह पल क्या टूटा एक बची खुची डोर सी टूट गयी, जो उसे पापा के पास खींच कर लायी थी।वह दस दस मन के भारी पैर लेकर जीना उतर कर सडक़ पर आ गया।
एकाएक इस पल की खिंचावदार टूटन से बुरी तरह आहत हो उसका एकदम से घर जाने का मन जरा भी नहीं था। अंधेरे कोने में कार पार्क कर, वह फ्लैट के बिलकुल सामने वाले पार्क की एक बैंच पर बैठ, अपने घर के सिलहट्स देखने लगा। करीब और दस मिनट बाद उस बेडरूम की लाईट जली।जाली के पर्दों पर उनकी काया उभरी, उनकी देह से एक ढलते पुरुषार्थ के दंभ का स्त्रोत - सा फूटता दिखाई दिया। उसे भान सा हुआ, जैसे वे उसे ही जता रहे हों कि - बूढा व अकेला नहीं हूं मैं, मेरी दुनिया अब भी रस से खाली नहीं। वह चिढ सा गया।उनकी परछांई स ही उलझ गया, '' शोभा देता है यह सब? अब इस उम्र में? ''
''तो तो क्या करुं। अकेला दम घुटा कर जान दे दूं? मेरा बाकि का जीवन टूटी दीवार से झरते सीमेन्ट सा बीते? यही चाहते हो न तुम?''
'' ''
तीसरी मंजिल के उस फ्लैट में, जिसे वह अपना घर कहते कहते, अब किसी ओर घर को अपना घर कहने लगा है( यह पापा का घर रह गया है अब) अब हलचलें खामोश हो गईं थीं, उजाला तैर रहा था। वही कमरा जहां मम्मी पूजा करती थीं, सिसकारते अपवित्र अंधेरों के बाद अब जगमगा रहा था।दो परछाईयां फिर खडी होकर उलझीं और ढह गयीं नीचे को। वह दिव्या का कमरा। वह पापा की स्टडीदोनों में अंधेरा था पर अब किचन की बत्ती जली पापा घबरा कर बालकनी में आकर अंधेरों में उसे ढूंढ रहे हैं। दूसरी परछांई घबराई - सी बगल में खडी है। उसने देखा, इस घबराई परछांई से पापा जल्दबाजी में अलग हो, पार्क की गई कारों में उसकी कार ढूंढ रहे हैं, ओह! जल्दबाजी में खाने का पैकेट वहीं छोड आया हूं मैं !
वे दोनों नीचे उतर आये हैं अब और वह एक दरख्त के पीछे आ गया। अरे! यह घबराई सी, हताश परछांई तो जानी - पहचानी है। पापा की दिल्ली वाली रिसर्चस्कॉलर अणिमा। जिसकी बडी आंखों और सांवले रंग की लहराती देह में गजब का जादू हुआ करता था जब पापा जे एन यू में, हेड ऑफ द डिपार्टमेन्ट हुआ करते थे, तब वह बारहवीं में पढता था और अपने दोस्तों में उसके सांवले सौंदर्य की सरस चर्चा किया करता था। ये यहां कैसे? इतने दिनों बाद? ये तो अमेरिका में थी सिमोन द बाऊवार का दूसरा संस्करण! ऐसे ही कुछ लेख लिखा करती थी यह, दिव्या हंसी उडाया करती थी इसकी तो। दादी भी इसके बारे में अच्छी राय नहीं रखती थीं। ऐसी खुली छुट्टी लडक़ियों से लल्ला को दूर रखा कर री बहू। मम्मी हंस कर रह जाया करती थीं। मम्मी पूजा करती थीं पापा की। मम्मी के वही विश्वास और आस्था आज उसके सामने न जाने कितने सालों से यह सब चल रहा होगा! फिर उसकी कनपटी जलने लगी। वह निस्पन्द सा बैठा रहा इधर।
उधर पापा थके कदमों से उपर जाकर बॉलकनी में बैठे हैं। वो छूटते पुरुषार्थ का दंभ उनके अन्दर अब दम तोड रहा है। कंधे झुके हैं और वे कांपते हाथों से सिगरेट सुलगा रहे हैं। वह सोच रहा था कि- मेरा अब उनसे यह भी पूछने का मन कतई नहीं करेगा कि कैसे हो आप? अकेले कहां हो आप अब? है न नई दुनिया! जा रहा हूं मैं। वह तेज क़दमों से कार की ओर बढाझटके से स्टार्ट कर बिना आस पास देखे जूऽऽम से कार लेकर निकल गया।
यह वह पहला और आखिरी पल था अणिमा के लिये - मुक्ति का, उस लम्बी प्रेतकामना से मुक्ति का,जो
उसके अवचेतन में अटकी थी। कितना वक्त बीत चला था इस कामना को दफन करके भूल गई थी वो। यह कामना एक स्वस्थ सबल कामना थी, जिसे चुपचाप गला घोंट कर दफना दिया था उसने बरसों पहले। आज वही प्रेतकामना अवचेतन के विस्मृत गलियारों में भटक - भटक कर चेतन की राह पा गई थी। और लपक कर इस एक पल में समा गई थी।
भारत में मनाये जा रहे प्रवासी सप्ताह के दौरान अगर भारत सरकार के द्वारा उसे सम्मानित किये जाने का आमंत्रण न मिला होता तोयह कामना न जाने कब तक यूं ही आत्मा को क्षरित करती हुई,दफन रहती। कितनी ही बार सपनों में उसने सर की एक अस्पष्ट परछांई - सी के पीछे स्वयं को अनजान गलियों में भटकते देखा है। कितनी बार देखा है उसकी वही ट्रेन छूट गयी है, जिसमें चढ क़र वह उनसे मिलने जा पाती। कभी देखा है, उसके कपडे बदलते में अचानक कोई अन्दर बाथरूम में गलती से चला आया है और वह कहती है सरआप? और इन सपनों के मोहनजोदडाे की लिपी से भी कठिन अर्थ खोजने में पसीने पसीने हो हो कर वह रात रात भर जागी है।
जे एन यू के उन अल्हड दिनों में जब उम्र स्वयं के मूल्य और भविष्य के सपने गढा करती थी। सर ही थे जिन्होंने विचारों की धुंध को दूर कर एक आकार दिया था। एक साफ - शफ्फक व्यक्ति।मानवशास्त्र का महान ज्ञाता एक लेखक एक स्कॉलर। जिनकी परछांई भर छू लेना बहुत होता था।बहुत गर्व था उसे कि वह उनकी रिसर्च स्कॉलर है। दस और भी थे, पर उसे पता था कि वह विशिष्ट है। उनके लेखन की उनकी विरासत सिर्फ उसे मिली थी, उनके साथ कई सेमिनार्स के पर्चे उसी ने तैयार किये थे। वह उन कौरवों पाण्डवों में अर्जुन थी। प्रिय शिष्या! भरोसेमंद जिसे वे अपनी विरासत सौंप कर निश्चिन्त हो सकते थे।
उन्हें डर भी था कि वह शादी के बाद इस क्षेत्र के प्रति अपना डिवोशन छोड बैठेगी। और उसने ठान लिया था कि - मैं शादी ही नहीं करुंगी और वही समय था कि मैं अर्जुन से एकलव्य बन गई।
मैं पुरुष होकर अपने लेखन को शादी और इस युनिवर्सिटी की नौकरी के बादज्यादा समय नहीं दे पाता। तुम तो लडक़ी हो शादी के बाद घर - गृहस्थी के झंझट! ''
'' शादी करके अपने लक्ष्य से मैं नहीं भटकूंगी सर।''
'' यह संभव नहीं अणिमा, हर इन्सान को जीवन में एक सोलमेट की जरूरत होती है। नारीवादी होने का अर्थ यह नहीं की पुरुष की आवश्यकता को नकार दिया जाये जीवन से ही, नारीवादिता का अर्थ है, औरत की अपने स्वतन्त्र
अस्तित्व के प्रति सजगता! विवाह अवश्य करना और उस दाम्प्त्य की नींव में एक मजबूत कंधा लगाना और दूसरा बचा कर रखना उस पर रखना नींव अपने स्वतन्त्र व्यक्तित्व की और संतुलन साधे चलाना जीवन। शुरु के सालों में दिक्कत होगी फिर सीख जाओगी विवाह और कैरियर का सन्तुलन साधना।''
वह घबरा गई थी। हाय! नहीं होगा उससे यह सब। मानो वह एक औरत न हुई कंधों पर हल का जुआ साधे बैल हो गई। कितने ही प्रस्ताव उसे स्वयं मिले, कितने ही मम्मी पापा के जरिये। बस विवाह के प्रति उसकी आसक्ति हुई ही नहीं। उसके लक्ष्य दूसरे ही थे। पहले उसके सहपाठी फिर सहयोगी बने मिलिन्द ने तो कितनी प्रतीक्षा की थी उसकी फिर खीज कर कह ही दिया था '' अणिमा तुझ पर तो सर की विशाल, भव्य बुध्दिमत्ता, उनके यश और व्यक्तित्व की छाया पड ग़ई है और तू उससे मुक्त होकर ही किसी अन्य के बारे में सोच सकती है। और नहीं मुक्त हुई तो टंगी रहना त्रिशंकु सी। उस खडूस बुङ्ढे ने ही समझाया होगा कि अणिमा तुम विवाह के लिये नहीं बनी हो।''
'' हाय! कसम से मिलिन्द, उन्होंने कभी ऐसा नहीं कहा। पर सच्ची अभी मैं शादी के लिये जरा भी तैयार नहीं।''
उसने कभी मिलिन्द के साथ प्रेम व्रेम का किस्सा नहीं बुना था, वो तो स्वयं मिलिन्द और सहपाठी उनकी जोडी बनाते रहते थे। हां, वो दोनों ही बंगाली थे और दिल्ली में परदेसी थे तो साथ साथ घूमा फिरा करते थे तो एक संभावना साथ जीने की कहीं अंखुआ सकती थी, अगर मिलिन्द ने उस रोज इतना भला बुरा न कहा होता उसे और सर को लेकर तो - '' हाँ, तीस की उमर में कोई लडक़ी शादी के लिये तैयार नहीं इसका क्या मतलब है? कि''
वह जाने क्या क्या कहता रहा उसके और सर के बारे में उनके साथ साथ दूसरे शहर सेमिनार में जाने के बारे में। सर ही चाहते हैं कि अणिमा विवाह न करे और उनकी बनके रहे।
वह आहत सी मिलिन्द को देखती रह गई थी। मिलिन्द को वह एक सुलझा हुआ, स्त्री - पुरुष की समानता और व्यक्तिगत स्वतन्त्रता में विश्वास करने वाला व्यक्ति मानती थी। उसका भ्रम टूट गया था। फिर मिलिन्द ने मंजरी से शादी कर ली थी।बहुत बाद में उसने मिलिन्द की बातों पर गौर किया था, तो लगा था कि शायद वह सचमुच सर की बुध्दिमत्ता और महानता की कायल ही नहीं, बल्कि उनसे ऑबसेस्ड भी है। प्रेम तो नहीं था एक अंधी श्रध्दा? कितनी बार अकेले पलों में सर के साथ,अब उसका दिल धडक़ जाता था। पर सर को वैसा ही सहज पाकर धडक़नें संयम की डोरी में बंध जातीं।
दस के दस सहपाठी उसके युनिवर्सिटी से चले गये। नये स्टूडेन्ट्स आ गये। वह वहीं एडहॉक लैक्चरर बन गई। सर का साथ तब तक बना रहा जब तक कि वे एक प्रोजेक्ट के लिये युनिवर्सिटी की तरफ से तीन साल के लिये
जर्मनी नहीं चले गये।
उनके जाने से पहले तीन बार ये पल जन्म लेने को अकुलाया था। पहली बार तब, जब एक सेमिनारमें जाने से पहले उन्होंने अपना पर्चा अणिमा को पढवाने की बजाय एक नई रिसर्च स्कॉलर को थमा दिया था। बिफर गई थी वह मिलिन्द के जलते शब्द अंगारे बन गिर रहे थे उस पर, बुङ्ढा रसिक है। हर बैच में से एक सुन्दर सी कन्या छांट लेता है। लेकिन सर के पास जाते ही ऐसा लगा जैसे जलती उंगली बर्फ के पानी में डुबो ली हो।
अणिमा, तुम एनुअल डे की ड्रामा रिहर्सल में व्यस्त थीं। पेपर्स पहले तो तुम्हीं को भेजे थे। अब खुद टायप नहीं कर पाता सो श्रुति ने ही किये थे और उसी ने प्रूफ देखे थे। अब तुम्हारी कीमती राय के लिये तुम्हारी टेबल पर रख आया हूँ। उनकी हल्की भूरी आंखें, और सिगरेट के निशान से गुलाबी से सलेटी लाल हो आये होंठ संयम के साथ एक अर्थमय मुस्कान मुस्कुराये थे। उन्होंने जलन पढ ली थी अणिमा के चेहरे पर ताजा ताजा लिखी।
दूसरी बार वह पल जन्म से पूर्व ही कालग्रस्त हो गया जब सर ने उसकी मेज पर आकर एक पेपर उसकी ओर फेंकते हुए कहा था, '' यह देखो यह पच्चीस साल का प्रोजेक्ट यू एस ए का।एन्थ्रोपोलोजी तो ऐसा वास्ट सबजेक्ट है कि इसमें अवसरों की कमी ही नहीं। आगे रिसर्च करो। और तुम जैसी जहीन लडक़ी। और यहाँ एडहॉक बन कर कैरियर बनाने का क्या मतलब! क्या फायदा हुआ मुझे फिर तुम्हें अपना बेस्ट देने का? अब छोडो यह युनिवर्सिटी बाहर निकलो दुनिया देखो अच्छे संस्थानों में जाओ। विदेश जाओ कितने कितने अवसर हैं।''
'' मैं यहीं ठीक हूँ।'' उसने सर झुका कर कहा था।
'' क्या मतलब?''
'' आपकी छत्रछाया में।'' सर ठठा कर हंसे थे, फिर दर्प और व्यंग्यभरा कमेन्ट किया था। '' मेरे यश से कुछ टुकडे यश पाने की आकांक्षा व्यर्थ है अणिमायह तो स्वयं ही अर्जित करना होता है। रही बात मेरे प्रभाव का फायदा उठा कर ही किसी को इस युनिवर्सिटी में लगवाना होता तो अपने बच्चों को न लगवाता। मैं वैसा नहीं हूँ सॉरी अणिमा मुझसे सिफारिश की उम्मीद मत करना ह्न।''
वह फफक कर रो दी थी। '' बस इतना ही समझे न, आप? ''
वह कहते रहे थे -'' ऐसी नारीवादिता का क्या जो पुरुष में अपना सहारा ढूंढे।'' वे कुछ कोमल हो आये थे।
जानती थी खूब जानती थी कि अब उनसे छिपा नहीं रह गया था अणिमा की अंधी श्रध्दा का प्रेम में बदलता स्वरूप इसीलिये थी ये कडवी गोलियां। ये दवा में लिपटे तीर!
तीसरी बार तब - जब सर की फेयरवेल पार्टी थी जर्मनी जाने से पहले। उस बडे आयोजन से, पहले वह उनके साथ थी, उनके ऑफिस मेंदेर तक खामोश।
'' अणिमामैं खुश नहीं होऊंगातीन साल बाद लौट कर भी तुम्हें यहां एडहॉक लैक्चरर पाऊं तो! ये प्राध्यापिकी बेकार की निकृष्ट चीज है। आपकी क्रियाशीलता को क्षरित करती है । यह आलसी लोगों के लिये है। जो बैठ कर मोटी तनख्वाह लेकर खुश रहते हैं। तुम उनमें से नहीं तुममें तो कुछ कर दिखाने का जज्बा था न!''
'' जी सर!''
'' मुझे नहीं पता तुम्हैं क्या रोके हुए है यहाँ? हर महीने मिलने वाले दस हजार रूपए तो नहीं कम से कम। यू डिजर्व मोर! फिर क्या? न यहाँ कोई प्रोफेशनल सेटिस्फेक्शन है। मैं यह भी जानता हूँ तुम निस्वार्थ हो तुम मुझसे भी कुछ फायदा नहीं उठा रहीं फिर फिर क्या?''
''''
'' सच कहो अणिमा मैं कई बार डर जाता हूँ! क्यामैं? ''
''''
'' मुझसे क्या पा सकोगी? कुछ नहीं। मैं चला जाऊंगा परसों।''
'' कुछ मांगा क्या आपसे? कहा था न एकलव्य हूँ ,एक बार ।''
'' नहीं यह एकलव्य होना नहीं है यह तो मीराअहिल्या या ऐसा ही कुछ होने जैसा है अणिमा। यह स्वस्थ मानसिकता नहीं है तुम जैसी स्वतन्त्र स्त्री के लिये।''
'' मेरा बस नहीं है।''
एक क्षीण से आलिंगन के साथ यह पल जन्म लेते लेते ही वहीं मूर्च्छित हो गया था। किन्तु इस पल की प्रेतकामना जिन्दा रही बरसों। आज इस पल में प्रविष्ट होकर जन्म ले बैठी!
अमेरिका से ही कितने कितने फोन करके - कितने दोस्तों को ढूंढ ढांढ कर सर का पता पूछा था,उनका दिल्ली छोड क़र बम्बई आना तो पता चला था। लेकिन उसे नहीं पता था कि अब वे इस दस साल पुराने पते पर वे होंगे भी कि नहीं। एक खत, एक तार डाला। उत्तर नहीं मिला था। पर वह बम्बई चली ही आई। अपनी छोटी बहन कणिका से भी तो मिलना था। वहाँ से टेलीफोन डायरेक्ट्री में सर का नाम मिल ही गया, महेश्वर पन्त । नाम ही के साथ मुखर हो गयी उनकी आकृति - गोरी,पहाडी मजबूत काठी, औसत कद, चेहरे पर कुमाऊंनी पन्तों का वही तेज, क्लीन शेव्ड चेहरा, तीखी नाक, हल्की शहद के रंग की बडी मगर खामोश स्थिर आंखें, लगातार सिगरेट पीते रहने से गुलाबी से भूरा हो आया निचला होंठ और कामदेव के चाप के आकार का ऊपरी सुर्ख होंठ। काले - सफेद बालों की तरतीब से सधी पंक्तियां। मजाल जो दिन भर में इधर से उधर हो जायें।
''बहुत हैण्डसम हैं ना सर इस उम्र में भी। तू बता? '' मंजरी कहा करती थी। वह कुछ नहीं कहती थी। क्या कह सकती थी, उन आंखों का वीतराग भाव उसे पता था, उन होंठों से झरे शब्दों से ज्ञान,आदेश, उपदेश के अलावा कब कुछ सुना था उसने? पर सुनना चाहती थी! यही वीतराग भाव था, जो एक प्यास जगाता था उसमें। जितना दुर्लभ और रहस्यमय था वह व्यक्तित्व, उतना ही अणिमा को उसका मोह छलता था। उसे बस इतना पता था कि उनके ज्ञान की विरासत उनके सैकडों स्टूडेन्ट्स में से सिर्फ उसे मिली है जितनी निकटता उसे मिली हैसर के सहयोगियों और जूनियर्स को भी नहीं मिली थी। इसी को पाथेय बना उसने एकाकी सा रास्ता चुन लिया था।
सर के जर्मनी से लौट आने से बहुत पहले वह अमेरिका चली गई एक बडे प्राेजेक्ट के तहत, फिर लेखन, रिसर्च और फिर मानवाधिकार की एक विश्वप्रसिध्द संस्था एमेनेस्टी इन्टरनेशनल से जुड कर उसने अपने जीवन की सार्थकता पा ली थी।वहां कई बार उसे सर का पत्र मिलता था, उसकी उपलब्धियों पर बधाई के साथ। कई बार उसने सर को सेमिनार्स में पेपर पढने के लिये आमंत्रित किया पर उनका जवाब नकारात्मक ही मिला। उनकी पत्नी के देहान्त की खबर दोस्तों से मिली थी।धीरे - धीरे उनका लेखन भी कम पढने को मिलता था, जरनल्स में। अन्तत: सम्पर्क टूट ही सा गया था। उसका भी फिर कभी भारत आना अगर हुआ भी तो जल्दबाजी में। उनसे कभी मिलने का संयोग ही नहीं हो सका।
इस बार एक बडे सम्मान के लिये भारत आने के नाम पर उसे सर से मिलने की बहुत इच्छा हुई थी। आखिर यह सम्मान उन्हीं की बदौलत मिला था, उन्होंने ही उसे वह दृष्टि दी थी कि - वह महज लैक्चरर बनने के लिये नहीं बनी है। उसे इस विषय का, इस विषय में उनके दिये ज्ञान का सही उपयोग करना है।
फोन करते हुए उसका दिल जोर से धडक़ गया था। उसे कुछ नहीं पता था कि उसे कौन उठायेगा,उसे क्या उत्तर मिलेगा, रह रह कर आशंकित हो रही थी वह! अब तक तो रिटायर होने वाले होंगे।
सर ही ने उठाया था फोन, '' आवाज वही थी धीर गंभीर - सी, पर कहीं आहत, क्लान्त भी '' हलो,एमपन्त हियर''
'' सर''
'' कौन? अणिमा!''
'' पहचाना कैसे आपने?''
'' मुझे उम्मीद थी, अखबार में पढा था तुम्हारा नाम, टी वी पर भी देखा था तुम्हें। और खत और तार मिल गये थे।
'' पर आपने जवाब नहीं दिया न फोन न ई मेल। सब कुछ तो लिखा था आपको। ''
'' अणिमा, तबियत ठीक नहीं थी। फिर मुझे पता था कि यह प्रवासी सप्ताह बीत जाये तो तुम स्वयं खोज कर चली आओगी।''
'' क्या हुआ सर?''
'' होगा क्या? बुढापा और उससे ज्यादा खा रहा है यह अकेलापन!''
उसका मन दुख गया था सरजो कभी व्यक्तिगत स्तर पर बात करने से कतराते थे सर जो कभी अकेले होते नहीं थे बल्कि अकेलापन जुटाते थेजब बहुत लोगों से घिरे होते थे तो वे निस्संकोच कह देते थे '' आप जायें, मैं अब एकान्त चाहता हूँ।'' या '' अणिमा, जाओ अब मुझे यह पुस्तक खत्म करनी है।'' इसी एकान्त को अक्षुण्ण रखने के लिये उन्होंने आर्ट्स फैकल्टी की डीनशिप के लिये मना कर दिया था।
'' सर, आप कब फ्री हैं मैं आना चाह रही थीआपका आर्शिवाद।''
'' मैं तो खाली ही हूँ अबकहीं नहीं जाताकभी भी आ जाओमुझे अच्छा लगेगा।''
बस वह तुरन्त टैक्सी पकड क़र, कणिका के साथ शाम की शॉपिंग का प्लान कैन्सल कर, भरी दुपहर में भागी थी।
देह ढल गई थीतेज वही था! आंखों की खामोश चमक वैसे ही थी। सफेद कुर्ते पायजामे में सर को देख आत्मीयता से भर गई थी।उन्होंने जल्दी - जल्दी कुछ ही देर में कितनी - कितनी बातें पूछ लीं- उसकी उपलब्धियों की, पीछे छूट गये सूत्रों की, मानवशास्त्र के नये आयामों पर संभावनाओं की।इतने बातूनी तो सर कभी नहीं थे।लंच कर चुकी थी पर सर के साथ फिर लंच किया था। तुअर की दाल, कच्चे आम की लौंजी, सूखे आलू, चावल और रोटी।
'' आपने बनाया।''
'' हाँ।''
'' कोई सर्वेन्ट।''
'' मुझसे यहां की मराठी बाईयों के हाथ का खाना नहीं खाया जाता। फिर खाना बनाने में सुबह शाम एक घण्टा तो कट जाता है।'' अणिमा का मन फिर दुखा।
'' कैसा बना है?''
'' बहुत स्वाद है सर आपके हाथों में।''
'' जया भी यही कह - कह कर सण्डे का खाना मुझसे बनवा लेती थी।'' पहली बार सर के मुंह से उनके सुखद दाम्पत्य का एक अंतरंग प्रसंग सुना। बहुत याद आता होगा स्वर्णिम अतीत! उस पर ढलती उम्र, जिसमें अतीत जितना याद आता है, उतना सालता है। पर उस मीठे दर्द के हिस्से को बार - बार कुरेदना अच्छा लगता है, इस पचास पार कीउमर में।
उस दुपहर सर ने बहुत सी बातें की अतीत की। जे एन यू के दिनों की। न जाने कहां से पिछली आत्मीयता दोनों के बीच प्रश्न बन कर उभर आई।
'' आप कब रिटायर हुए?''
'' अब भी हुआ नहीं होता जया के जाने के बाद काफी बीमार रहा तो दो साल पहले ही रिटायरमेन्ट ले लिया।''
'' अब?''
'' अब ठीक हूँ। अपनी कहो। शादी वादी''
'' ना! नहीं की''
'' फिर जिद्दी निकली ना अणिमा तूतुमशादी नहीं की तो नहीं ही की ना।''
'' वक्त ही नहीं मिला।''
हंसे थे सरअपनी गूढ हंसी।
शाम टंगी थीसमुद्र के इस पार ही अभीनारियल के पेडों परउस पार जाने की लम्बी दूरी को देख ठिठकती सीवह पल करवटें ले रहा था वक्त के गर्भ में
''मैं जाऊं।''
''''
बोझिल एकान्त की परछांई उन्हें फिर हताश करती, उससे पहले ही उसने जाना स्थगित कर पूछ लिया,
सर चाय पियेंगे? मैं बना कर लाती हूँ।
चाय लेकर वह बालकनी में आ गई थी सर ने कन्धों से उसे थाम कर झूले पर बिठा दिया था''बैठो।'' स्वयं आराम कुर्सी पर बैठ गये थे। चाय के घूंट भरते हुए वे दोनों कुछ नहीं बोले सर बस उसे ही बहुत ध्यान से देखते रहे जब तक कि उसकी प्रकाशवान परछांई सिल्हट न बन गई। पर कुछ नहीं कहा कि बहुत बदल गई हो जैसा। चाय खत्म होने पर वह फिर जाने को कसमसाई।
'' जाओगी।''
'' हां शाम ढल गई है न।''
'' मैं छोड आऊंगा कार है न! तुम अपनी बहन के घर फोन कर दो।''
'' आप रात में ड्राईव करेंगे?''
'' हां, साथ खाना खायेंगे कहीं, फिर तुम्हें छोड दूंगा। बहुत दिनों से इस घर से बाहर नहीं निकला।आज खाना बनाने का भी मन नहीं है। तुम्हारे आने से पहले ही मैकेनिक को देकर सविसिंग करवाई थी कार की भी।''
एक एक पल किसी आदमजात के साथ बिताने की, उनकी लम्बे एकान्त के बाद की लालसा को वह समझ रही थी। एक उम्र बाद किसी अपने का साथ कितना जरूरी हो जाता है। यह स्वयं के बारे में महसूस कर वह अपने भविष्य को लेकर कांप गई। कितना दूर है उसके लिये भी ऐसा निर्जन सा वक्त? दो दशक बसज्यादा से ज्यादा!
अब वे दोनों उनकी स्टडी में आ गये। किताबें देखते देखते उन्होंने उसे एक डायरी दिखाई जिसमें अणिमा के लिखे लेखों की कतरनें थीं।
'' तुम्हारे जाने के बाद युनिवर्सिटी में मन नहीं लगा अणिमा।''
''''
'' बम्बई आ तो गया, पर यहां की रैट रेस से भी घबरा गया था मैं। रास ही नहीं आया कुछ भीजया बहुत बीमार रही। तुमसे लगातार सम्पर्क न रख सकने की यही वजह थी, तुम्हारे सेमिनार्स के आमन्त्रण कितने सारे प्रोजेक्ट्स सब से कट कर, जया की तीमारदारी में लग गया और वही चार साल पहले धोखा देकर चली गई।'' सर की आंखें छलकने को थी। उसने स्नेह से सर का हाथ पकड लिया। प्रतिक्रिया में सर ने दूसरे हाथ से अणिमा के दोनों हाथ पकड लिये और अपने जलते नेत्रों से लगा लिये। फिर उन्हें छोड वहीं दीवान पर बैठ गये, वह भी करीब बैठ गई।
'' अब फिर जुड ज़ाइए न आप! कितना सारा ज्ञान लिखना शुरु कीजिये नाफिर से मैं हूं ना आप साथ चलिये मेरे।''
'' अब कोई मोटिवेशन ही नहीं न पैसा न यश । सब पा लियासब पाकर चुक भी गया।अब तो याद भी नहीं आती उन दिनों की ''
'' यह सच नहीं है। मैं इस ज्ञान के अथाह सागर को व्यर्थ नहीं जाने दूंगी। आप लिखेंगे।''
'' मेरा साथ दोगी?''
'' हाँ।''
अपने गुरु की एक महान आकृति को टूटा देखकर, एकलव्य अणिमा, उस पल सर्वस्व देने को उद्यत थी।
'' जीवन से ही छिटक गया हूं अब वहीं से छूट गया है मेरा सिरा एक निरा प्रेत बन कर रह गया हूँमैं।'' शहदीली आंखों को धुंधला करते आंसूं धरती पर चू पडे थे।
अणिमा ने बिना कुछ कहे, बाँहें फैला दीं थी। एक सिसकता सा अकेला छूटा निष्पाप शिशु वक्ष से लगा था पर अणिमा के लिये, वे गर्म सांसे उस पुरुष की थीं, जो कभी उसे बहुत दुर्लभ लगा था जिसकी छाया से भी छुल जाने की फैन्टसी उसे अतीत में रातों जगा चुकी थी।
स्वयं को शीघ्र ही सहज कर सर उठ कर अपने बेडरूम में चले आये थे। वह ही पीछे चली आई थी।वे वार्डरोब से अपनी शर्ट पेन्ट लेकर फिर स्टडी में लौट गये -
''अभी आया कपडे बदल कर फिर चलते हैं।''
पर वह ठिठक गई इस कमरे में आकर जहां सामने की लम्बी खिडक़ी से दिखताढलती शाम में ठाठें मारता समुद्र एक डर पैदा कर रहाथा न जाने किन निर्मोही घनेरे अंधियारों से बाहर आ सलेटी लहरें तट की चट्टानों पर सर पटक रही थीं। एक उदास सा हाहाकार उसने घबरा कर परदा डाल दिया था। सौंदर्य के प्रतिमानों पर खरी उतरती एक जवान स्त्री का मुस्काता, श्वेत श्याम, बडा सा फोटो सामने की दीवार पर लगा था।
'' क्या देख रही हो?''
'' यही कि कितनी सुन्दर थीं मिसिज पन्त।''
'' हाँतुम मिलीं तो थींकई बार।
'' पर न जाने क्यों वे मुझसे कतराती थीं''
'' अणिमा तुम्हारा मेरे प्रति वह अन्धा अराध्यभाव उसे डराता था। उसे लगने लगा था मैं भी तुमसे प्रभावित हूँ और उसके साथ जब होता हूँ अंतरंग पलों में, तो तुम्हें फैन्टेसाइज क़रता हूँ।''
प्रेतकामना से ग्रसित वह पल छटपटाता रहा वह वहीं बैठ गई बिस्तर पर। कण कण बिखरती रेत सी।
'' और अणिमा बाद में उसका थोपा गया वह आरोप कभी कभी सच होने लगा था। '' एक सांस में बाकि बचा वाक्य खत्म कर, वे सामने आ खडे हुए।
वह बंध गई उन शहद भरी आंखों और चौडे ललाट पर बिखरे भव्य व्यक्तित्व के अवशेषों की गरिमा से। अपनी बांहें उनकी कमर के गिर्द डाल दीं। स्वयं को छुडा कर वे पास बैठे उसका सर सहलाते रहे। वह जन्म लेने को छटपटाता आवेशित पल उन्हें कब तक न ग्रसता उनकी लम्बी भुजाएं अणिमा को लपेट कर वक्ष से लगा चुकीं थीं दोनों लेट गये आज उनके गोरे पीले रंग पर उत्तेजना का रक्ताभ छांह थीउस लम्बी चौडी देह ने जब समेटा था, उसे बिखरी हुई सुनहरी रेत सा! तभी बस तभी फिसल कर उस प्रेतकामना से ग्रस्त पल ने जन्म ले लिया था उसने सिहर कर एक सिसकार के साथ अपनी बांहें उनके गले में डाल दी थी।
अब वह पल जन्म लेने की कुछ घडियों बाद अणिमा को छोड वैताल सा सर के कन्धे पर चढ ग़या था। जब वे उसे क्लान्त छोड रसोई में पानी लेने गये थे। घबरा कर लौटे और उसके कपडे ज़ल्दी जल्दी उसे पकडा कर बोले थे -
'' अणिमा लगता है, इसी बीच सलिल आया था। देखो ये खाने के पैकेट! अब तुम जाओ! ''
'' सर।'' वह समझ ही न सकी थी। हतप्रभ थी।
वे कपडे पहन बॉलकनी में जा जा कर झांक रहे थे। उसे समझ नहीं आ रहा था कि ऐसा क्या तूफान आ गया? जिस बेटे ने सुध लेना छोड दिया पिता की उसके आने का क्या फर्क पड ग़या? शायद एक पिता का दृष्टिकोण वह समझ नहीं पा रही थी।
वह रुआंसू हो कर एक कुर्सी पर सर पकड क़र धंस गई। जब सर सलिल की कार पार्किंग में न पाकर लौटे तब उन्होंने आकर अणिमा से कहा।
'' चलो, तुम्हें छोड दूँ।''
'' मैं चली जाऊंगी।''
'' ।'' कितना नीरीह लग रहा था यही पुरुष अब जिसके वर्षों के सहेजे अक्षय पौरुष का तृप्ति भरा साथ अभी अभी जी कर चुकी थी जिसे बार बार जीने की मीठी कामना अभी खुमार ही से भरी थी।
'' मैं अभी एक सप्ताह यहीं हूँ।''
'' मैं तुम्हें फोन करुंगा।''
वह विदा देने नीचे तक आये थे।

यह कैसा पल था जो अणिमा की प्रेतकामना के साथ आया और उन पर वैताल की तरह चढ बैठा।उनके एकान्त में साल साल भर कोई नहीं झांका था तब कहां मर गया था यह पल? आज आया भी तो कितना भीषण अपमान लेकर।
क्या सोचता होगा सलिल? उसका बाप अब यही सब किया करता है यहाँ अकेले में? कैसे कहे कि बेटे - वह एक विधुर की त्रस्त वासना का पल नहीं था वह
वह पल था एक बरसों संजोये प्रेम का! एक बीज था एक दुर्लभ पौधे का बीज! जिसके उगने के लिये कभी अनुकूल परिस्थितियां न बन सकीं थीं। समाज, परिवार, प्रतिष्ठा सब कुछ यथावत बने रहें,इसी संयम के तहत। उन्होंने उस बीज को कभी एक नरम निगाह की नमी तक नहीं दी थी। बस उसे दूर कर सूखे पात्र में रख छोडा था। आज जब कुछ भी शेष न था इर्द गिर्द - न समाज, न परिवार,न प्रतिष्ठा कुछ भी नहीं तो बहुत दिनौं बाद इस बीज की याद आ गई थी उसे निकाल कर प्रेम से सींच भर दिया था हाय! सच नहीं पता था यह बीज नमी के एक अणु मात्र सेअपने तन्तु इतने फैला लेगा कि उन पर उगे चमकीले चिकने हरे हरे पत्ते उसे पूरा ढंक लेंगे। वह वल्लरी उनसे लिपट जायेगी और उसकी शाखाएं दूर दूर तक फैल जायेंगी। यहां तक कि उसके भूले हुए अपनों तक भी - कि वे बरदाश्त नहीं कर सकेंगे और उसे अमर बेल समझ बैठेंगे वह कैसे समझायेंगे कि - ना! यह परजीवी अमरबेल नहीं, आर्किड हैअपनी आजाद जडों को अपने आप पोषित करता सुन्दर फूलों में खिलता औरों को मोहता हुआ!

कैसे समझायेंगे वे सलिल को? उफ! ग्लानि से पिघल गया था वह आत्मसम्मान, जो बच्चों के आगे कभी न झुक कर आज तक बटोरा था उनके समक्ष एक आदर्श पिता का रोल निभाते निभाते आज ये चूक कैसे हो गयी?
फोन की तरफ हाथ बढाया फिर उसके मोबाइल का नम्बर डायल भी किया लेकिन आवाज सुनकर रख दिया सफाई? किस बात की? कहाँ गलत हूँ मैं? गलत तो हूँ, एक आर्दशवादी पिता के रूप में मैं ने कब उन्हें दिखाया एक अकेला कमजोर व्यक्ति होकर? एक विधुर की बेबसी कब उनके सामने उजागर की? हमेशा अपनी कमजोरियां ढांप कर दृढ दिखते रहे। अपने आत्मसम्मान में सजग -कमजोर नहीं होने दी अपनी छवि। कितना कहा था, जया ने -
'' मना कर दो जी, सलिल से आप बहू की बातों में न आए इसी शहर में होकर अलग घर में ना रहे। आप रोक लो तो रुक जायेगा। बहू को दवाओं की गन्ध बुरी लगती है तो, मुझे अस्पताल में एडंमिट करा दो थोडे दिन। काम के लिये एक आया, एक नर्स रख लो ना। नियम धर्म बहू बेटे से ज्यादा नहीं अब क्या इतनी कडवी दवाएं खालीं नौकरानी के हाथ का खाना भी खा लेंगे।''
'' जाने दो जया अपना नीड बना लेने दो। हम भी तो बाबूजी इजा को छोड आये थे। '' दृढता से कह स्वयं सलिल को नये घर में शिफ्ट करवा आये थे। अपने जुडवां पोतों को मुडक़र भी नहीं देखा भरी हुई आंखों से।
जया के चले बाद सलिल उन्हें ले जाने को आया था अपने घर तब भी उन्होंने अपने पोतों की किलकारियों के बीच चुभते तानों की जगह अपना आत्मसम्मान चुना। दिव्या के पास जाने की तो कोई समस्या ही नहीं थी। वहां तो स्नेह ही स्नेह था। पर वही नहीं गया। बेटी के घर जाकर रहे इतने भी बुरे दिन नहीं आये हैं। पचपन भी कोई उम्र है, किसी के सहारे पड ज़ाने की?
यह पल तब टूटा कहर बन के , जब वे एक आदर्श पिता की तस्वीर में बंधे बंधे वे थक गये थे।एक आवेशित पल में वे बाहर निकल आये इस फ्रेम से तो! क्या अब वह छवि बिखर जायेगी पूरी की पूरी जिन्दगी की तपस्या से बनी तस्वीर में बाल आ जायेगा? कभी वह कुछ नहीं कह सकेंगे अपनी सफाई में चुपचाप बेटे की नजर में गिरना देखते रहेंगे?
वे सलिल की गाडी क़ो मोड से सर्र से गुजरते देख चुके थे। आधी पी हुई सिगरेट फेंक दी। पूरा दृश्य मानो इस एक पल की निर्लज्जता से स्तब्ध था। हवा रुक गई थी, नारियल के पेड दम साधे खडे थे,समुद्र भी मानो चीख चीख कर रोने के बाद अब कहीं धीमी धीमी लहरों में हिचकियां सी ले रहा था बादल घिर आये थे बॉलकनी में बढती तेज उमस और अन्दर की अकुलाहट से घबरा कर वे अन्दर आकर बिस्तर पर जा गिरे। उनका अकेलापन और गहरा हो गया था।अणिमा तक को वे कुछ समझा न सके, उसने क्या सोचा होगा। उस पल वह शायद नहीं समझ पा रही थी - एक एकाकी पिता को सिहराती, स्वयं को एक स्त्री के साथ सहवासरत होते हुए अपने ही बेटे के द्वारा देख लिये जाने की भीषण ग्लानि कैसी होती है!
बिस्तर पर अणिमा की देह के आकार की सलवटें बनी थीं। एक नई गन्ध बहुत दिनों से अनछुए बिस्तर में आ बसी थी। थकान, रुला देने वाले तनाव, ग्लानि, खुमारी, दुखके मिलेजुले भाव से त्रस्त,वे उस गन्ध को खोजते हुए बिस्तर पर गाल रगडते रहे। दो चार आंसू उन सलवटों पर जा गिरे कुछ देर पहले बीत कर चुके पलों ने फिर जकड लिया वे तो चैन से उस खुमार को भी न पी सके थे जो इतने दिन बाद के देह सुख से निथरा था। देह सुख से ज्यादा सत था उन आत्मीय दिनों की बातों में उनकी आत्मीया अणिमा के नेहभरे सान्निध्य में। उन्हें फिर चाह हो आई अणिमा की रोक ही लेते उसे! हमेशा के लिये! एक विद्रोह जगा इस नई जन्मी परिस्थिति से लडक़र उनमें -
क्या कर लेगें साले! कभी आये पूछने कि, पापा कैसे हो? कभी आया भी तो अकेला, न पोते न बहू।एक
कर्तव्यपूर्ति कर चलता बना। कितने कितने कठिन पल अकेले पल में बिता डाले, कोई नहीं आया।एक सुख अणिमा के साथ लौटा तो, चले आये उस पर पर अधिकार जताते। अरे बस कर्तव्य निभाकर चुक गया एक पिता भर हूं मैं? पिता! जिसे अब एक प्रेत की तरह आदर्श पिता के फ्रेम में बन्द रहना लाजमी है? अब वह एक आदमी एक व्यक्ति नहीं? मेरे अकेलेपन को किसी की जरूरत नहीं क्या? इस बार अणिमा को रोक लूंगा।
' सठिया ही गया हूं मैं। वह क्यों रुकेगी? क्या दे सकूंगा उसे? और वहसलिल! उन्हें बार बार याद आ जाता वह पल कि उफ! कितना भीषण होगा वह पल स्वयं सलिल के लिये भी ?
तभी फोन बजा, - सलिल, का तो नहीं?
'' सर मैं अणिमा पहुंच गई थी ठीक से। सोचा आपको बता दूं।''
'' अच्छा किया।''
'' आप ठीक हैं?''
'' हाँ।''
'' सर, सोये नहीं अभी तक आप एक ही रिंग में उठा लिया, आप परेशान हैं।''
'' नहीं ठीक हूं।''
'' सर! आप कहीं गलत नहीं है। ग्लानि की कोई वजह नहीं है। आपने किसी को हानि नहीं पहुंचाई है। अपना छोटा सा सुख खोजा था।''
'' बहुत उलझ रहा हूं। सोचा सलिल से बात कर लूं।''
'' नहीं, आप अपनी तरफ से फोन नहीं करेंगे। देखियेगा वह खुद फोन करेगा। जब वह कहे '' मैं आया था।'' अपना स्वतन्त्र स्वाभिमान बनाये रखियेगा। कोई सफाई नहीं कोई बहाना नहीं न तफसील बस अच्छा मुझे पता नहीं चला। इतना कहकर अपनी वही गरिमामयी मुद्रा बनाये रखियेगा। आप वही हैं डॉ महेश्वर पन्त!''
''।''
'' सर!''
'' हाँ सुन रहा हूँ।''
'' मैं कल आऊं?''
'' ।''
'' अच्छा आप ही इधर आ जायें। याद है आपने बाहर डिनर पर ले जाने का वादा किया था। मेरा पता है - '' अणिमा की खुमार भरी खनकती हंसी ने उसकी उदासी धो डाली। एक कामना फिर जगी थी।
सच ही फिर सुबह सलिल का फोन आया था,
'' पापा, मैं आया थाआपआप शायद।
'' अच्छा।'' बात वहीं काट एक निर्लिप्तता ओढने में थोडा कष्ट तो हुआ था।पर शायद यही ठीक था।
'' पापाविम्मी कह रही थी आप थोडे दिन यहां आ जायें परसों साहिल का बर्थडे है।''
'' नहींबेटा ऐसा तो शायद संभव न हो! मैं व्यस्त हूँ , एक प्रोजेक्ट के लिये कुछ मैटीरियल तैयार कर रहा हूँ शायद अगले महीने यू एस ए जाना पडे।''
'' अच्छा पापा! लेकिन आप मेरा मतलब आपकी तबियत'' उसकी आवाज में क्या था हताशा, चिढ या व्यंग्य या सहजता? ये पता नहीं। पर एक कुतुहल जरूर था पर उन्होंने उसे तूल नहीं दिया। एक पिता और पुत्र के बीच एक रेखा जो सलिल ने खींची थी, अपनी निजता कीउन्होने एक समानान्तर रेखा अपने आगे खींच ली, अपनी निजता की, तो क्या गलत है?
'' ठीक ही है अस्थमा इस बार नहीं उखडा, शायद इन्हेलर और रोज सुबह शाम की सैर का असर है।''
''अच्छी बात है! तो फिर मैं ही आऊंगा बताइये कब आऊं?'' एक व्यंग्य था स्वर में।
'' रहने देना बीच में समय मिला तो मैं ही कुछ देर के लिये के लिये उधर आ जाऊंगा, साहिल के बर्थडे पर।''
'' जी। रखता हूं, गुड डे पापा।''


वह पल अब जगमगा रहा था। अपनी प्रेतबाधा से मुक्त नया जन्म लेकर हंसता खिलखिलाता! वह पल बह रहा था निर्बाध होकर, वक्त की लहरों के समानान्तर।
– मनीषा कुलश्रेष्ठ
अप्रेल 14, 2003